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Saturday, 29 February 2020

ऑरगेनिक पालक रसोई के कचरे से उगी नीलम भागी Organic Palak Rasoi ke Kacherey se Neelam Bhagi


चुम्मू बड़ा हो गया है। उसके बाथ टब में जहां से पानी निकलता है, उस पर मैंने एक ठिकरा रखा। उसमें मैंने रसोई का कचरा भरना शुरु किया बीच-बीच में थोड़ी सी छाछ पानी मिलाकर छिड़क देती। फल सब्जियों के छिलके, पत्ते सब उसी में मैंने डाले। जब वह भर गया तो मैंने 60% मिट्टी में गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट भी डाल सकते हैं, दो मुट्ठी नीम की खली(इससे कीड़ा नही लगता) डाल कर मिट्टी तैयार की। ये तैयार मिट्टी की मैंने चार इंच मोटा, कचरे पर  बाथ टब में फैला दी। हाथों से दबा कर उसे समतल कर लिया। अब उस पर पालक के बीज छिड़क दिये। दूर दूर छिड़केगे तो मोटे पत्ते मिलेंगे। पास छिड़कने पर छोटे मिलेंगे। अब इन बीजों को इसी मिट्टी से आधा या एक इंच मिट्टी से ढक दिया। पानी का छिड़काव इस प्रकार  किया कि बीज ढके रहें। नहीं तो उन्हें चिड़िया खा जायेगी। ये बुआई मैंने अगस्त के अंत में की थी। 5 से 20 डिग्री तापमान पर ये बहुत अच्छी उगती है। मैंने पालक को जड़ से नहीं उखाड़ा। जरुरत के अनुसार पत्तों को कैंची से काटा। अब उनमें बीज आ गये हैं। अब तक मैने कोई खाद नहीे डाली थी। पानी भी इतना डाला कि मिट्टी गीली रहे। इसे बोने के लिये गहरे बर्तन की जरुरत नहीं होती है। ये पालक बहुत ही लाजवाब बनती है।
 अब मैंने चार मिट्टी के गमले कचरे के तैयार करके इसी विधी से और पालक बोई है। गर्मी में मैं इसे   सीधी सूरज की रोशनी में नहीें रखती।

रसोई के कचरे का उपयोग
 किसी भी कंटेनर या गमले में ड्रेनेज होल पर ठीक  रखकर सूखे पत्ते टहनी पर किचन वेस्ट, फल, सब्जियों के छिलके, चाय की पत्ती बनाने के बाद धो कर आदि सब भरते जाओ बीच-बीच में थोड़ा सा वर्मी कंपोस्ट से हल्का सा ढक दो और जब वह आधी से अधिक हो जाए तो एक मिट्टी तैयार करो जिसमें 60% मिट्टी हो और 30% में वर्मी कंपोस्ट, या गोबर की खाद, दो मुट्ठी नीम की खली और थोड़ा सा बाकी रेत मिलाकर उसे  मिक्स कर दो। इस मिट्टी को किचन वेस्ट के ऊपर भर दो और दबा दबा कर, इस तैयार मिट्टी को 6 इंच, किचन वेस्ट के ऊपर यह मिट्टी रहनी चाहिए। बीच में गड्ढा करिए छोटा सा 1 इंच का, अगर बीज डालना है तो डालके उसको ढक दो।और यदि पौधे लगानी है तो थोड़ा गहरा गड्ढा करके शाम के समय लगा दो और पानी दे दो।





Monday, 24 February 2020

शहीद स्मारक स्थल इण्डिया गेट नीलम भागी Shaheed Smarak Sthal, IndiaGate Neelam Bhagi


शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।

मनोज शर्मा जी महामंत्री का मैसेज आया कि पुलवामा में शहीद हुए जवानों की बरसी पर इन्द्रप्रस्थ साहित्य भारती दिल्ली, प्रान्त (सम्बद्ध अखिल भारतीय साहित्य परिषद्) द्वारा शहीद स्मारक स्थल इण्डिया गेट पर एक कार्यक्रम विनोद बब्बर जी की अध्यक्षता में आयोजित किया गया है। साहित्यकार समय पर पहुंचे। राष्ट्रीय कवि डॉ. जयसिंह आर्य, पूनम माटिया, साहित्यकार प्रवीण आर्य, पंजाबी साहित्यकार जगदीश, संजीव सिन्हा, सुनीता बुग्गा, जितेन्द्र कुमारा सिंह, विवेक आर्य, विवेक कुमार आदि साहित्यकारों ने और सुन्दर लाल एडवोकेट ने अपनी रचनाओं द्वारा वीर शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पित किए। विनोद बब्बर जी ने अपने मन के उदगार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संचालन मनोज शर्मा ने किया।
साहित्यकारों ने फिर अमर जवान ज्योति पर अपनी श्रद्धाजंली अर्पित की। भारत सरकार द्वारा जो शहीद स्मारक स्थल इंडिया गेट पर बना है, उसका भ्रमण किया और महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं।
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।
  मैं सुनहरे अक्षरों में लिखे अपने वीर शहीदों के नाम देख रहीं हूं और जगदंबा प्रसाद मिश्र’हितैषी’ की ये रचना मेरे ज़हन में चल रहीं हैं। अपने शहीद वीरों के लिए देश के कोने कोने से लोग आकर नमन करते हैं। यहां तो प्रतिदिन मेले जैसा ही लगता है। 
अंत में प्रवीण आर्य जी ने सबको धन्यवाद दिया। 

















Monday, 17 February 2020

किताबों की दुनिया, भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान परंपरा भाग 7 नीलम भागी Bhartiye Drishtikon Aur Gyan ke Parampera part 7 Neelam Bhagi

