चूरू राजस्थान से आई लेखिका स्नेहलता जी और उनकी भाभी अनुसूया जी के साथ, मैंने हरिद्वार में रूम शेयर किया था। परिचय के बाद दोनों आपस में कहने लगी कि पानी का स्वाद मुंह में नहीं चढ़ रहा है। गर्मी थी जो वह पानी अपने घर से लाई थीं, वह बीकानेर तक खत्म हो गया था। मुझे सुनकर बड़ा अजीब लगा। बाद में पता चला कि वे बारिश का पानी स्टोर करते हैं, बड़े-बड़े टैंक बना रखे हैं और एक बूंद भी बरसात का पानी उनके घर का व्यर्थ नहीं जाता, सीधा टैंक में जाता है जो खराब नहीं होता है, पूरा साल चलता है। सुनकर बहुत अच्छा लगा। जितने भी मेरे दिमाग में इस सिलसिले में प्रश्न उठ खड़े हुए थे। सभी का जवाब बहुत संतोषजनक मिला। अखिल भारतीय साहित्य परिषद उत्तराखंड द्वारा हरिद्वार में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी 'नदी साहित्य' पर थी जिसमें मैं भी आमंत्रित थी। अब तक मैं परिषद के जिस भी कार्यक्रम में गई हूँ उसमें एक बतियाना सत्र श्रोताओं का अपने आप बन जाता है। जिसका कोई फॉर्मेट नहीं होता। ये चाय पर या भोजन पर समूहों में अलग अलग होता है। मसलन पवन पाण्डे पाली(राजस्थान) ने, झाँसी में अपना परिचय देते हुए बताया कि वे जहाँ से हैं वहाँ पानी की बहुत कमी रहती हैं। उन्होंने बताया कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग के द्वारा उनके पास अभी 50000 लीटर पानी है। भू जल स्तर बहुत गिर गया है। वाटर हारवेस्टिंग की ज़रुरत पर बात होने लगी। उनकी चर्चा सुनते हुए मेरी आँखों के आगे पानी बर्वाद करने वाले लोग आने लगे। कुछ ऐसे पढ़े लिखे लोग भी आने लगे जो गाड़ी खड़ी करने के लिए घर के आसपास कंक्रीट का फर्श बनवा देते हैं। मजाल है उसमें से एक बूंद भी वर्षा जल जमीन में चला जाए! उनको क्या नाम दें? पाठक बताएं।
लोकमंथन 2024 हैदराबाद में एक सत्र ऐसा था नाम मुझे नहीं याद आ रहा है उसमें एक बहुत लाज़वाब शॉर्ट फिल्म, लोक धुन के साथ दिखाई गई थी। जो आदिवासियों का एक रिवाज़ है जिसे हालमा (हुरमा )कहते हैं उस पर थी । इसमें मानसून शुरू होने से पहले सभी लोग इकट्ठे होते हैं। सभी के हाथों में टोकरा, कुदाल, बेलचा, फावड़ा होता है। जिससे वह गड्ढा खोदते हैं। उसे "हुरमा गड्ढा" कहते हैं।
इसे कई जगह *"हुरमा खोदना", "बुड़वा गाड़ना", "बांधा खोदना" भी कहते हैं। ये सिर्फ गड्ढा नहीं, बरसात को रोकने-समेटने का 1000 साल पुराना देसी तरीका है।हुरमा बारिश शुरू होने से 15-20 दिन पहले, ज्येष्ठ-आषाढ़ में आदिवासी खेत, गांव के बाहर, जंगल की ढलान पर गोल या चौकोर गड्ढे खोदते हैं।
ये गड्ढा लगभग 3 फीट गोल, 2-3 फीट गहरा। ऊपर थोड़ा चौड़ा, नीचे तंग -या मटके जैसा भी हो सकता है। इसका मकसद पानी रोकना = वाटर हार्वेस्टिंग =जल संचयन है। तेज बारिश का पानी बहकर नदी में चला जाता है। अब हुरमा गड्ढे में पानी रुक जाता है। जो धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल रिचार्ज करता है। 1 गड्ढा 5000 लीटर तक पानी जमीन में उतार देता है। जिससे मिट्टी बचती है। ढलान वाले खेत में बारिश से उपजाऊ मिट्टी बह जाती है। गड्ढा मिट्टी को पकड़ लेता है। जिससे अगली फसल के लिए खाद बन जाती है।
गर्मी में जब सब सूख जाता है, तो गड्ढे में पानी रहता है। हिरण, पक्षी, जंगली जानवर यहीं पानी पीते हैं। आदिवासी इसे "जीव-जल" कहते हैं।
गड्ढा खोदना सिर्फ काम नहीं, रिवाज है। इसलिए
पहला फावड़ा गांव का मुखिया या पुजारी "बुड़ा देव" का नाम लेकर पहला फावड़ा चलाता है।
पहले गड्ढे में थोड़ा महुआ, चावल, सिंदूर डालते हैं। ऐसा मानते हैं कि धरती माता खुश होगी और वर्षा का जल उसकी प्यास बुझाएगा और यह हुरमा गड्ढे पानी से लबालब भर जाएंगे।
यह सामूहिक श्रम भावना से जुड़ा है। पूरा गांव मिलकर खोदता है। एक दिन में 50-100 गड्ढे हो जाते हैं। काम के बाद ढोल पर नाचते हैं। इसी को "हुरमा नाच" कहते हैं।
गोंड आदिवासी छत्तीसगढ़-बस्तर, MP में "डबरी" या "बांधा" बोलते हैं। भील आदिवासी राजस्थान, MP में "खड़ीन" टाइप गड्ढे। सहरिया आदिवासी बुंदेलखंड में "खोंद" गड्ढे। वारली आदिवासी महाराष्ट्र में "पाडा" के पास गड्ढे खोदे जाते हैं।
बोरवेल सूख रहे हैं, बारिश अनियमित हो गई है। हमारे यहां 1100 से 12 00 mm वर्षा होती है जो विश्व औसत से कम नहीं है। हुरमा गड्ढा आदिवासियों की देसी वाटर हार्वेस्टिंग है। अपना 500 साल पुराना रिवाज वो धरती को खुश करने के लिए करते हैं , पर असल में धरती को पानी दे रहे हैं। आदिवासियों का ये हुरमा गड्ढा सबसे सस्ता और असरदार "क्लाइमेट सोल्यूशन" है।
5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर पेड़ लगाने का रिवाज़ है। मैं पेड़ पौधों में रुचि रखती हूं इसलिए यह ध्यान रखती हूं कि इस भीषण गर्मी में मेरे आस-पास जो पेड़ पौधे हैं, वह पानी की कमी से मरे नहीं। इससे पहले प्रशासन से उम्मीद करती हूं कि वह रेन वाटर हार्वेस्टिंग, जल संचयन के जितने भी उपाय हैं उसको मानसून से पहले दुरुस्त करें। पार्क के आसपास का पानी पार्क में जाए। भूजल स्तर बढ़ाने के लिए जो भी उपाय हो, किया जाए। मानसून के समय वन महोत्सव मनाए। पेड़ पौधे लगाए। लोगों को पौधे बीज बांटे। उस समय लगाए गए पौधे जम जाते हैं।
https://www.instagram.com/reel/DZH4_25A1VW/?igsh=Nmh3bmw1Mm9tNm5u


No comments:
Post a Comment