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Monday, 5 October 2026

सूर्या संस्थान एवं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित गांधी जयंती एवं अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस Gandhi Jayanti and International Day of Non-Violence organized by Surya Sansthan and Vishnu Prabhakar Pratishthan

 


महात्मा गांधी के 158वें जन्म दिवस पर  सूर्या संस्थान, एवं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान ने संयुक्त रूप से आयोजित 'गांधी और नशा मुक्ति‘ विषय पर निबन्ध प्रतियोगिता के बाद सूर्या संस्थान के उपाध्यक्ष डाॅ. राम शरण गौड़ की अध्यक्षता में आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने देश में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए आह्वान किया कि नशे के विरूद्ध बड़े पैमाने पर जागरूकता के प्रयास होने चाहिए। अतुल प्रभाकर ने गांधी जी के जनजागरण सशक्तता, अधिकार के प्रति जागरूकता के प्रयासों को रेखांकित करते हुए एकता की शक्ति के महत्व पर बल दिया। संस्थान के मन्त्री देवेन्द्र मित्तल ने छोटे छोटे बच्चों से लेकर सुपर सीनियर नागरिकों तक में मोबाइल फोन पर लगे रहने की लत को भी नशे की संज्ञा देते हुए उनकी काउंसिलिंग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने नशा मुक्ति के प्रति जागरूकता जगाने के लिए संस्थान के आगे के कार्यक्रमो की रूप रेखा प्रस्तुत की। अन्य वक्ताओं, डाॅ. शोभा भारद्वाज और श्री कन्हैया लाल ने भविष्य में इस विषय पर संस्थान की योजनाओं में यथासंभव सहयोग करने का आश्वासन दिया। साथ-साथ सभा का सुचारू संचालन भी किया। डाॅ. राम शरण  गौड़ ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में युवाओं के अभिभावकों को अपने बच्चों पर ध्यान रखना होगा कि वह गलत संगति में न पड़ें।

मुख्य अतिथि राजकुमार नागर एडवोकेट ने सूर्या संस्थान के प्रयासो की प्रशंसा कर अभियान से जुड़ने की पेशकश की और संस्थान की संरक्षक सदस्यता ग्रहण की। संस्थान के पूर्व संरक्षक सदस्य श्री राम प्रकाश मावी जी ने कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन किया।

इस अवसर पर पूर्व प्रधान मंत्री लालबहादुर शास्त्री जी की स्मृति को भी नमन किया गया। उनकी सादगी पूर्ण जीवनचर्या के संदर्भ भी साझा किए गए।










Sunday, 4 October 2026

🕉️ *जश्न-ए-तजुर्बात-2026**अनुभवों का उत्सव*


अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस के अवसर पर, *ओम विश्रांति चैरिटेबल सोसाइटी* एवं *नवरत्न फाउंडेशन्स* के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वार्षिक संगीतमय एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा वरिष्ठ नागरिक सम्मान समारोह — *जश्न-ए-तजुर्बात-2026*रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को शाम 5:00 बजे से रात्रि 9:00 बजे तक इंदिरा गांधी कला केंद्र, बी-110, सेक्टर-6, नोएडा मनाया गया। कार्यक्रम में 90 वर्ष से अधिक अति वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान किया गया।

प्रसिद्ध डैशिंग ही-मैन एवं सुपरस्टार अभिनेता धर्मेंद्र जी पर फिल्माए गए लोकप्रिय गीतों की मनमोहक संगीतमय प्रस्तुति, वरिष्ठ नागरिकों द्वारा की गई। मंच का संचालन डॉ. अशोक श्रीवास्तव ने किया।

     श्रीमती ज्योति सक्सेना अध्यक्ष, (ओम विश्रांति

📞 9811899444) ने  इस विशेष कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ नागरिकों का धन्यवाद किया। अपने साथ वृंदावन से लाई 80 विधवा महिलाओं काे जिनकी वे देखभाल करती हैं, उनको भी मंच पर बुलाया। ज्योति जी के इस काम की सभी सराहना कर रहे थे।

https://www.instagram.com/reel/DeFNXauy3M3/?stkn=YmtjNGNiNzNqdXRr







Saturday, 3 October 2026

महिलाओं की भजनों की डायरी! और भजन-कीर्तन A Diary of Devotional Songs for Women! And *Bhajan-Kirtan*Neelam Bhagi नीलम भागी

 



ज्यादातर होम मेकर महिलाओं की भजनों की डायरी शारदीय नवरात्र, चैत्र नवरात्र और अब 10 दिवसीय गणपति उत्सव में निकलती है। उसमें इन दिनों  कई भजनों का इज़ाफ़ा भी हो जाता है। भजनों की डायरी देखते ही मुझे अपनी अम्मा बहुत याद आती है। 96वें की उम्र तक वह अपनी डायरी संभाल के रखती। रात में कभी-कभी डायरी निकाल के भजन गुनगुनाती। लिंक पर क्लिक करके देखें https://www.facebook.com/share/v/1RRPdECyta/