  उत्कर्षिनी के चालीस दिन की होने पर उसे अपने मंदिर में माथा टिकाया, उसके  बाद मैं उसे बड़ेे मामा के कमरे में लेकर गई। उसे किताबे दिखाईं, वो टुकर टुकर किताबों को देख रही थी और मुझे लग रहा था कि वह उस  जगह से परिचित है। उसके जन्म से पहले मेरा सारा दिन उन किताबों में ही व्यतीत होता था। मुझे पंजाब मे टीचर की नौकरी के लिए दसवीं का पंजाबी का इम्तहान देना था। अब मैं पंजाबी पढ़ने लगी और परीक्षा की तैयारी करने लगी। मैं पढ़ती, ये उसी कमरे में शांति से सोती रहती। आठ महीने की बेटी लेकर मैं दिल्ली आ गई। बच्चों को पढ़ाती, उनके साथ ये पता नहीं कब पढ़ना सीख गई। मेरी मजबूरी समझकर, ये किताबों की दुनिया में मस्त हो गई। पहले बी.सी.रॉय. फिर ब्रिटिश और अमेरिकन लाइब्रेरी की मेम्बरशिप ली हुई थी। मैं साहित्य एकाडमी से दो किताबें लाती। दिन भर मैं व्यस्त रहती ,उन्हें अम्मा पढ़ती। रात को उत्कर्षिनी पढ़ते हुए सो न जाये, उन किताबों को मैं पढ़ती। दिन भर की थकी, मैं ही पढ़ते हुए सो जाती। अब हंसते हुए  उत्कर्शिनी बताती है कि आपके सोने के बाद वह उनको भी पढ़ जाती थी। मेरी बेटी क्या पढेगी? ये निश्चित मैंने किया, बेटी की रूचि नहीं देखी। बारहवीं तक उसे मैथ और बायोलॉजी दोनों सब्जेक्ट लेकर दिए, ये सोच कर कि मेडिकल में आ गई तो डॉक्टर बन जायेगी। इंजीनियरिंग के एंट्रेंस में आ गई तो इंजिनियर बन जायेगी। मैं इन प्रतियोगिता परीक्षाओं के आसपास से गुजरीं होती तो मुझे पता होता कि दो जगह तैेयारी करना कितना मुश्किल था!!  बेटी है न, आज्ञा दे दी। पढ़ने की उसे आदत थी, वो मेहनत करने लगी। आज लगता है कि मैं कितनी गलत थी!!  उसने मेरी इच्छानुसार इंजीनियरिंग की, एमबीए  किया। वहाँ जी़ नेट वर्क मीडिल ईस्ट में उसका कैंपस सलैक्शन हो गया था। सारे गामा पा मीडिल ईस्ट और पाकिस्तान सीजन टू में सीनियर मैनेज़र प्रोग्रामिंग, नॉर्थ अफ्रीका एंड पाकिस्तान , बीबीसी का माई बिग डीसीजन की स्क्रिप्ट राइटरं, पाँच साल में चार नामी शो दिए। फिर सब छोड़ कर फिल्म मेकिंग का र्कोस करने एन.वाई. एफ..ए. लॉस एजिंल्स अमेरिका चली गई। जो अब तक कमाया था, सब लगा दिया। वापिस आने पर जी़ ने जॉब कन्टीन्यू करने को कहा। पर ये मुंबई आ गई। संजय लीला भंसाली 2010 में फ्रीमैंटल इण्डिया के शो एक्सफैक्ट में दस महीने तक जज बने थे। वहाँ पर  उत्तकर्षिणी एसोसिएट क्रियेटिव डायरेक्टर थी।संजय लीला भंसाली ने प्रतिभागियों को जज करने के साथ उत्तकर्षिणी को भी जज कर लिया और उससे कहा कि इस शो के समापन के बाद तुम मुझसे मिलोगी। उत्तकर्षिणी का इण्डिया गौट टेलैंट के साथ कांट्रैक्ट था। उस शो के खत्म होते ही उसने संजय लीला भंसाली को फोन किया। उन्होंने उसे तुरंत बुलाया, भंसाली प्रोडक्शन में नियुक्त किया। संजय लीला भंसाली को वह अपना गुरु मानती है क्योंकि उन्होंने  उसे समझाया कि तुम अपने विचारों और शब्दों को लेखन में उतारो। लिखते समय ये मत सोचो कि तुम्हारा लेखन कैसा बिजनैस करता है। और ’गोलियों की रासलीला रामलीला में उत्तकर्षिणी इस फिल्म की एसोसियेट डायरेक्टर थी। अत्यंत सफल, बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न फिल्म निर्माता सुभाष घई की मुक्ता आट्स प्राइवेट लिमिटेड में उत्तकर्षिणी हैड स्टोरी डवलपमैंट के पद पर रही। नामी प्रॉडक्शन के शो में स्क्रिप्ट राइटिंग, स्क्रिप्ट कंसल्टैंट रही। फिर ये अमेरिका चली गई। अब हॉलीवुड में बहुत व्यस्त लेखिका है।
     उत्कर्षिनी की बेटी के जन्म पर मैं बहुत खुश थी और उस साल गीता की 5151वीं जयंती भी थी। हमने उसका नाम गीता रख दिया। क्योंकि हमारी भावना है कि  भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान की परंपरा को हमारी बेटियां आगे बढायेंगी। निरंतर संघर्ष से जीवन को उचाइयों पर ले जाना, यही धर्म है। यही सच्चा कर्म है। हमें हमारे पूर्वजों ने बेटी बेटे में फर्क करना नहीं सिखाया। समाप्त   




Sunday, 16 February 2020

बेटी के जन्म पर मेरा दिल क्यों बैठ गया था!!.भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान परंपरा भाग 6 नीलम भागी Bhartiye Drishtikon Aur Gyan ke Parampera part 6 Neelam Bhagi



 मैं बड़ी मामी के घर गई। मामी छत पर थीं। वहां मैं मामा के कमरे में गई। कमरा देख कर दंग रह गई। बहुत बड़ा कमरा, लाइब्रेरी की तरह उसमें करीने से किताबें लगी हुई। उसमें चौड़ा निवाड़ का पलंग, दो कुर्सियां और एक मेज रक्खा हुआ था। दादी की लाडली थी, वे मुझे हमेशा अपने साथ रखतीं थीं। ननिहाल में सातवीं कक्षा के बाद अब आई थीं। बड़े मामा को स्वर्ग गये एक साल हुआ था। अब मामी उस कमरे में रहतीं थीं। छोटी सी खिलौने जैसी अंगीठी और चाय बनाने का सामान भी रक्खा था। मुझे अर्जुन के चक्रव्यूह भेदने की कहानी याद आई जो उसने मां के गर्भ में सीखा था। मैं किताबें देखने लगी कि इन दिनों खूब पढ़ूंगी ताकि मेरा होने वाला बच्चा खूब पढ़े। थक गई थी, लेट कर एक किताब पढ़ने लगी। अचानक क्या देखती हूं! मामी ने अंगीठी पर चाय चढ़ा रक्खी है और किसी किताब का एक एक पेज उसमें डालती जा रही है। चाय अच्छे से पीतल की पतीली में खौल रही थी। उसे दो पीतल के गिलासों में छान कर, कांसे की थाली में अलसी की पिन्नी, भूने चने घर के घी में गर्म करके नमक लगा कर दिए। दोनो चाय पी रहे थे। और मैं मन में सोच रही थी कि मामी को किताब जलाने के लिए कैसे मना करुं? इतने में  नीचे से भाभी चाय नाश्ता ले आई। मामी ने उन्हें प्यार से कहा,’’बेटी तूं शाम की चाय मत लाया कर। मेरा जब मन करता है, मैं बना लेती हूं। छोटे बच्चों के साथ दिन भर काम में लगी रहती है। इतना तो मुझे करने दिया कर।’’भाभी के जाने के बाद मामी ने कहा,’’सुबह मैं दूध भी यहीं उबाल कर पी लेती हूं और जब दिल करता है शाम की चाय बना लेती हूं।’’इससे कुछ तो किताबें कम होंगी। मैंने कहा,’’मामी जी आप किताबें मत जलाया करो। किसी लाइब्रेरी को दे दो।’’मेरी बात बीच में काट कर वे बोलीं,’’क्यों दे दूं? पता है तुझे, तेरे मामा ने कितना पैसा इन किताबों पर खर्च किया है!! कोई उनसे बात करो तो हां हूं में जबाब, बस ये किताबें जैसे उनसे बातें करतीं हों। वो तो कबाड़ी से भी किताब खरीद लाते थे। लेई से जोड़ कर उसे पढ़ते।’’ अब समझ आ गया। नाना ने बेटियों को क्यों पढ़ाया! अम्मा का जन्म दोनो मामियों की शादी के बाद हुआ था। बी.एच.यू. में पढ़े मामा और पढ़ने के शौकीन मामा! ख़ैर मैं उस समय इस पोजीशन में नहीं थी कि उन्हें रोकूं। अब मेरी मनपसंद जगह मामा का कमरा थी। बड़े मामा न होते हुए भी उस घर में अपने होने का एहसास दिलाते। पहले आंगन में उनके लगाये दो बढ़िया अमरुद के पेड़। अंदर दूसरे आंगन में कोने में दो कच्चे स्क्वायर छोड़े हुए थे। उनमें  अंगूर की बेले थीं। सर्दियों में आंगन में खूब धूप आती। गर्मियों में अंगूर की बेल फैल कर आंगन में छत बना देती। हरी छत से लटके अंगूर के गुच्छे बहुत अच्छे लगते। जी जान से मुझे प्यार करने वाली दो मामियों और चार भाभियों के होते हुए भी बेटी के जन्म से पहले अम्मा आई। मेरी कोख से बाहर आते ही उसका रोना। और  दाई से ’कुड़ी जम्मी ए’(बेटी पैदा हुई है) सुन कर अपने न रुकने वाले आंसू!! आज जिस बेटी पर गर्व करती हूं, उसके  जन्म पर मेरा दिल क्यों बैठ गया था!!. अम्मा बेटी का नाम उत्कर्षिनी रख कर बोली,’’ अपर्णा, उर्त्किर्षनी मां दुर्गा के ही नाम हैं। क्रमशः




