गीता प्रेस वाले को कपड़े देती है तो शाम को या रात तक ले लेती है। मैंने उससे पूछा, " क्या प्रेस वाला भैया, तुम्हारे कपड़े लेकर भाग जाएगा! यहां वह रहता है और उसका रोजगार है।" गीता का जवाब बहुत संतोषजनक लगा। उसने एक लोक कथन बोला, " धोबी के घर आए चोर, लूटे गए और" यानी यदि प्रेस वाले के घर में चोरी हो गई तो कपड़े तो औरों के जाएंगे। यह बहुत कड़ी मेहनत से और मुश्किल से परिवार का पालन कर रहा है इसलिए हर्जाना तो देगा नहीं क्योंकि पैसे जो चोरी हो गए हैं। महानगर में धोबी बहुत डिमांड में रहते हैं। जगह महंगी है। किराया दे नहीं सकते क्योंकि किराया भी बहुत है इसलिए बेरोजगार प्रेस वाला जब शहर में आता है तो वह खाली प्लॉट या जिस जगह मकान में किराएदार रहता है लेकिन लोकेशन अच्छी हो मसलन पार्क और सड़क के बीच जगह देखकर एक मेज़, प्रेस, कोयला और अपने हुनर के भरोसे, निजी मेहनत से कारोबार शुरू कर देता है और पहले दिन से ही उसका काम शुरू हो जाता है। जिसके घर के आगे होते हैं उसका कपड़ा मुफ्त में किया जाता है। बदले में उनसे पानी आदि मिल जाता है और उसके घर की रखवाली भी हो जाती है। किसी प्रेस वाले को सुविधा की बिजली भी मिल जाती है इसलिए वह दोनों तरह की प्रेस का इस्तेमाल करता है। धूप में बचने के लिए जो आड़ लगाई जाती है, वह बाद में झुग्गी में बदल जाती हैं और आसपास के ब्लॉक को सुख हो जाता है कि पड़ोस में ही कपड़े प्रेस हो जाते हैं। कोई कपड़ा अर्जेंट हो तो वह भी तुरंत प्रेस हो जाता है। कुछ साल पहले मेरे स्कूल में प्रेस वाले के बच्चे पढ़ते थे। पति-पत्नी प्रेस करते थे। किसी ग्राहक के द्वारा पति का मिडिल ईस्ट जाने का, जाकर कमाने का काम बन गया और वह विदेश कमाने चला गया। पत्नी ने पति की जगह काम के लिए किसी को गिनती पर आधे पैसे में रख लिया। धीरे-धीरे उसका खूब काम चल गया। अब वह खुद भी प्रेस नहीं करती औरों को प्रेस करने के लिए रख लिया। आप वह बस हिसाब किताब देखती। किसी का कपड़ा न खो जाए गलत जगह न चला जाए, इसका बहुत ध्यान रखती। 1 साल बाद पति छुट्टी पर आया। उसने पत्नी के काम का फैलाव देखा तो तुरंत पत्नी को गांव वापस भेजने का फैसला किया। वह जब बच्चों की टी.सी लेने आई तो मैंने पूछा, " तुम्हारे बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे हैं क्यों इनका नाम कटवा रही हो? " सुनते ही वह रोने लगी और बोली, "दीदी मैं बहुत अच्छा कमाने लगी हूं और यहां पर जमा हुआ रोजगार है। ठिये की कीमत भी बहुत अच्छी मिल रही है। 1 साल में मेरा काम हो गया है। मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं इसलिए मैंने बच्चों को ट्यूशन वगैरा सब लगा दिया है। सब ठीक-ठाक चल रहा है इन्होंने ठिया का पैसा ले लिया है और ठिया आगे किसी को दे दिया है। हमें गांव में अपने परिवार के संरक्षण में रखकर फिर विदेश जाएंगे।" उसके जाते ही मैं साेच में पड़ गई कि वह यहां भी तो पत्नी के साथ काम करके इस काम को और बढ़ा सकता था।
अगर आपका कपड़ा वापस प्रेस होकर नहीं आया तो यहां प्रेस वाला परवाह नहीं करता है। आप पूछने जाएंगे तो कहेगा किसी के पास गलती से चला गया होगा अगर वह लौटा देगा तो आपको मिल जाएगा। आप अगर गुस्सा करेंगे तो कहेगा। आप आधे पैसे ले लो पर फिर मैं आपका कपड़ा प्रेस नहीं करूंगा। यहां भी बतासों की बात ठीक लगी। उसकी गलती से नुकसान धोबी का नहीं आपका होगा। इनकी एक बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। बच्चों को अपनी समर्थ के अनुसार स्कूल में पढ़ाते हैं। मेरे घर के पास वाला धोबी हमेशा अपने बेटे को कोसता रहता था। इतनी तेरी फीस देता हूं, पढ़ता नहीं है। अब तो नालायक ने स्कूल जाना भी बंद कर दिया है। पर उस नालायक बेटे ने घूमते-फिरते एक नई मल्टी स्टोरी सोसाइटी देख ली। पिताजी ने वहां पर उसको मेज़ लगा दी। काम चल निकला अब पिताजी ने इस ठिए को आगे किसी को देकर कैश हाथ में लिया और नालायक बेटे की मदद करने उसके पास चले गये।