उनके बाजू में मैं सोती और अगर मैं उनकी डायरी उठाकर कोई भजन गुनगुनाती तो मेरा भजन खत्म होने तक वह मुझे देखती रहतीं, 90 साल के बाद में  ऊंचा सुनने लगीं थीं और मैं धीरे गाती थी जैसे मेरा मुंह बंद होता, तुरंत अम्मा मेरे हाथ से झट से, अपनी डायरी लेकर पर्स में रखती। अम्मा के भजनों की डायरी बहुत कीमती दस्तावेज! था जिसे उन्होंने कह रखा था कि आशा को देना। वह मेरे साथ बहुत सुंदर गवाती है। उनके स्वर्गवास होने पर आशा जी को उनकी डायरी दी इसके कई पेज निकले हुए थे पुरानी जो बहुत थी। 😃 आशा भाभी जी ने भी बड़े सम्मान से ली।

आजकल तो ज्यादातर महिलाएं मोबाइल में देखकर भजन गाती हैं। 95वें साल में मैं भी अम्मा को मोबाइल में, मोहम्मद रफी के गाए भजन निकाल देती थी, अम्मा पढ़ के साथ-साथ स्वर मिला कर गाती थी। लिंक पर क्लिक करके सुने https://www.instagram.com/reel/DGEEC_FTqAF/?stkn=OGg2b3NmamoxeGFw

अब हमारे सेक्टर में छाया आर्य जी के घर में 10 दिवसीय गणपति उत्सव मनाया गया है। जिसमें आमंत्रित श्रद्धालु महिलाओं द्वारा प्रतिदिन शाम को 4:00 से 7:00 बजे तक भजन कीर्तन होता था। मेरे घुटने में दर्द था, इलाज चल रहा है। छाया जी का घर मेरे घर के पास है। धीरे-धीरे किसी तरह चली जाती। भाव प्रधान भजन होते, ढोलक मंजीरे के साथ सब मिलकर कीर्तन करते। घुटने का दर्द याद भी नहीं रहता था। पता नहीं क्यों मुझे महिलाओं की भजन की डायरियां देखना, बहुत अच्छा लगता है। जिसे भजन गाने के तुरंत बाद, वे अपने बैग में रख लेती हैं। इस भजन कीर्तन में बहुत श्रद्धा भाव होता और जमकर भक्ति नृत्य भी होता। एक दिन कीर्तन में भजन गाने का मुझे भी जोश आ गया। मैंने अपने पास में बैठी एक भाभी से कहा, " अपनी जरा डायरी दिखा दो, शायद इसमें मेरी पसंद का कोई भजन मिल जाए जिसकी धुन मैं ठीक से गा सकूं।" वह भाभी स्कूली छात्रा की तरह मेरे मोबाइल की तरफ इशारा करके बोली, "अपने मोबाइल से ढूंढ कर गाओ ना।" और डायरी तुरंत बैग में डालकर बैग का मुंह बंद कर दिया। मुझे उनकी इस हरकत पर बहुत मज़ा आया। भोजन प्रसाद के समय मैं हंसते हुए दूसरी भाभियों से उनकी शिकायत करने लगी, "देखो मैंने इनसे डायरी मांगी थी, कोई पीएचडी की थीसिस थोड़ी मांगी, इन्होंने मुझे नहीं दिखाई।" वह मुझे कहें, "तुम अब ले लो।" और डायरी दे रहीं  पर मुझे तो मज़ाक सूझ  रहा था। मैं बोली, "इनकी वजह से मेरा भजन गाना शुरू नहीं हुआ।"  कीर्तन से आने के बाद थोड़ा पढ़ने लिखने के बाद मैं सो जाती। और दर्द सहने लायक लगता। पर उस दिन आकर मैंने भगवान कृष्ण को कौन किस-किस नाम से पुकारता था, लिखकर एक भजन बनाया और अगले दिन ताज़ा ताज़ा गा भी दिया। इस प्रकार हंसते, बतियाते, गणपति उत्सव में शाम के कीर्तन में श्रद्धा भक्ति से गाए सुने, सामान्य भजनों ने मन में प्रसन्नता के साथ सकारात्मक ऊर्जा भी फैलाई। मोबाइल के समय में अम्मा के समय से चली आ रही डायरियां भी नजर आई।💐🙏😃

Monday, 28 September 2026

संगीत संध्या *“विरासत-ए-मुकेश”Musical Evening *“Virasat-e-Mukesh”

 


मुकेश जी की आवाज़ वह है जो कभी नहीं मर सकती, बल्कि वो दिलों में विरासत बनकर सैदेव जीवित रहेगी

Harmony Waves-Khurja के तत्वावधान में RJ Kapil Tiwari ने सभी संगीत प्रेमियों  को एक विशेष संगीत संध्या *“विरासत-ए-मुकेश”* में आमंत्रित किया।

यह कार्यक्रम *महान पार्श्वगायक मुकेश जी* को भावभीनी श्रद्धांजलि है—उनकी अमर आवाज़, कालजयी रचनाओं और उनके गीतों में समाई मानवीय संवेदनाओं की अविरल धारा को समर्पित है ।

मुकेश जी के गीत केवल गीत नहीं, बल्कि जीवन के हर पड़ाव पर हमारे साथ चलने वाली भावनात्मक यात्रा हैं—प्रेम, विरह, वेदना, संघर्ष, आशा और जीवन के सौंदर्य को स्वर देने वाली अनमोल धरोहर हैं।

विरासत-ए-मुकेश”में उसी अमिट विरासत को सुरों, स्मृतियों और समर्पण के साथ पुनः जीवंत करने का प्रयास किया गया है।

अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से उनके अमर गीतों संग कुछ अनसुने गीतों की माला को भी फिर से जीवंत किया जिन्होंने पीढ़ियों के दिलों पर राज किया है।

विरासत-ए-मुकेश🎶*यादों की महफ़िल… सुरों की विरासत एक संगीतमय श्रद्धांजलि का आयोजन डॉ. अशोक श्रीवास्तव संयोजक एवं समस्त आयोजन समिति

*Harmony Waves-Khurja* एवं RJकपिल तिवारी व कल्पना तिवारी* ने किया। इस विशेष अवसर पर  संगीत प्रेमियों को दिनांक: 27 सितम्बर 2026. शाम 5:00 बजे से NEA Bhawan Auditorium, B-110A, सेक्टर-6, नोएडा में आमंत्रित किया। लाज़वाब संगीतमय संध्या में प्रसिद्ध एवं प्रतिभाशाली कलाकारों की प्रस्तुतियां सराहनीय रहीं।

https://www.instagram.com/reel/Dd1UF3Kg8xy/?stkn=MW1qYmcxNmVzdXBxNA==










Saturday, 26 September 2026

हमारे सेक्टर में गणपति उत्सव गणेश उत्सव सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक विचार है। Ganesh Utsav is not just a festival; it is an idea. Ganpati Utsav in our sector... Neelam Bhagi नीलम भागी

 


गणपति उत्सव का मेरे मन में बड़ा उत्साह रहता है। स्वतत्रंता सेनानी समाज सुधारक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा रोपा पौधा सार्वजनिक गणेश उत्सव, जो आज विशाल वट वृक्ष बन गया है जिसकी शाखाएं पूरे देश में जम गईं हैं। 10 दिनों तक चलने वाला सबसे बड़ा त्यौहार है। हमारे सेक्टर 11 में श्री हनुमान मंदिर एल ब्लॉक में 3 दिन के लिए गणपति विराजे, श्रद्धालु सुबह शाम आरती के लिए और शाम को भजन कीर्तन के लिए जाते। बंसल परिवार (H-48) में एक दिन के लिए गणपति उत्सव का आयोजन किया। 11:00 से 1:00 तक महिलाओं ने भजन कीर्तन किया। वीना बंसल की मम्मी अनुराधा महेशकर, हमेशा गणपति बिठाती थीं, उनके कनाडा जाने पर  बंसल परिवार गणपति का आवाहन करते हैं।   https://www.instagram.com/reel/DdTafjmAwSn/?stkn=d3lpMHc3NnppcXJi

छाया आर्य जी के परिवार में 10 दिवसीय गणपति उत्सव मनाया गया।  इन दिनों आने वाले विश्वकर्मा पूजा, राधा  अष्टमी भी हर्षोल्लास से मनाई गई।

https://www.facebook.com/share/v/18Q4SbuLYL/

प्रतिदिन शाम 4:00 बजे से 7:00 तक भजन कीर्तन और आरती की जाती। छाया जी द्वारा आमंत्रित महिलाओं ने बहुत श्रद्धापूर्वक भजन कीर्तन किया। इनमें कोई भी प्रोफेशनल नहीं था। घरेलू महिलाओं द्वारा भावपूर्वक गाए भजन और भक्ति नृत्य से अलग सा समा बंध जाता था। कोई किसी को नाचने को नहीं कहता था। अपने आप उठकर महिलाएं खूब नाचती थीं ।

https://www.instagram.com/reel/DdrRvWzSV6q/?stkn=OHFvY3U1d2UzNDE0

सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि महिलाओं की रचनात्मक बाहर आई। कुछ महिलाएं जो नहीं गाती थी, उन्होंने भी भजन गाए। 10 दिन तक हमारा सेक्टर गणपतिमय  रहा।  https://www.instagram.com/reel/Ddgn3hoAIAP/?stkn=dGc1

https://www.instagram.com/reel/Ddx-VmtgRhz/?stkn=OGNpdnM4ajBoa2h6

दुग्गल परिवार(P-21, Sector 11) ने 10 दिन तक गणपति को अपने यहां बैठाया, पूजा अर्चना की।  गणपति विसर्जन अपने पारिवारिक मित्रों, रिश्तेदारों और सेक्टर वासियों के साथ बहुत हर्षोल्लाह से किया। https://www.instagram.com/reel/Ddt8uC9SMos/?stkn=MXAyZ3BsdjVucnJncQ==

   तिलक ने हमारे अग्रपूज्य, दक्षिण भारत के कला शिरोमणि गणपति को, 1893 में पेशवाओं के पूज्यदेव गजानन को बाहर आंगन में विराजमान किया था। आम आदमी ने भी, छुआछूत का भेद न मानते हुए पूजा अर्चना की, सबने दर्शन किए। उस समय का उनका शुरु किया गणेशोत्सव, राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बना और समाज को संगठित किया। आज यह पारिवारिक उत्सव, समुदायिक त्योहार बन गया है।