Saturday, 15 February 2020

बिटिया की लोहड़ी!!!! भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान परंपरा भाग 5 नीलम भागी Betiya ke Lohari Bhartiye Drishtikon Aur Gyan ke Parampera part 5 Neelam Bhagi






     दीदी बी.एड. के बाद गर्ल्स इंटरकॉलिज में लेक्चरर बन गई और दादी स्वर्ग सिधार गई। अम्मा अब घर से बाहर बिना घूंघट के सिर पर पल्लू रख कर जाने लगीं। सिर का पल्लू उनका आज 92 साल की उम्र में भी कायम है।आज 92 साल की उम्र में भी अम्मा सिर पर पल्लू रखकर  ही गेट से बाहर खड़ी होती है।

अम्मा की पढ़ाई छूटी थी, शायद इसलिए वो बेटियों को पढ़ाने में जी जान से लगी रहतीं थीं। दीदी की शादी दिल्ली में हो गई और उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पी.एच.डी की। दीदी को रिवाज के अनुसार पहली डिलीवरी के लिए मैके बुलाया गया। उनकी बेटी का जन्म हुआ और लोहड़ी का त्यौहार उन्हीं दिनो आया था। लोहड़ी का त्यौहार बेटे के जन्म पर या बहू आने पर मनाया जाता है। वैसे हर बार धूनी जला कर, तिलचौली अग्नि को अर्पित करते हैं। अम्मा ने उसकी पहली लोहड़ी मनाई और उसको अर्पणा कहा। पड़ोसने आईं और उन्होंने दबी जबान से अम्मा से कहा,’’ बहन जी बेटी की लोहड़ी कौन डालता है!!’जवाब में अम्मा ने सबको पार्वती की शंकर जी के लिए तपस्या की कहानी सुना दी कि कैसे उनका नाम अर्पणा पढ़ा! नैना से उत्पन्न हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री उमा ने शिव को वर के रुप में प्राप्त करने के लिए दुसाध्य तप किया था। पहले फल शाक पर रहीं, और खुले आकाश में वर्षा आदि ऋतुओं की परवाह नहीं की। फिर पेड़ से गिरे बेलपत्रों को आहार बनाया। विकट कष्ट सहे और पत्तों को भी खाना बंद कर दिया यानि निराहार रहीं।
पुनि परिहरेउ सुखानेउ परना। उमा नाम तब भयउ अपरना।।
उमहि नाम तब भयउ अर्पणा।
 और अर्पणा को गोद में लेकर बोलीं,’’ आर्शीवाद दो। ये ज्ञान के लिए तप करे।’’अर्पणा हार्वड पढ़ने गई तो अम्मा बहुत खुश। वहां ऑनर मिला तो अम्मा ने दादी को याद किया। अर्पणा की बेटी रेया को सिंगापुर में हिंदी पढ़ाने ट्यूटर आती है। हम जाते हैं या वो जब भारत आती है तो अर्पणा ने कह रक्खा है कि सब रेया से हिंदी में बात करेंगें और नानी दादी की सुनी हुई कहानियां ही सुनायेंगे। हम वैसा ही करते हैं। मेरी शादी बी.एड की परीक्षा से पहले हुई। बाद में मैंने कैमिस्ट्री एम.एससी में एडमिशन लिया। बेटे के जन्म से दो दिन पहले तक मैंने क्लास अटैण्ड की, छ घण्टे प्रैक्टिकल किया। पर मेरी एम.एससी पूरी नहीं हुई। बेटी के जन्म से पहले मैं कपूरथला मामा के घर रहने गई। चारो मामा में छोेटे मामा श्री निरंजन दास जोशी ही बचे थे जो विधुर थे। मंदिर वाले मुख्य नाना के घर में बेटे बहुओं के साथ रहते थे। बैंक मैनेजर पद से रिटायर थे और घर के प्राचीन राधा कृष्ण के मंदिर की सेवा में थे। और गऊशाला का काम देखते थे। सामने दूसरे घर में सबसे बड़ी मामी  परिवार के साथ रहती थी। दूसरी मामी थोड़ी दूरी पर पास ही रहती थीं। मेरे मामा तीनो समय खाने से पहले और दूध पीने से पहले पूछते,’’नीलम ने खाना खा लिया।’’भाभी के हां कहने पर वे मुंह में कौर डालतें और दूध पीते थे। इसलिए मैं दिन भर जिस मर्जी मामा परिवार में जाउं, खाना सोना छोटे मामा के घर ही करती थी। अगर मैंने कहीं और खाना खा लिया तो मुझे मामा को रिर्पोटिंग करनी पड़ती थी। नही तो वे खाना नहीं खाते थे। चाय वो पीते नहीं थे इसलिये चाय मैं कहीं भी पी लेती थी। क्रमशः







Friday, 14 February 2020

दबंग दादी !! भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान परंपरा भाग 4 नीलम भागी Dabang Dadi Bhartiye Drishtikon Aur Gyan ke Parampera part 4 Neelam Bhagi




