आज मुझे बवाना जाना था 10 बजे से लेकर 1:00 का टाइम था मिलने का. मैंने 8:00 बजे से मेट्रो स्टेशन के लिए ओला उबर बुक करनी शुरू की। बरसात के कारण नहीं हो रही थी। मेरे घर के पास से ऑटो वगैरह सब मिलते हैं। 8:15 बजे मैं घर से निकली, 15 सेक्टर मेट्रो के लिए। ऑफिस टाइम और फैक्ट्री का टाइम होने के कारण कोई खाली नहीं मिल रहा था। 10 सेक्टर के चौराहे पर एक ई रिक्शा मिला, वह बोला, " 16 सेक्टर के मेट्रो स्टेशन जाएगा।" मेट्रो स्टेशन पहुंची किसी भी मेट्रो ने मुझे 1 मिनट के लिए भी इंतजार नहीं करवाया। राजीव चौक उतरकर मैंने जहांगीरपुरी के लिए मेट्रो बदली और 10. 10 मिनट पर मैं जहाँगीरपुरी मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 3 से बाहर खड़ी होकर, वहां खड़े ऑटो वगैरा से बात करने लगी। एक ऑटो ₹400 में माना। कहता मैं मोड़ कर ला रहा हूं। मैं छपा छप पानी में चलते हुए दूसरे साइड पर गई झट से उसने दो सवारियां अपने आजू-बाजू बिठा ली और पीछे की सीट पर मुझे कहता, " बैठो।" मैंने कहा कि तुमने मुझसे पूछा था कितने लोग हो? मैंने कहा, "मैं अकेली जाऊंगी तब तुमने यह सवारियां क्यों बिठाई?" ऑटो वाला बोला, " यह रास्ते में उतर जाएंगे।" इतने में वह दोनों सवारियां बिना ऑटो से उतरे कूद के पीछे जाकर सीट पर बैठ गई और ऑटो वाले से बोली, " चल।" वह यह जा वह जा! इतने में अंकुर का फोन आया कि आज मौसम खराब है इसलिए मत जाना। मौसम ठीक हो जाएगा, तब चली जाना। मैंने कहा, " मैं तो जहांगीरपुरी पहुंच गई हूं। उसने कहा, " मैं कैब बुक करता हूं, यहां से बाहर मत जाना। जो एक दो बुक हुई, वह भी कैंसिल हो गई। बाहर जिस भी ऑटो वाले से बात की उसका एक ही जवाब था कि आगे बहुत पानी भरा हुआ है, जाम लगा हुआ है और सिंगल नहीं ले जाएगा। जबकि यह ऑटो शेयरिंग नहीं थे। मैंने लौटने का मन बनाया। अब मेरा ध्यान आसपास भरे हुए पानी पर गया। बूंदाबांदी तो चली रही थी। गेट नंबर 3 पर लिफ्ट भी नहीं थी, एक्सीलेटर भी नहीं था मैं सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गई। यहां से मेट्रो स्टेशन में एंट्री नहीं थी सिक्योरिटी वाले अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभा रहे थे। मैंने उनसे कहा कि मैं ज्यादा सीढियां नहीं चढ़ सकती। आप मेरा डॉक्टर का पर्चा देख लो, मुझे इधर से जाने दो। उन्होंने बहुत अच्छे से मुझे समझाया कि आप तीन नंबर से जहां से चढ़कर आई हो वहीं से उतरकर सड़क से होते हुए दो नंबर के एंट्रेंस से आओ, वहां पर लिफ्ट है। अब मैं फिर तीन नंबर गेट की सीढ़िया से उतरकर छप्पर छप्पर पानी में चलती हुई, दो नंबर की लिफ्ट से मेट्रो स्टेशन में प्रवेश किया। फटाफट मुझे दोनों मेट्रो मिलती गई। आते जाते सीट भी मिली। मेट्रो स्टेशन के अंदर की दुनिया बाहर से बिल्कुल अलग है। जाते समय तो मुझे आसपास के जल भराव का बिल्कुल ही ध्यान नहीं था। 15 सेक्टर मेट्रो स्टेशन से बाहर आते ही देखा सड़कों के किनारे पानी भरा हुआ पर सड़क के बीच में नहीं। एक ऑटो फुटपाथ के पास खड़ा था. बीच में इतना पानी था कि मैं ऑटो तक पहुंच सकती थी। मैं जाकर उसमें बैठ गई। बारिश तो रात 1:30 बजे से ही चल रही थी। अब भी हो रही थी। ऑटो वाला कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। लोग मुझसे पूछते कि कहां जा रहा है? मैं तो गंदे पानी में न चलना पड़े इसलिए बैठ गई थी। इतने में गुस्से से भरा हुआ ऑटो वाला आया और मुझे अपना दुखड़ा सुनाने लगा, " एक बुड्ढा बुढ़िया मुझे कह कर गए कि हम पैसे खुले लेकर आ रहे हैं पता नहीं किधर भाग गए।" मैंने उससे पूछा, " चलोगे। " मेरा सेक्टर सुनके बोला आप तो पास की सवारी हैं। मेरा बैटरी वाला नया ऑटो है बरसात में खराब हो जाता है तो ठीक करवाने में बहुत पैसा लगता है। यह बारिश का समय मेरा कमाने का है। आप भी बैठी रहो, आपके घर के आगे उतार दूंगा। इस खराब मौसम में मुझे सवारी मिल रही थी यह क्या कम है। अब जो भी उससे पूछता वह मुंह मांगे दाम मंा गता सवारियां बड़बड़ा के, पर झट से बैठ जाती। मेरे घर से काफी पहले एक सवारी खड़ी थी। उसका स्कूटर पूरा भरा हुआ था फिर भी उसने पूछा, " कहां जाना है। " सवारी बोली, " 63 सेक्टर। " इससे पहले कि वह उसे बिठाकर एडजेस्ट करता। मैं यह सोचकर उतर गई कि मैं थोड़ा पैदल चलूंगी, इतने गंदे मौसम में है स्कूटर चला रहा है। इसके कुछ पैसे बन जाएंगे। मैं पैसे देकर पैदल छाता खोल कर चल पड़ी। चल रही हूं और अब ज़हन में सुबह का सीन चल रहा है। 16 सेक्टर मेट्रो स्टेशन की ओर जाने वाली साइड सड़क पर कितना पानी भरा हुआ था कि अगर किसी गड्ढे के कारण रिक्शा पलट जाता तो क्या होता! और अपना एक्सीडेंट याद आ गया। घर से थोड़ी दूर भी पानी भरा हुआ था, जिसमें सुबह मैं छप-छप करती गई थी। अगर पार्क की बाउंड्री में नालियां कर दी जाए तो फुटपाथ का पानी तो उसमें जा सकता है, जिससे कुछ भूजल स्तर में ही सुधार हो जाए। गर्मी के बाद मानसून का आना लाज़मी है इसलिए तैयारी तो होनी ही चाहिए।
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