कई दिन से अस्थाई दुकानों में बरसात से बचाते हुए, हर साइज के गणपति सजे रहते हैं।

  इस वर्ष मैं घुटने की तकलीफ के कारण, अपने घर में  ही गई हूं।  गणेश चतुर्थी से अनंत चतुदर्शी तक होने वाले  सांस्कृतिक कार्यक्रमों  को अपनी कल्पना में, मैं तिलक की आजादी की लड़ाई से इसे जोड़ती जाती थी । इनके द्वारा ही समाज संगठित हो रहा था, आम आदमी का ज्ञान वर्धन हो रहा था और छुआछूत का विरोध हो रहा था। आवाहन से लेकर विर्सजन तक श्रद्धालु, आरती, पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगभग सभी उपस्थित रहते थे ।

    घरों में भी गणपति 1,3,5,7 या 9 दिन बिठाते हैं। गौरी पूजन, दो दिन लक्ष्मी पूजन, छप्पन भोग आदि के निमन्त्रणों में सब व्यस्त रहते हैं। गणपति से मिलने बेटियां भी मायके आती हैं और बहुएं भी मायके जाती हैं।

   शाम को आरती के बाद कीर्तन होता। उसमें नाचते गाते हैं। मंगलकारी बप्पा साल में एक बार तो आते हैं। इसलिए उनके सत्कार में कोई कमी न रह जाए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार मोदक, लड्डू के साथ तरह तरह के व्यंजनों का भोग लगाते हैं। जो सब मिल जुल कर, प्रशाद में खाते हैं।  संबंधियों मित्रों के साथ आनंद पूर्वक नाच भी लेते हैं।       

     विर्सजन के दिन  बड़ी श्रद्धा से गणपति गोद में लेते हैं। ढोल की ताल पर उनके पैर चलते हैं। उनके चेहरे से टपकती श्रद्धा को तो मैं लिखने में असमर्थ हूं। इसमें ढोल से ज्यादा ऊंची आवाज़ में श्रद्धालु जयकारे लगा रहे थे,’’गणपति बप्पा मोरिया, अगले बरस तूं जल्दी आ।’’ और भक्ति भाव से किए उन नृत्यों को जिन्हें मैंने विर्सजन जूलूस में देखा है उसे दुनिया का कोई भी कोरियोग्राफर नहीं करवा सकता। गणपति के आकार में और जूलूसों में श्रद्धालुओं की संख्या में फर्क था पर चेहरे के भाव को दिखाने के माप का अगर यंत्र होता तो सबका एक ही होता।

    पर सब गणपति से विनती कर रहें हैं ’’ अगले बरस तूं जल्दी आ।’’

महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। 

 गणपति उत्सव की शरूवात, सांस्कृतिक राजधानी पुणे से हुई थी। शिवाजी के बचपन में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कस्बा में गणपति की स्थापना की थी। तिलक ने जब सार्वजनिक गणेश पूजन का आयोजन किया था तो उनका मकसद सभी जातियों धर्मों को एक साझा मंच देना था। पहला मौका था जब सबने देव दर्शन कर चरण छुए थे। उत्सव के बाद प्रतिमा को वापस मंदिर में हमेशा की तरह स्थापित किया जाने लगा तो एक वर्ग ने इसका विरोध किया कि ये मूर्ति सबके द्वारा छुई गई है। उसी समय निर्णय लिया गया कि इसे सागर में विसर्जित किया जाए। दोनों पक्षों की बात रह गई। तब से विर्सजन शुरु हो गया।

दुग्गल परिवार के गणपति का रात आठ बजे विर्सजन हुआ।

प्रथम लेखक गणपति, शक्ति(लाल) समृद्धि(हरा) लाते हैं।   भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि, ज्ञान और नई शुरुआत के देवता माना जाता है। इसलिए कोई भी शुभ काम गणेश वंदना से ही शुरू होता है। मान्यता है कि इन 10 दिनों में गणपति पृथ्वी पर अपने भक्तों के बीच रहते हैं। 





Saturday, 19 September 2026

बुलावे सांवरिया राधिके आ जाइओ राधा अष्टमी उत्सव Radhaashtami festival Neelam Bhagi नीलम भागी

 


आज हमारे सेक्टर में छाया जी के निवास पर आयोजित दस दिवसीय गणपति उत्सव में राधा अष्टमी का त्यौहार बहुत हर्षोल्ला से मनाया गया। महिलाएं सज धज कर खूबसूरत रंग बिरंगी पोशाकों में इस आयोजन में सम्मिलित हुई। उत्सव की खुशी उनके द्वारा गाए गए भजनों और नृत्य से झलक रही है। छाया जी ने सभी महिलाओं को खूबसूरत चुनरिया औढ़ाई। नाचती गाती हुई मुझे तो सभी राधा रानी लगने लगी। देखने के लिए लिंक पर क्लिक करें।https://www.instagram.com/reel/Ddgn3hoAIAP/?stkn=dGc1czVnMWZqZWdi

https://www.facebook.com/share/v/18Q4SbuLYL/

राधाष्टमी का त्योहार परंपरागत रूप से ब्रज, बरसाना, मथुरा वृंदावन के आसपास के क्षेत्र के साथ उत्तर भारत में मनाते हैं। मंदिरों में कीर्तन का आयोजन किया जाता है। महान शास्त्रीय संगीतकार, संगीतज्ञों के आराध्य, ध्रु्रपद के जनक, स्वामी हरिदास का जन्म भी इसी दिन हुआ था। बैजू बावरा, तानसेन जेैसे दिग्गज संगीतज्ञ उनके शिष्य थे। इनके जन्मोत्सव पर विश्वभर के शास्त्रीय संगीतज्ञ उन्हें भावांजलि देने, स्वामी हरिदास संगीत एवं नृत्य महोत्सव में आते हैं।