दादी के उपदेश साथ साथ चलते थे, जो रामायण की चौपाई के अनुसार कभी नहीं होते थे। अम्मा बोलीं,’’माता जी कहतीं है कि भगवान राम साधारण इनसान बन कर, हमें रास्ता दिखाने आये थे। जितनी मरजी परेशानी आये, हमें जीवन से हार नहीं माननी है। जब आयोध्या से परिवार उन्हें वन में मिलने आया था तो लक्ष्मण केकई को देख कर भला बुरा कहने लगे। उनका साथ भरत और शत्रुघ्न देने लगे पर श्रीराम ने उन्हे ऐसा करने से रोका क्योंकि वे परिवार में समरसता चाहते थे। निशादराज को गले लगा कर सामाजिक समरसता चाहते थे। शबरी के झूठे बेर खाकर, उन्होंने संसार को ये संदेश दिया कि सब मनुष्य मेरे बनाये हुए हैं, कोई छोटा बड़ा नहीं है। केवट की नाव से पार हुए तो उसे मेहनताना दिया, मतलब किसी की मेहनत का हक न मारो ताकि समाज में समरसता बनी रहे। बालि का वध सामाजिक समरसता के लिये किया और इस पर कहा कि बालि वध न्याय संगत है क्योंकि छोटे भाई की पत्नी पुत्रवधु के सामान होती है। शरणागत विभीषण को भी अपनाया। राजधर्म, मित्रधर्म और प्रतिज्ञा सबके बारे में साधारण बोलचाल की भाषा में महिलाओं को उनकी जरुरत के अनुसार समझाती हैं। रामराज्य की कामना करतीं हैं। मौहल्लेदारी करतीं हैं। बहुएं इनसे अपना दुख बांटती हेैं। जब ये संस्कृत का श्लोक बोल कर वेदो या गीता का हवाला देती हैं तो मैं समझ जाती हूं कि आज ये किसी को लक्ष्य करके अपनी मर्जी की कहानी कहेंगी। जिसका श्लोक से कोई लेना देना नहीं होगा। दादी के श्लोकों का अर्थ उनकी जरुरत के अनुसार होता है। जो सबके हित में होता है। ये साधारण महिला नहीं हैं।’’
   हमारी त़ख्ती पोतना, स्याही बनाना, कलम की नोक बनाना, दादी ने अपने हाथ में ले रक्खा था। अम्मा को आदेश था कि जो भी किताब पढ़नी है, रात को बच्चों के पढ़ते समय पढ़ो और इनका ध्यान रखो कि ये समय र्बबाद न करें। किताब में रख कर कहानियों की किताब न पढ़ें। इसलिए बहू, शादी के समय मैंने तेरी पढ़ाई देखी थी, तेरा काला रंग नजरअंदाज कर दिया था। दादी द्वारा शुरु की गई परिवार में ज्ञान परंपरा के परिणाम दिखने लगे थे। एम.ए. में पढ़ने वाली बड़ी बहन के लिए कोई रिश्ता आता तो दबंग दादी का जवाब होता,’’अभी पढ़ रही है।’’रिश्तेदार अम्मा को समझाते की पिताजी की रिटायरमैंट तक चारों बेटियों की शादी करक,े गंगा नहाओ। पर दादी का तर्क था कि बहु पढ़ती हुई आई थी, मुझे इसे आगे पढ़ाना चाहिए था, तो ये टीचर बनती। दीदी ने बी.एड में प्रवेश लिया साथ ही पालमपुर में कॉलिज में एप्लाई कियां था। पिता जी के साथ जाकर इंटरव्यू दिया था। नौकरी मिल गई पर दादी ने जाने नहीं दिया। उनका तर्क था कि इक्कीस साल की लड़की को अकेले नहीं छोड़ना है। कोई साथ रहेगा तो मेरे बेटे को दो दो घर देखने पड़ेंगे और पोती को बी.एड. पढ़ाई छोड़नी पढ़ेगी। बी.एड. के बाद घर के पास ही नौकरी करेगी। दीदी को डिग्री कॉलिज की नौकरी न ज्वाइन करने का दुख होता था। क्रमशः




Thursday, 13 February 2020

काली दुल्हन!!भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान परंपरा भाग 3 नीलम भागी Kali Dulhan Bhartiye Drishtikon Aur Gyan ke Parampera part 3 Neelam Bhagi


दादी ने लेजियम  चलाने वाली, सांवली बहु अपने गोरे चिट्टे बेटे, पंजाब में कहतें हैं मक्खन और सिंदूर मिली हुई रंगत के मेरे पिता जी के लिए पसंद की। अम्मा हिन्दी रत्न भूषण प्रभाकर करके, साहित्यरत्न की तैयारी कर रहीं थीं। जन्मपत्री और 36 गुण मिलने पर, मेरे नाना ने कहा कि शादी मैं दो साल बाद विमला की पढ़ाई पूरी होने पर ही करुंगा। सगाई कर दी गई। उन दिनों बटवारे की आशंका से अजीब सा माहौल था। बेटी पराया धन है इसलिये उसे हिफाजत से उसके अपने घर पहुंचाना जरुरी है। इसलिये उनकी   शादी जल्दी हो गई। अम्मा की सत्रवें साल में पढ़ाई छूट गई थी। लेकिन पढ़ना आज तक नहीं छूटा। उन दिनों पाकिस्तान बनने का शोर मचा हुआ था। पिताजी लाहोर में पोस्टिड थे। अम्मा होशियार पुर के श्यामचौरासी कस्बे में रहती थी। अम्मा को यहां के बारे में कुछ नहीं पता। कारण था पिता जी  की रंगत की तुलना में सांवली बहू दादी के लिए काली दुल्हन थी| काली होने के कारण अम्मा को दादी  जब तक जिंदा रहीं, घूंघट में ही घर से बाहर ले कर गईं। आगे पिताजी के साथ दादी चलतीं थीं, उनके पीछे घूंघट में अम्मा चलतीं थीं। साथ ही वह एक डॉयलॉग हमेशा बोलती थीं ’लोग कहेंगे इतना सुन्दर मेरा बेटा श्याम सुन्दर, बहु कल्लो। बेटी तेरे मुंह पर तो नहीं लिखा न कि तूं पढ़ी लिखी है।’अम्मा को यह सुनने की आदत हो गई थी। और जहां चार औरतें बैंठी, वहीं दादी अम्मा का गुणगान शुरु करतीं कि ऐसी पढ़़ी लिखी संस्कारी, लम्बे बालों वाली, बड़ी बड़ी आंखों वाली बहू तो किस्मत वालों को मिलती है। दादी कभी कभी महिलाओं में संस्कृत का श्लोक आंखें बंद करके सामवेद की ऋचा की तरह बोलती थीं। फिर उसका अर्थ समझाती थीं। जब मैं संस्कृत समझने लगी, तब मैंने एक दिन अम्मा से कहा कि दादी तो गलत अर्थ बताती है। अम्मा सुन कर मुस्कुराईं और बोलीं,’’मुझे पता है। और कुछ दिन बाद जब यही श्लोक फ़िर सुनायेंगी तो इसका अर्थ दूसरा होगा। तुम्हारी दादी के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है। ये जहां भी रहतीं हैं, महिलाओं को व्यस्त कर देतीं हैं। चरखा कातना, दरी, खेस और नाड़े बुनना सबको सिखा देती हैं। आजादी के बाद तुम्हारे पिताजी का इलाहाबाद तबादला हुआ। श्यामचौरासी के समान ही इनका वहां भी महिलाओं में आदर था। वहां से मेरठ आए, यहां भी ये आदरणीया हैं। माता जी पढ़ना जानती हैं। सिर्फ धार्मिक किताबें ही पढ़ती हैं। तीन ही इनके शस्त्र हैं, संस्कृत, वेद और गीता। दादी की गीता में कर्म  के सिद्धांत का मतलब है। महिलाओें को खाली नहीं बैठना चाहिए और इनके पास  कथा कहानियों का भण्डार है। हर मौके पर इनके पास धार्मिक कहानी है। भारतीय साहित्य में हमेशा सामाजिक समरसता का भाव रहा है। समरसता की प्रतीक रामायण, दादी सुबह नहा कर चौकी पर बैठ कर पढ़ती हैं। आस पास की हम उम्र अनपढ़ महिलाएं सुबह से झांकना शुरु करती हैं कि कब माता जी आसन पर बैंठेंगी। पर वे सुबह मेरे साथ काम में मदद करतीं हैं। जब बच्चे स्कूल चले जाते हैं। तब वे चौंकी पर बैठ कर रामायण पाठ शुरु करतीं हैं। महिलाएं नीचे बैठ कर सुनतीं हैं। क्रमशः




