आज कुछ लोगों को देखा जो बरगद के पेड़ से टहनियां तोड़कर घर लेकर जा रहे थे क्योंकि आज बट सावित्री का व्रत है। वे पेड़ की टहनी की पूजा कर लेंगे 😄 सौभाग्यवती महिलाएं वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। बरगद को हिंदू धर्म में "अक्षय वट" कहा जाता है - यानी जो कभी न मरे। बरगद सैकड़ों साल तक जीवित रहता है। इसलिए पति की लंबी आयु की कामना के लिए इसी की पूजा की जाती है। बरगद के नीचे बैठकर कथा की जाती है। पेड़ के चारों ओर सूत लपेटकर 7 या 11 बार परिक्रमा करती हैं। यह संदेश देता है कि पेड़ को बांधो, काटो मत।
प्रकृति से रिश्ता निभाओ। वट सावित्री व्रत और पर्यावरण का संबंध बहुत गहरा है। ये सिर्फ पति की लंबी आयु का व्रत नहीं है , बल्कि वट वृक्ष की पूजा सीधे पर्यावरण से जुड़ाव है। पूजा से पेड़ को नुकसान नहीं होता, उल्टा उसका सम्मान बढ़ता है।
पहले हर गांव में बरगद का पेड़ होता था। वट सावित्री के दिन लोग नए बरगद लगाते थे और उसकी देखभाल का संकल्प लेते थे। आज भी कुछ नौकरी वाली महिलाओं को गमले में लगा बरगद का पौधा खरीदते देखा है। बट सावित्री के दिन वे उसकी पूजा करती हैं।
यह त्यौहार पर्यावरण दिवस से पहले एक परंपरागत वृक्षारोपण अभियान जैसा है। सावित्री की कथा में यमराज जंगल में आते हैं। जंगल, नदी, पेड़ सब साक्षी बनते हैं। यानि प्रकृति सिर्फ संसाधन नहीं, वो जीवन की रक्षक है। जैसे सावित्री ने प्रकृति की मदद से पति को बचाया, वैसे ही हम भी प्रकृति की रक्षा करके अपना भविष्य बचा सकते हैं। वट सावित्री धार्मिक व्रत के साथ एक पर्यावरणीय त्योहार भी है। ये हमें सिखाता है कि पेड़ काटने से पहले सोचो। ये पेड़ हमारी पीढ़ियों की सांस है।