Thursday, 17 September 2026

मशीनों को ही भगवान मानकर पूजा की जाती है विश्वकर्मा जयंती On Vishwakarma Jayanti, machines themselves are worshipped as God. Neelam Bhagi नीलम भागी

 

इस बार विश्वकर्मा जयंती गणपति उत्सव में आई है। हमारे सेक्टर में माया देवी परिवार में मनाये जाने वाले गणपति उत्सव में, देवताओं के शिल्पकार, इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा जी का भी स्मरण किया गया। फैक्ट्री में सृजन, निर्माण, वास्तुकला, औजार, शिल्पकला, मूर्तिकला एवं वाहनों के देवता विश्वकर्मा की जयंती मनाई गई । कारीगरों का यह उत्सव का दिन है। सब एक जगह इक्कट्ठा होकर पूजा करते हैं।

मान्यता है कि इन्होंने ही द्वारका नगरी, इंद्रपुरी, रावण की लंका और भगवान के सारे अस्त्र-शस्त्र बनाए थे।

फैक्ट्री, वर्कशॉप, मशीन, औजार, कंप्यूटर, इंजीनियर, मिस्त्री, कारीगर, फैक्ट्री वर्कर, आर्किटेक्ट, इस दिन मशीनों को ही भगवान मानकर पूजा करते हैं।

Thursday, 3 September 2026

"त्योहारों और बदलाव" का महीना है न सितम्बरSeptember is the month of festivals and change, isn't it? Neelam Bhagi नीलम भागी

 


मानसून खत्म होने को है, फसल तैयार है और गर्मी कम हो रही है तो हल्की ठंड की शुरुआत होने लगती है। इसलिए सितम्बर  को "त्योहारों और बदलाव" का महीना कहते हैं।सोलंग महोत्सव (1 से 5 सितंबर)अरुणाचल प्रदेश (आदि जनजाति द्वारा) यह एक कृषि उत्सव है। इसमें फसल की देवी किने नाने और पशुओं के देवता दादी बोते की पूजा की जाती है। पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक दावतें इसका मुख्य आकर्षण हैं। मोंगमोंग फेस्टिवल (1से 6 सितम्बर) नागालैंड के ओओ नागा समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला फसल और धन्यवाद उत्सव है । यह नागालैंड के सांताम जनजाति का छह दिवसीय प्रसिद्ध फसल कटाई उत्सव भी है। उत्सव का मुख्य बिंदु

"एकता और हमेशा साथ रहना" है। छह दिनों का मुख्य क्रम है। पहला दिन तैयारी और सामान जुटाना दूसरा दिन पारंपरिक अनुष्ठान और आशीर्वाद तीसरा दिन चूल्हे के तीन पत्थरों की पूजा और भोजन अर्पण चौथा दिन सामुदायिक सफाई और रास्ते ठीक करना पाँचवां दिन दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना, उपहारों का आदान-प्रदान। छठा दिन समापन प्रार्थना और बुरी ताकतों से बचाव के उपाय। कान्हा के जन्म (4 सितम्बर ) की खुशी हम ऐसे मनाते हैं जैसे परिवार में बालक का जन्म हुआ हो। मंदिरों में सजावट की जाती है। छोटे-छोटे बच्चों को कृष्ण के बाल रूप में सजाया जाता है। जगह-जगह कीर्तन होते हैं। लोग व्रत रखते हैं और कान्हा के जन्म के बाद व्रत का पारण करते हैं। महाराष्ट्र में जगह-जगह दही हांडी लगाई जाती है। कान्हा के बाल सखा बने युवक इसे फोड़ने की प्रतियोगिता में भाग लेते हैं। दक्षिण भारत में यह उत्सव 8 दिन तक मनाया जाता है। श्री कृष्णजन्माष्टमी के ठीक अगले दिन आता है, गोगा नवमी का पावन पर्व, 5 सितंबर को मनाया जाएगा।   इस दिन वीर गोगाजी (जाहरपीर) की पूजा की जाती है, जिन्हें सांपों से रक्षा करने वाला लोक देवता माना जाता है। भक्तगण अपने परिवार की रक्षा और कल्याण के लिए व्रत रखते हैं। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित गोगामेड़ी में इस अवसर पर विशाल मेला लगता है। इनको हिंदू और मुसलमान दोनों मानते हैं। हिंदुओं के गोगा वीर जी हैं और मुसलमान इन्हें जाहर पीर कहते हैं।