Wednesday, 12 February 2020

बेटी पढ़ाओ ,भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान परंपरा भाग 2 नीलम भागी Bhartiye Drishtikon Aur Gyan ke Parampera part 2 Neelam Bhagi


राज पुरोहित विद्वानों की बैठक में गये। वहां कोई बाहर से पण्डित आया था। सब उसे सुनने आये थे। उसने बताया कि बाल गंगाधर तिलक ने कहा था ’ज्ञान की साधना करना ब्राह्मण का कर्त्तव्य है।’ विद्वानों के सत्संग में राज पुरोहित ने ये सुनकर विचार किया कि क्या मैं ऐसा कर रहा हूं? उनकी अर्न्तात्मा ने जवाब दिया कि नहीं। क्योंकि बेटे पढ़ रहे थे यानि ज्ञान की परंपरा कायम थीं लेकिन बेटी! वह तो अपनी मां की देख रेख में घर के काम में निपुण और कुशल गृहणी बनने की योग्यता प्राप्त कर रही है। उन्होंने ठान लिया कि मैं अपनी बेटी को पढ़ाउंगा। बैठक समाप्त होने पर घर आये। आंगन में बेटी रुक्मणी चारपाई पर अपने हाथ से काते , बुने सूत के सफेद खेस पर बढ़ियां तोडते हुए, संस्कृत के श्लोकों का मधुर सुर में गायन कर रही है। राजपुरोहित चौंकी पर बैठ कर सुनने लगे। बेटी का स्वर थमा तो पिता ने कहा,’’रुक्मणी पीढ़ी लेकर मेरे पास बैठ।’’रुक्मणी काम छोड़ कर, हाथ धो कर पिता के पास बैठ गई। पिता ने पूछा,’’बेटी तुझे संस्कृत किसने सिखाई?’’रुक्मनी नहीं जानती थी कि संस्कृत क्या होती है? वो हैरानी से पिता का मुंह ताकने लगी। पिता ने पूछा,’’ जो तूं अभी पाठ कर रही थी।’’ वो तुझे किसने सिखाया?  उसने डरते हुए कहा कि जो आप भाइयों को याद कराते हो, वो सुन सुन कर मुझे याद हो गये। पिता ने उसी समय उसकी मां से कहा कि खीर बनाओ। सफेद फूल तो वो लेकर ही आये थे। उन्होंने बेटी रुक्मणी का यानि मेरी दादी का विद्यारम्भ संस्कार किया और दादी का अक्षर ज्ञान शुरु हुआ। दादी से बेटियो के लिए ज्ञान की परंपरा मेरे परिवार में शुरु हुई। बेटियों के लिए दूर दूर तक पाठशाला नहीं थी। पिता ने पढ़ना सिखाया। पढ़ना अभी सीखी ही थी कि अध्यापक परिवार से उसके लिए रिश्ता आ गया। पिता ने  ये सोच कर अध्यापक से शादी कर दी थी कि दामाद उसे लिखना सिखा देगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दादी पुरी जिंदगी पढ़ी हुई महिला रही। पढ़ी लिखी नहीं। यहाँ भी बेटियों के लिए स्कूल नहीं था। लेकिन बिना किसी स्कूल गये, मेरी बुआ भी पढ़ी। क्योंकि बुआ का तख्ती पूजन दादी ने बचपन में ही  कर दिया था। मेरी बुआ को दादी ने हिन्दी सिखाई। किसी ग्रन्थी से गुरुमुखी सिखवाई और दादा से अंग्रेजी, उर्दू घर पर ही सीखी। बिना कोई कक्षा पास मेरी बुआ राजरानी चार भाषाओं को लिखती, और अखबारें पढ़ती थी। इसलिये हम बच्चों को बुआ बहुत पढ़ी लिखी लगती थी। उसने दादी की ज्ञान परंपरा को आगे खिसकाया। दादी ने ठान रक्खा था कि बहू पढ़ी लिखी लेगी। नाई जब पिताजी के लिए रिश्ता लाया तो उसने बताया कि कपूरथला के गणितज्ञ जोशी परिवार की दो बेटियां हैं। पुत्री पाठशाला नाम के स्कूल में पढ़ती हैं वहां की प्रधानाचार्या गुरुकुल की पढ़ी, सुमित्रा बहन जी हैं। वहां लड़कियों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग भी दी जाती है। बड़ी का नाम कमला है वह गोरी है, वो तो दोनों हाथों से लाठी चलाती है। छोटी बिमला है, सांवली है, वो लेजियम चलाती है। क्रमशः




Tuesday, 11 February 2020

भारतीय दृष्टिकोण और ज्ञान परंपरा भाग 1 नीलम भागी Bhartiye Drishtikon Aur Gyan ke Parampera part 1 Neelam Bhagi








