हमारे कॉर्नर के घर के बाहर सहजन, अमरूद, करौंदा और कई पेड़ लगे हुए हैं। पूरा घर पेड़ों से गिरा हुआ है कभी-कभी बंदर आते हैं, फल फूल खाते हैं, खूब उधम मचा कर टहनियां पत्तियां तोड़ तोड़ के फेंक कर चले जाते हैं। उनके जाने के बाद मैं, झाड़ू लगाकर साफ कर देती हूं। कुछ महीनों से बंदर आ नहीं रहे थे। चैन की सांस ली। लेकिन अब फिर आने लग गए, जो जाते ही नहीं हैं। सुबह 8 और 9 के बीच में आ जाते हैं। शाम को 5:00 बजे के बाद जाते हैं। इतने समय हम घर के अंदर बैठे रहते हैं। कहीं जरूरी जाना हो तो गार्ड दिलावर को फोन करते हैं। वह डंडा लेकर आता है। एक डंडा हम अपने हाथ में रखते हैं। अब बंदर हमें खों खों करके झपटते हैं। डंडा चलाते हुए हम जाते हैं और डंडे को जाते हुए गार्ड के पास रख जाते हैं क्योंकि आते हुए भी जरूरत पड़ेगी। पर अब समस्या गंभीर हो गई है। बंदरों ने डस्टबिनों के ढक्कन तोड़ दिए, दूसरे लगाए। अब सारा कूड़ा फैला जाते हैं। जिससे सूखा, गीला सभी कूड़ा मिक्स हो जाता है। खरबूज, तरबूज के छिलके लेकर सीढ़ियों पर बैठकर खाते हैं और फेकते हैं। उनके जाने के बाद झाड़ू से साफ करती हूं। लेकिन अब कूड़े की गाड़ी सामने से गाती बजाती निकलती है 'चमक चमक चम चम चमके नोएडा' हम अंदर से आवाज लगाते हैं। जिसमें हमारी आवाज भी गाड़ी पर नहीं पहुंचती है और हमारा कूड़ा क्योंकि फैला हुआ है शायद वह इसलिए नहीं उठाया जाता। या वह भी घर को बंदरों से घिरा देखकर छोड़ जाते हैं। शाम को इस मिक्स कूड़े को मैं अलग नहीं कर सकती, वैसे ही डस्टबिन में भर देती हूं। मुझे डॉक्टर ने नीचे बैठने को मना किया है। अगले दिन मैं डरती हूं कि गाड़ी आने से पहले, बंदरों ने फिर कूड़ा फैला दिया और कूड़ा गाड़ी फिर मेरा कूड़ा नहीं लेकर गई तो? क्या हमने बंदरों को बुलाया है कि वह आए और हमारा कूड़ा फैलाएं? हमारा कष्ट देखकर चलते-फिरते लोग हमें कह जाते हैं कि आपने पेड़ बहुत लगा रखे हैं न, इन्हें यहां ठंडा लगता है न। इन बंदरों के कारण पेड़ तो नहीं कटवा सकती न, हां इनके नीचे शेड में उगने वाले पौधे जरूर लगाऊंगी।
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