बैल पोला का  पारंपरिक त्योहार 10 सितंबर (श्रावण अमावस्या) को मनाया जाएगा। मवेशियों का उपकार मानना, हमारी भारतीय संस्कृति में अलग अलग रूपों में दिखाई देता है। मसलन पोला महोत्सव महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक के किसानों द्वारा मनाया जाता है। इस त्यौहार की तैयारी में बैलों को नहलाकर, उनकी तेल से मालिश करना, सींगों को रंग कर, नई लगाम और रस्सियाँ बदली जाती हैं। उन्हें शॉल, घंटियों और फूलों से सजाया जाता है। संगीत और नृत्य के साथ जुलूस के रूप में सब मवेशी गाँव के मैदान में ले जाये जाते हैं। सबसे पहले मैदान से बाहर जाने वाला एक बूढ़ा बैल होता है, उसके सींगों पर लकड़ी का फ्रेम(माखर) बंधा होता है। दो खंबों के बीच आम के पत्तों की रस्सी का बंधा तोरण होता है। वह माखर से इस तोरण को तोड़ता है। उसके पीछे सब मवेशी चलते हैं। कुछ की टांगों में घुंघरू भी बंधे होते हैं। जब जुलूस से मवेशी वापस आते हैं। तो परिवार उनकी पूजा की तैयार थाली, जिसमें घी का दिया, कुमकुम, पानी और मिठाई, पूरनपोली के साथ स्वागत करता है। गऊ माता को भी पूजता है। पोला के दिन किसान अपने बैलों से खेतों में काम नहीं करवाते। उन्हें बाजरे की खिचड़ी खिलाते हैं। किसान परिवार के साथ खेतों में मवेशियों ने भी बुआई, सिंचाई में मेहनत की है। किसान धूमधाम से ’बैल पोला’ उत्सव मना कर उनका धन्यवाद करते हैं। किसान परिवारों द्वारा खेती में बैलों के अमूल्य योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाने वाला एक प्रमुख उत्सव है और बच्चे मिट्टी या लकड़ी से बने नंदी बैल को सजाकर यह पर्व मनाते हैं।।


  नीलमपेरूर पडायनी (11 सितंबर): केरल के अलप्पुझा जिले में भगवती मंदिर में पारंपरिक कला और सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। वराह जयंती (13 सितंबर) को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु के तीसरे (वराह) अवतार को समर्पित है।

भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए यह रूप लिया था।

उत्तर भारत में महिलाओं का उत्सव हरतालिका तीज और दक्षिण भारत में इस व्रत को’’गौरी हब्बा’’(14 सितम्बर) के नाम से जाना जाता है। इस त्यौहार में प्रकृति ने हरियाली की चादर ओढ़ी होती है। इस दिन को भोलेनाथ और माता पार्वती के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। हरे भरे पेड़ो पर झूले पड़ जाते हैं। कहीं कहीं यह उत्सव तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन मायके से सिंधारा में घेवर मिठाई, मेहंदी, चूड़ियां आदि सुहाग की चीजे आतीं हैं। दूसरे दिन मेहंदी हाथ पैरों में लगाई जाती है। अगले दिन सौभाग्यवती महिलाएं निर्जला व्रत कर, पकवान बनाती हैं और हरी पोशाक पहने, श्रृंगार करके पति की लंबी आयु के लिए शिव पार्वती की पूजा कर, सास को बायना देती हैं। नई बहू को पहली तीज में मैके भेज दिया जाता है। तीज पर ससुराल से बहू के लिए सिंधारा जाता है। हमारे लोकगीतों में भी हरियाली, झूले, रिमझिम वर्षा की फुहारों में झूलती गाती सखियां होती हैं। पहले छोटी आयु में बेटियों की शादी हो जाती थी। पहला तीज उत्सव वह पुरानी सखियों के साथ मना जातीं है। हिंदू धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता है, सबके योग्य नियमों की लचीली व्यवस्था भी करता है। महानगरों की कामकाजी महिलाएं छुट्टी न होने से परिवार में नहीं जा पातीं, इसलिए जहां तीज महोत्सव का आयोजन किया जाता है, वहां पहुंच कर सखियों से मिल कर नाच गा भी लेती हैं। 


गौरी हब्बा गणेश चतुर्थी से एक दिन पूर्व मनाया जाता है। यह माना जाता है कि इस दिन गौरां, इस तरह घर में आती है, जिस तरह कोई साधारण स्त्री अपने माता पिता के घर आती है। अगले दिन उनके पुत्र गणपति ऐसे आते हैं जैसे अपनी मां पार्वती को कैलाश पर्वत ले जाने आए हों। गणेशोत्सव(14 से 25 सितम्बर) दस दिन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु गणपतिमय रहता है। बप्पा के आवाहन से लेकर विर्सजन तक श्रद्धालु, आरती, पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में, लगभग सभी उपस्थित रहते हैं। घरों में भी गणपति 1,3,5,7,9 दिन बिठाते हैं। इसमें गौरी पूजन, दो दिन महालक्ष्मी पूजन, छप्पन भोग हैं।

त्यौहार के बीच में बेटियां भी गणपति से मिलने मायके आती हैं और बहुएं भी मायके जाती हैं। मुंबई में मैंने देखा, सामने फ्लैट में एक परिवार ने गणपति बिठाए तो उनके तीनों भाइयों के परिवार, दूसरे शहरों से वहीं आ जाते हैं। पूजा तो हर समय नहीं होती, बच्चे आपस में घुल मिल जाते हैं। महिलाओं पुरुषों की अपनी गोष्ठियां चलती हैं। अष्टमी को ऐसा माना जाता है कि इस दिन गौंरा अपने गणपति से मिलने आती हैं। उपवास रखकर, कुल्हड़ गुड़ियों के रुप में गौरी को पूजते हैं और सबको भोजन कराते हैं। दक्षिणा उपहार देते हैं पर उस दिन नियम है कुछ भी, जूठन(सभ्य लोग हैं जूठा नहीं छोड़ते) तक नहीं फेंकते। यहां तक कि पान खिलाया तो उसका कागज भी दहलीज से बाहर नहीं डालते। अगले दिन दक्षिणा उपहार ले जा सकते हैं। शाम को आरती के बाद कीर्तन होता है। मंगलकारी बप्पा साल में एक बार तो आते हैं इसलिए उनके सत्कार में कोई कमी न रह जाए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार मोदक, लड्डू के साथ तरह तरह के व्यंजनों का भोग लगाते हैं। जो सब मिल जुल कर, प्रशाद में खाते हैं। थोड़ी सी जगह में संबंधियों, मित्रों के साथ आनंद पूर्वक नाच भी लेते हैं। सोसाइटी के गणपति उत्सव में सबकी भागेदारी होती है।