  शाम को उत्कर्षिनी की फिल्म सरबजीत का प्रीमियर था। बेटी ने मेरे लिये मूंगा सिल्क की साड़ी खरीदी। इयरिंग के अलावा, मैं कोई जेवर नहीं पहनती, वो डायमण्ड के खरीदे गये। बेटी ने अपने पति से पूछा,’’माँ के चेहरे पर क्या करवाऊँ?’’उन्होंने कहा कि सिर्फ क्लीनिंग, नो पार्लर मेकअप, जैसे रहती हैं, वैसे ही रहने देना। बेटी ने मशहूर ब्यूटीपार्लर में मेरा फेस क्लीनिंग करवाया और मेरी इच्छा के खिलाफ बालों की सेटिंग करवाई। अपनी डेढ़ साल की बेटी गीता को उसकी बेबीसिटर के साथ पहली बार अपनी सहेली के घर छोड़ा क्योंकि सहेली की बेटी उसकी हम उम्र थी। मैंने बहुत समझाया कि मैं गीता के पास रुक जाती हूं। बेटी ने फैसला सुनाया कि आप जरुर जाओगी। अंधेरी मुम्बई का पी. वी. आर प्रीमियर के लिये  बुक था। सितारों और कलाकारों की एक झलक पाने के लिए और उनको अपने मोबाइल कैमरे में कैद  करने के लिए, सड़क के दोनो ओर उनके प्रशंसकों की भीड़़ को पुलिस ने नियंंित्रत कर रक्खा था। र्काड दिखाने पर हमारी गाड़ी गेट तक गई। रेड कार्पेट पर हमारे कदम पड़े। बेटी ने मेरी बांह में अपनी बांह डाली हम धीरे धीरे चलने लगे। दोनो ओर से हम पर कैमरों की लाइटें पड़ रहीं थीं। माइक में बेटी का परिचय बोला जा रहा था,’’इस फिल्म की लेखिका, डायलॉग लेखिका... उत्कर्षिनी वशिष्ठ, लोग ध्यान से उसका परिचय सुन रहे थे। और मैं!.... इसका जन्म याद कर रही थी, मेरी कोख से बाहर आते ही उसका रोना। दाई से ’कुड़ी जम्मी ए’(बेटी पैदा हुई है) सुन कर अपने न रुकने वाले आंसू। इसके जन्म पर मेरा दिल क्यों बैठ गया था!!... बेटी मेरा हाथ पकड़ कर शो देख रही थी। सरबजीत के मरने के सीन से पहले एक दुबली, पतली , सफेद, चुन्नी से सिर ढके महिला, अपनी सीट से उठ कर बेटी के पास आई। उसे गले लगा कर बेआवाज रोती हुई बाहर चली गई। बेटी मेरे कान में बोली,’’माँ, ये सरबजीत की पत्नी थी। सुनकर मैं बोली,’’बेटी ये तेरे लेखन को पुरस्कृत कर गई है।’’ शो के बाद वह सबसे बधाई ले रही थी। उसके लिखे डायलॉग की प्रशंसा हो रही थी और मैं अपने से पूछ रही थी कि मैं बेटी के जन्म पर क्यों रोई थी!!... और चार पीढ़ियों की महिलाओं की ज्ञान परंपरा मेरे दिल में चल रहीं थी।
  सौभाग्य से मैं ऐसी विरासत से सम्बन्धित हूँ, जिनका इतिहास अपने में महिला सशक्तिकरण की मिसाल रहा है। ज्ञान की परम्परा हमें विरासत में मिली है। जिसे हमने आगे बढ़ाया है। उत्त्कर्षिणी जब विदेश पढ़ने गई तो मैं इस भय से बीमार पड़ गई कि मैं इसकी पढ़ाई पूरी करवा पाउंगी! अचानक मुझे याद आया कि मेरे नाना रला राम जोशी सवाल सुनते ही उत्तर बोल देते थे। मैं छुट्टियों में ननिहाल कपूरथला गई। उस समय वो तिरानवे साल के थे ,मैं सातवीं में पढ़ती थी। मैंने पूछा,’’नाना आपने गणित की किताबे लिखी, दिन भर आपको छात्र घेरे रहते हैं। आपको मैथ किसने सिखाया?’’ वे बोले,’’ मेरी अनपढ़ विधवा मां ने, उसे जितना हिसाब आता था, उसने कौढ़ियों से गिनना, जोड़ना, घटाना मुझे सिखाया। मुझ में रुचि पैदा की। ’’अकेली अनपढ़ औरत ने उस जमाने में बेटा गणितज्ञ बनाया। मैं भी तो उनकी वंशज हूं। मेरे अंदर उत्साह आ गया। मुझे तो  संघर्ष की प्रेरणा भी, उनसे विरासत में मिली। क्रमशः
केशव संवाद में प्रकाशित ये रचना, प्रेरणा विमर्श 2020 विमोचन

जात पात ने रानो रामसरन को किस्सा बना दिया नीलम भागी Jaat paat ne Rano Ramsarn ko Kissa Bana diya Bhartiye Sahitya mein Samajik Samrasta Neelam Bhagi

बहुमत मध्य प्रदेश एवम छत्तीसगढ़ से एक साथ प्रकाशित समाचार पत्र में यह लेख प्रकाशित है