आनंद चर्तुदशी के दिन गणपति विर्सजन होता है। नाचते हुए गणपति से विनती करते हुए कहते हैं कि अगले बरस तूं जल्दी आ और विर्सजन जूलूस में जाते हैं।  

गणपति विसर्जन की कथाएं बड़ी रोचक हैं। महर्षि वेदव्यास महाभारत की कथा लिखना चाह रहे थे पर उनके विचार प्रवाह की रफ्तार से, कलम साथ नहीं दे रही थी। उन्होंने गणपति से लिखने को कहा। उन्होंने लिखना स्वीकार किया पर पहले तय कर लिया कि वे लगातार लिखेंगे, जैसे ही उनका सुनाना बंद होगा, वह आगे नहीं लिखेंगे। महर्षि ने भी गणपति से प्रार्थना कर, उन्हें कहा,’’ आप भी एडिटिंग साथ साथ करेंगे।’’ गणपति ने स्वीकार कर लिया। जहां गणपति करेक्शन के लिए सोच विचार करने लगते, तब तक महर्षि अगले प्रसंग की तैयारी कर लेते। वे लगातार कथा सुना रहे थे। दसवें दिन जब महर्षि ने आखें खोलीं तो पाया कि गणपति के शरीर का ताप बढ़ गया है। उन्होंने तुरंत पास के जलकुंड से जल लाकर उनके शरीर पर प्रवाहित किया। उस दिन भाद्रपद की चतुर्दशी थी। इसी कारण प्रतिमा का विर्सजन चतुर्दशी को किया जाता है। महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। 

   गणपति उत्सव की शुरूवात, सांस्कृतिक राजधानी पुणे से हुई थी। शिवाजी के बचपन में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कस्बा में गणपति की स्थापना की थी। तिलक ने जब सार्वजनिक गणेश पूजन का आयोजन किया था तो उनका मकसद सभी जातियों धर्मों को एक साझा मंच देना था। पहला मौका था, जब सबने देव दर्शन कर चरण छुए थे। उत्सव के बाद प्रतिमा को वापस मंदिर में हमेशा की तरह स्थापित किया जाने लगा तो एक वर्ग ने इसका विरोध किया कि ये मूर्ति सबके द्वारा छुई गई है। उसी समय निर्णय लिया गया कि इसे सागर में विसर्जित किया जाए। दोनों पक्षों की बात रह गई। तब से गणपति विर्सजन शुरु हो गया। हर प्रांत के लोग गणपति उत्सव मनाते हैं क्योंकि दक्षिण भारत के कला शिरोमणि गणपति तो सबके हैं। तिलक ने गणेश उत्सव द्वारा, अंग्रेजों के विरुद्ध सबको संगठित किया था। आज देश विदेश में भारतवासी इसे मिलजुल कर ही मनाते हैं। 

    लोकमान्य तिलक के लगाए पौधे की शाखाएं देशभर में फैल गईं हैं। आनंद चतुर्दशी को गणपति विर्सजन होता है और जहां रामलीला होती है, उस स्थान का भूमि पूजन होता है।

सृजन, निर्माण, वास्तुकला, औजार, शिल्पकला, मूर्तिकला एवं वाहनों के देवता विश्वकर्मा की जयंती (17 सितम्बर) को मनाई जायेगी। कारीगरों का यह उत्सव का दिन है। सब एक जगह इक्कट्ठा होकर पूजा करते हैं और फिर मूर्ति का विर्सजन करते हैं।

ऋषि पंचमी (15 सितंबर) इस दिन सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) की पूजा की जाती है। बलराम जयंती (हल षष्ठी / ललही छठ) , 16 सितंबर को मनाई जाएगी।

मीनाक्षी अम्मन मंदिर कुंभाभिषेकम (17 सितंबर): मदुरै, तमिलनाडु में ऐतिहासिक मीनाक्षी अम्मन मंदिर का यह विशेष अनुष्ठान लगभग 17 साल के अंतराल के बाद आयोजित हो रहा है।

राधाष्टमी(18 सितम्बर) का त्योहार परंपरागत रूप से ब्रज, बरसाना, मथुरा वृंदावन के आसपास के क्षेत्र के साथ उत्तर भारत में मनाते हैं। मंदिरों में कीर्तन का आयोजन किया जाता है। महान शास्त्रीय संगीतकार, संगीतज्ञों के आराध्य, ध्रु्रपद के जनक, स्वामी हरिदास का जन्म भी इसी दिन हुआ था। बैजू बावरा, तानसेन जेैसे दिग्गज संगीतज्ञ उनके शिष्य थे। इनके जन्मोत्सव पर विश्वभर के शास्त्रीय संगीतज्ञ उन्हें भावांजलि देने, स्वामी हरिदास संगीत एवं नृत्य महोत्सव में आते हैं।

लेह लद्दाख महोत्सव(20 से 25 सितम्बर) का मुख्य उद्देश्य लदृदाख की समृद्ध संास्कृतिक, विरासत और परंपरा को पुर्नजीवित कर देश दुनिया के सामने लाना है। सात दिवसीय यह उत्सव जम्मू-कश्मीर पर्यटन, स्थानीय समुदायों जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित किया जाता है। लेह के विभिन्न क्षेत्रों से मंडलियां, स्थानीय नेता, स्कूली बच्चे और नर्तक पारंपरिक पोशाक में शामिल होते है। सब धुनों पर नृत्य करते चलते हैं। इस त्यौहार के मुख्य आर्कषण हैं संगीत, रंगमंच, पोलो, तीरंदाजी, मुखौटा और स्थानीय कला और शिल्प आदि। लोक नृत्य और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों के साथ लद्दाखी भोजन, स्थानीय व्यंजन मसलन सेल रोटी, खंबीर, मामोज, खंपा का देश दुनिया के लोग आनन्द उठाते हैं।

हेइक्रू हिदोंगबा (22 सितंबर): मणिपुर तिथि   (पारंपरिक चंद्र कैलेंडर के अनुसार)विशेषता: यह एक ऐतिहासिक और धार्मिक नौका दौड़ उत्सव है। इसमें लंबी और संकीर्ण नावों पर सवार होकर लोग पारंपरिक अनुष्ठान व प्रतियोगिता करते हैं। वामन जयंती (वामन द्वादशी 23 सितंबर) को है। इस दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था।

इस दिन भगवान विष्णु के पांचवें वामन रूप की पूजा की जाती है। जीरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक (24 से 27 सितंबर):जीरो वैली, अरुणाचल प्रदेश में यह भारत का सबसे बड़ा आउटडोर इंडी म्यूजिक फेस्टिवल है। इस उत्सव को बांस के बने मंचों और इको-फ्रेंडली तौर-तरीकों से आयोजित किया जाता है।  अरुणाचल प्रदेश के जीरो घाटी में होने वाला प्रसिद्ध इंडी-म्यूजिक और सांस्कृतिक उत्सव है ।

मिम कुट मिजोरम (कुकी-चिन-मिजो समुदाय) का मक्का की फसल के स्वागत से जुड़ा एक प्राचीन उत्सव है, जिसमें गीत-संगीत और लोक नृत्य किए जाते हैं। आमतौर पर उत्सव का दिन सितंबर के महीने की शुरुआत (निश्चित तिथि फसल और स्थानीय पंचांग पर निर्भर करती है) में मक्के की फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है। यह मिजोरम और पूर्वोत्तर भारत के मिज़ो-कुकी-ज़ो समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक पारंपरिक फसल और पूर्वजों की याद का त्योहार है। त्योहार में मुख्य पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना और भोजन अर्पित करना है। उत्सव में पारंपरिक संगीत, लोक नृत्य और सामूहिक दावत है।

हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष(26 सितम्बर से 10 अक्तूबर) का विशेष महत्व है। मान्यता है कि यमराज श्राद्ध पक्ष में पितरों को मुक्त कर देते हैं ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। पितरों के निमित्त किए गए तर्पण से पितर, तृप्त होकर वंशजों को आर्शीवाद देते हैं। जिससे जीवन में सुख समृद्धि प्राप्त होती है।

   दस दिन तक घर-घर में गणपति बप्पा, नई शुरुआत, बुद्धि और समृद्धि का प्रतीक बिठाये हैं।

गणेश विसर्जन यानि बप्पा को विदाई। "अगले बरस तू जल्दी आ" के साथ दी जाती है। फिर पितरों को याद करते हैं।"त्योहारों और बदलाव" का महीना है न सितम्बर।

 प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के सितंबर अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है।





Sunday, 23 August 2026

तुलसी जयंती समारोह Tulsi Jayanti Celebration

 


तुलसी जयंती समारोह प्रोफेसर लल्लन प्रसाद अध्यक्ष उत्तर प्रदेश समाज के निवास पर उल्लासपूर्वक मनाया गया। समारोह में श्री कलराज मिश्र राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल तथा केंद्र सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री, मुख्य अतिथि रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री वाई. डी. बनकटा आई. ए. एस. ने की। कार्यक्रम का संचालन कायाकल्प साहित्यिक कला फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ अशोक मधुप ने किया। 20 से अधिक कवियों और कवित्रियों ने बहुत सुंदर सरस काव्य पाठ किया। जिनमें  प्रोफेसर लल्लन प्रसाद, बाबा कानपुरी, डॉक्टर तूलिका सेठ, संगीता गोयल, हाशिम देहलवी आदि शामिल थे। सुश्री निशा केसरी ने कथक नृत्य से सब का मन मोह लिया।


अपने उद्बोधन में श्री कलराज मिश्र ने तुलसीदास की भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति देन की सराहना की और कहा 'नई पीढ़ी को मानस के अध्ययन के लिए प्रेरित करना चाहिए।'  

श्री वीरेश तिवारी महासचिव उत्तर प्रदेश समाज में ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। नगर के साहित्य प्रेमी नागरिकों की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

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