"तेरी जात क्या है?" ये प्रश्न सुनते ही दादी को दवा देने आई नर्स ने पहले घूर कर मेरी नब्बे साल की दादी को देखा, फिर न जाने क्या सोच कर, मुस्कुराकर बोली,’’ ऊँची जात की मुसलमानी पर माता जी, मैंने दवा को तो छुआ नहीं है।’’ दादी बोली,’’जिस कागज पर गोलियां हैं, उसे तो छुआ है न। मैं नहीं खाती दवा।’’नर्स भली थी, मुझसे बोली,’’चलो मेरे साथ तुम अपने हाथ से दवा ले लेना।’’ बाहर आकर वही दवा नर्स से लेकर, मैंने माफी मांगते हुए, उसे बताया कि ये बहुत छुआछूत ,जात पात मानती हैं। अब अशक्त हो गईं हैं। पहले जब घर से बाहर जाती थीं तो घर आते ही चाहे जितना भी जाड़ा हो, कपड़े समेत खड़ी, अपने ऊपर पानी की बाल्टी डलवाती थीं। जवाब में नर्स बोली कि इनकी ये आदत तो चिता के साथ ही जायेगी। अब जो भी नर्स आती, वह अपने को ऊँची जात की मुसलमानी, दादी के पूछने पर बताती। दादी पढ़ना जानती थी सिर्फ धार्मिक किताबें ही पढ़ती थी। भारतीय साहित्य में हमेशा सामाजिक समरसता का भाव रहा है। समरसता की प्रतीक रामायण, दादी सुबह नहा कर चौकी पर बैठ कर पढ़ती थी। आस पास की हम उम्र महिलाएं नीचे बैठ कर सुनतीं थीं। दादी के उपदेश साथ साथ चलते कि भगवान राम साधारण इनसान बन कर, हमें रास्ता दिखाने आये थे। जितनी मरजी परेशानी आये हमें जीवन से हार नहीं माननी है। जब आयोध्या से परिवार उन्हें वन में मिलने आया था तो लक्ष्मण केकई को देख कर भला बुरा कहने लगे उनका साथ भरत और शत्रुघ्न देने लगे पर श्रीराम ने उन्हे ऐसा करने से रोका क्योंकि वे परिवार में समरसता चाहते थे। निशादराज को गले लगा कर सामाजिक समरसता चाहते थे। शबरी के झूठे बेर खाकर उन्होंने संसार को ये संदेश दिया कि सब मनुष्य मेरे बनाये हुए हैं, कोई छोटा बड़ा नहीं है। केवट की नाव से पार हुए तो उसे मेहनताना दिया, मतलब किसी की मेहनत का हक न मारो ताकि समाज में समरसता बनी रहे। बालि का वध सामाजिक समरसता के लिये किया और इस पर कहा कि बालि वध न्याय संगत है क्योंकि छोटे भाई की पत्नी पुत्रवधु के सामान होती है। शरणागत विभीषण को भी अपनाया। राजधर्म, मित्रधर्म और प्रतिज्ञा सबके बारे में साधारण बोलचाल की भाषा में समझाती थीं। रामराज्य की कामना करतीं थीं। पर छुआछूत और जातिप्रथा की बुरी तरह से पक्षधर थीं। उनकी कथा सुनने वालियां इसे उनकी योग्यता मानते हुए प्रचार करतीं थीं कि माता जी राजपुरोहित की बेटी हैं न। छोटी जात वालों को नहीं छूती और छोटी जात वालियां उनसे दूर रह कर कथा सुनती पर उनसे र्तक नहीं करतीं थीं। जबकि वाल्मिकी रामायण में भी भेदभाव को महत्व न देकर सामाजिक समरसता को महत्व दिया गया है। भारतीय साहित्य में वासुधैव कुटुम्बकम से सामाजिक समरसता की बातें स्पष्ट होतीं हैं। जिसमें बंधुता का भाव स्पष्ट है। बंधुता आने से समता आयेगी और समता से समरसता आयेगी। साहित्य परंपरागत मूल्यों की पुर्नव्याख्या करता है और आधुनिक विमर्शों को स्वीकार करता है। नवीनता को स्वीकारना, आत्मसात करना हमारे समाज के हित में है। समाज में फैली व्याप्त कमियां, जिन्हें दूर करने का प्रयास किया गया है। वह आज भी कहीं न कहीं विद्यमान है।   
 पिताजी के असमय देहान्त पर एक जज साहब सपत्नी अम्मा के पास दुख प्रकट करने आये थे। एक एक करके उन्होंने हम सब बहन भाइयों की शिक्षा के बारे में पूछा। पिता जी की खूब तारीफ़ की और कह गये कि उनके लायक कोई सेवा हो तो बतायें। तेहरवीं तक परिवार, को  बैठना होता है। पड़ोसी मित्र भी आते हैं दुख बांटते हैं। हर वक्त तो रोया नहीं जाता। उसमें किस्से कहानियां भी सुनाये जाते हैं। जज रामचरण के जाते ही उसकी कहानी शुरू हो गई। ये पिताजी के डिर्पाटमेंट में लोअर डिवीजन र्क्लक भर्ती हुआ थे। हमारे पास के मौहल्ले में रहता थे। वहीं चार घर छोड़ कर एक पंजाबी रफ्यूजी परिवार भी रहता था और उनकी जाति वही थी, जो देश के एक नामी उद्योगपति घराने की थी। पर ये बेचारे बहुत मामूली दुकानदार थे। उनकी अर्पूव सुन्दरी बेटी रानो थी। रानो और रामचरण में प्यार हो गया। दोनो घर से भाग गये। लेकिन स्टेशन पर ही पकड़े गये। सबने कहा कि रानों की अब इससे शादी कर दो। रानो के बाप ने कहा,’’ इस दलित से शादी!! कभी नही, पाकिस्तान में ये हमारी हवेली में घुस नहीं सकते थे और मैं इसे बेटी दूंगा! न न हर्गिज़ नहीं।’’ उन दिनों टी. वी. तो होता नहीं था, रेडियो पर ही नाटक, कहानी सुनते थे। अब रानो और रामचरण के प्रेम की सत्यकथा को सुनाने में सब बहुत बड़े किस्सागो हो गये। इस किस्से को बार बार कहना सुनना, उन दिनों का सबसे बड़ा मनोरंजन था। रामचरण को इस अपमान से बहुत चोट पहुंची। पिताजी उसको समझाते और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते क्योंकि वह बहुत अच्छा लड़का था। जातिगत आरक्षण से वह समयानुसार अधिकारी तो बन ही जाता पर उसे भी न जाने कैसी लगन लगी थी। 10 से 5 ऑफिस फिर शाम को लॉ में एडमिशन लिया और बाकि समय पढ़ना। पड़ोसियों को उसकी शक्ल भी न दिखती थी। बिरादरी ने रानो की शादी सजातीय युवक से करवा दी। वो युवक अपनी शादी की खुशी में इतनी शराब पी कर आया था कि जयमाला के समय उससे खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। रामचरण जज बन गया था। रानो की शादी के बाद, उसने शादी के लिये वैवाहिक विज्ञापन दिया और अपने स्टेटस के साथ लिखा हिन्दू ,जातिबंधन नहीं। बेटी वालों ने जात, गोत्र, जन्मपत्री सब छोड़ कर बस रामचरण के पद को देखते हुए रिश्ते की बात चलाई। रामचरण ने रानों की जाति की लड़की से शादी की। अब हमारे सामने पाँचवा वर्ण आ गया, जिसे अभिजात वर्ण या धनिक वर्ण कहा जा सकता है। जिसे समय ने बनाया है और इस वर्ग में स्टेटस देखा जाता है। मुझे दादी याद आने लगी। जो कहती थी वेदों में जाति के आधार पर वर्ण व्यवस्था है। जबकि वेदों में र्कम के आधार पर वर्ण व्यवस्था थी जिसमें समय के साथ कुरीतियां और विकृतियां आ गईं। कुप्रथाओं में जातिगत भेदभाव, छुआछूत आदि की प्रवृति बढ़ती गई। जो आगे जाकर उच्च वर्ग और निम्नवर्ग में भेदभाव शुरू हो गया। उच्च वर्ग तो निम्न वर्ग को हेय दृष्टि से देखता है। रामचरण के इलीट वर्ग में आते ही, वह सम्पन्न और अपने से दो पायदान ऊंचे वर्ण का दामाद बन गया। और कर्म के आधार पर पांचवा वर्ण बन गया। जाति भेद के दोष से ही समरसता का अभाव उत्पन्न होता है। देश के विकास के लिए सामाजिक समरसता की जरूरत होती है। हमारा देश विविधताओं का देश है। भाषा, खानपान, देवी देवता, पंथ संप्रदाय न जाने क्या क्या है? और तो और जाति व्यवस्था में भी विविधता है पर हम एक हैं। पंजाब में अपनी भानजी तिवारी परिवार की बेटी की शादी मंे गई। लेकिन पंजाबी परिवार की कन्या को हरे कांच की चूड़ियां पहनाई गईं थी। ये देखते ही मैं समझ गई कि जीजा जी के र्पूवज उत्तर भारतीय हैं पर अब तो पंजाबी ब्राहमण हैं। सप्तपदी के बाद भानजी की सास ने तुरंत उसे चूड़ा पहनाया ताकि वह पंजाबी दुल्हन लगे। चूड़ा लाल रंग का लड़की का मामा लाता है। चूड़े का लॉजिक ये है कि पहले छोटी उम्र में लड़कियों की शादी होती थी। नये घर के तौर तरीके समझने में समय लगता है इसलिये जब तक चूड़ा बहू की बांह में है, उससे काम नहीं करवाया जाता था। अगर चूड़े का रंग उतर गया तो उस परिवार की बातें बनाई जातीं थीं कि बहू को आते ही चूल्हे चौंके में झोंक दिया। सवा महीना या सवा साल बाद बहू मीठा बना कर चूड़ा उतारती थी और सास गृहस्थी के काम बहू को हस्तांतरित कर देती थी। भानजी की चूड़े वाली बांह देखते ही उसकी सास ने कहा कि जो भी घर में मुंह दिखाई के लिये आयेगा, उसे बताना नहीं पड़ेगा कि यह बहू है। उसकी दादी बोली अब तुम्हारी बहू है जो मरज़ी पहनाओ। दूसरी भानजी की शादी पर उसकी होने वाली सास ने कहा कि जयमाला ये चूड़ेवाली बाहों से डालेगी। दादी ने क्लेश कर दिया कि हमारे यहाँ तो बेटी को हरे काँच की चूड़ियों में विदा करते हैं। समधन ने जवाब दिया कि हमारी होने वाली बहू तो चूड़ा पहनकर ही जयमाला पहनाती है। बेटी की शादी बहुत धनवान परिवार में हो रही थी। सब दादी को समझा रहे थे वो तर्क दे रही कि कन्यादान यज्ञ होता है। पूर्वजों के नियम तोड़ने पर अनिष्ट का डर था। समझदार पंडित जी ने ऐसे मौके पर कहा कि शास्त्रों में विधान है कि नया रिवाज कुटुम्ब के साथ करो तो अनिष्ट नहीं होता। तुरंत कई जोड़े चूड़े के मंगाये गये।  पंडित जी के मंत्रों के साथ, बाल बच्चे वाली बहुओं ने पहने। दादी बोलीं कि अब हमारे घर में बहु चूड़ा पहन कर आयेगी और बेटी चूड़ा पहन कर विदा होगी। वहाँ पता नहीं कोई वेदपाठी था या नहीं , पर पण्डित जी ने वेदों के नाम पर सब में समरसता पैदा कर दी। जब बॉलीवुड में दुल्हन को चूड़े में दिखाया तो अब चूड़ा फैशन में आ गया। किसी भी पंथ, संप्रदाय, समाज सुधारकों और संतों ने मनुष्यों के बीच भेदभाव का सर्मथन नहीं किया। इसलिये र्धमगुरूओं के अनुयायी सभी जातियों के होते हैं। वे कभी अपने गुरू की जाति नहीं जानना चाहते, वेे गुरूमुख, गुरूबहन, गुरूभाई होते हैं। बापू ने अपने लेखन और र्कम में जाति, र्धम, लिंग, वर्ग और श्रम जैसे विषयों पर बेबाक टिप्पणियां लिखीं। उन्होंने विचारों से और कार्यों द्वारा सामाजिक समरसता के लिये प्रयास किया। वे र्धमशास्त्रीय आधारों पर भी छुआछूत और जाति व्यवस्था को अस्वीकार करते हैं। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद 25 मई 1915 में बापू ने कोचरब में जीवन लाल के बंगले में सत्याग्रह आश्रम खोला था। सामाजिक समरसता लाने के लिये आर्थिक, राजनीतिक क्रान्ति की जो प्रयोगशाला उनके मस्तिष्क में थी वो वहाँ पर उस बंगले में सम्भव नहीं था। खेती बाड़ी, पशु पालन का प्रयोग भी मुश्किल था। बापू को तो समानता के सिद्धांत पर महान प्रयोग करना था जो साबरमती में सम्भव  था। चालीस लोगों के साथ सामुदायिक जीवन को विकसित करने के लिये बापू ने 1917 में यह प्रयोगशाला शुरू की यानि साबरमती आश्रम। यहाँ के प्रयोग विभिन्न धर्मावलंबियों में एकता स्थापित करना, चरखा, खादी ग्रामोद्योग द्वारा जनता की आर्थिक स्थिति सुधारना और श्रमशील समाज को सम्मान देना था। पेंटिंग गैलरी में आठ अनोखी पेंटिंग हैं। एक पर लिखा था ’’मैंने जात नहीं पानी मांगा था।’’यहाँ रहने वाले सभी जाति के देशवासी बिना छूआछूत के रहते थे। छूआछूत को सफाई पेशा से जोड़ कर देखा जाता है। महात्मा गांधी इस अति आवश्यक कार्य को निम्न समझे जाने वाले काम कोे और इसे करने वाले समाज को सम्मान प्रदान करते हैैं। इस सम्मान का उद्देश्य श्रमशील समाज का सम्मान है। वे सभी को सफाई कार्य में अनिवार्य रूप से भागीदार बनाकर श्रमशील समाज के प्रति संवेदनशील बनाना चाहते हैं।  नागपुर के हरिजनों ने बापू के विरूद्ध सत्याग्रह किया। उनका तर्क था कि मंत्रीमंडल में एक भी हरिजन मंत्री नहीं है। साबरमती आश्रम वह प्रतिदिन पाँच के जत्थे में आते, चौबीस घंटे बापू की कुटिया के सामने बैठ कर उपवास करते, बापू उनका सत्कार करते थे। उन्होंने बैठने के लिये बा का कमरा चुना, बा ने निसंकोच दे दिया, उनके पानी आदि का भी प्रबंध करतीं क्योंकि वह पूरी तरह बापूमय हो गईं थीं। किसी भी कुरीति को जड़ से खत्म करना बहुत मुश्किल है। लेकिन असंभव नहीं है। बापू समाज में समरसता लाने के लिये शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच की खाई को समाप्त करने की बात कहते रहे। इसके लिये साबरमती में, उद्योग भवन को उद्योग मंदिर कहना उचित है! जाने पर, देखने और मनन करने पर पता चलेगा। वहाँ जाकर एक अलग भाव पैदा होता है। यहीं से चरखे द्वारा सूत कात कर खादी वस्त्र बनाने की शुरूआत की गई। देश के कोने कोने से आने वाले बापू के अनुयायी यहाँ से खादी के वस्त्र बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। तरह तरह के चरखे, धागा लपेटने की मशीने, रंगीन धागे, कपड़ा आदि मैं वहाँ देख रही थी। कताई बुनाई के साथ साथ चरखे के भागों का निर्माण कार्य भी यहाँ होने लगा। इससे महिलाओं में भी आत्मनिर्भता की शुरूवात हो गई। इस तरह के लघु उद्योग गांवों में किए जा सकते हैं जिससे नगरों की बढ़वार रूके। ये भी देश की समरसता में योगदान है।