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Thursday, 3 September 2026

"त्योहारों और बदलाव" का महीना है न सितम्बरSeptember is the month of festivals and change, isn't it? Neelam Bhagi नीलम भागी

 


मानसून खत्म होने को है, फसल तैयार है और गर्मी कम हो रही है तो हल्की ठंड की शुरुआत होने लगती है। इसलिए सितम्बर  को "त्योहारों और बदलाव" का महीना कहते हैं।सोलंग महोत्सव (1 से 5 सितंबर)अरुणाचल प्रदेश (आदि जनजाति द्वारा) यह एक कृषि उत्सव है। इसमें फसल की देवी किने नाने और पशुओं के देवता दादी बोते की पूजा की जाती है। पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक दावतें इसका मुख्य आकर्षण हैं। मोंगमोंग फेस्टिवल (1से 6 सितम्बर) नागालैंड के ओओ नागा समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला फसल और धन्यवाद उत्सव है । यह नागालैंड के सांताम जनजाति का छह दिवसीय प्रसिद्ध फसल कटाई उत्सव भी है। उत्सव का मुख्य बिंदु

"एकता और हमेशा साथ रहना" है। छह दिनों का मुख्य क्रम है। पहला दिन तैयारी और सामान जुटाना दूसरा दिन पारंपरिक अनुष्ठान और आशीर्वाद तीसरा दिन चूल्हे के तीन पत्थरों की पूजा और भोजन अर्पण चौथा दिन सामुदायिक सफाई और रास्ते ठीक करना पाँचवां दिन दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना, उपहारों का आदान-प्रदान। छठा दिन समापन प्रार्थना और बुरी ताकतों से बचाव के उपाय। कान्हा के जन्म (4 सितम्बर ) की खुशी हम ऐसे मनाते हैं जैसे परिवार में बालक का जन्म हुआ हो। मंदिरों में सजावट की जाती है। छोटे-छोटे बच्चों को कृष्ण के बाल रूप में सजाया जाता है। जगह-जगह कीर्तन होते हैं। लोग व्रत रखते हैं और कान्हा के जन्म के बाद व्रत का पारण करते हैं। महाराष्ट्र में जगह-जगह दही हांडी लगाई जाती है। कान्हा के बाल सखा बने युवक इसे फोड़ने की प्रतियोगिता में भाग लेते हैं। दक्षिण भारत में यह उत्सव 8 दिन तक मनाया जाता है। श्री कृष्णजन्माष्टमी के ठीक अगले दिन आता है, गोगा नवमी का पावन पर्व, 5 सितंबर को मनाया जाएगा।   इस दिन वीर गोगाजी (जाहरपीर) की पूजा की जाती है, जिन्हें सांपों से रक्षा करने वाला लोक देवता माना जाता है। भक्तगण अपने परिवार की रक्षा और कल्याण के लिए व्रत रखते हैं। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित गोगामेड़ी में इस अवसर पर विशाल मेला लगता है। इनको हिंदू और मुसलमान दोनों मानते हैं। हिंदुओं के गोगा वीर जी हैं और मुसलमान इन्हें जाहर पीर कहते हैं।

बैल पोला का  पारंपरिक त्योहार 10 सितंबर (श्रावण अमावस्या) को मनाया जाएगामवेशियों का उपकार मानना, हमारी भारतीय संस्कृति में अलग अलग रूपों में दिखाई देता है। मसलन पोला महोत्सव महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक के किसानों द्वारा मनाया जाता है। इस त्यौहार की तैयारी में बैलों को नहलाकर, उनकी तेल से मालिश करना, सींगों को रंग कर, नई लगाम और रस्सियाँ बदली जाती हैं। उन्हें शॉल, घंटियों और फूलों से सजाया जाता है। संगीत और नृत्य के साथ जुलूस के रूप में सब मवेशी गाँव के मैदान में ले जाये जाते हैं। सबसे पहले मैदान से बाहर जाने वाला एक बूढ़ा बैल होता है, उसके सींगों पर लकड़ी का फ्रेम(माखर) बंधा होता है। दो खंबों के बीच आम के पत्तों की रस्सी का बंधा तोरण होता है। वह माखर से इस तोरण को तोड़ता है। उसके पीछे सब मवेशी चलते हैं। कुछ की टांगों में घुंघरू भी बंधे होते हैं। जब जुलूस से मवेशी वापस आते हैं। तो परिवार उनकी पूजा की तैयार थाली, जिसमें घी का दिया, कुमकुम, पानी और मिठाई, पूरनपोली के साथ स्वागत करता है। गऊ माता को भी पूजता है। पोला के दिन किसान अपने बैलों से खेतों में काम नहीं करवाते। उन्हें बाजरे की खिचड़ी खिलाते हैं। किसान परिवार के साथ खेतों में मवेशियों ने भी बुआई, सिंचाई में मेहनत की है। किसान धूमधाम से ’बैल पोला’ उत्सव मना कर उनका धन्यवाद करते हैं। किसान परिवारों द्वारा खेती में बैलों के अमूल्य योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाने वाला एक प्रमुख उत्सव है और बच्चे मिट्टी या लकड़ी से बने नंदी बैल को सजाकर यह पर्व मनाते हैं।।


  नीलमपेरूर पडायनी (11 सितंबर): केरल के अलप्पुझा जिले में भगवती मंदिर में पारंपरिक कला और सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। वराह जयंती (13 सितंबर) को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु के तीसरे (वराह) अवतार को समर्पित है।

भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए यह रूप लिया था।

उत्तर भारत में महिलाओं का उत्सव हरतालिका तीज और दक्षिण भारत में इस व्रत को’’गौरी हब्बा’’(14 सितम्बर) के नाम से जाना जाता है। इस त्यौहार में प्रकृति ने हरियाली की चादर ओढ़ी होती है। इस दिन को भोलेनाथ और माता पार्वती के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। हरे भरे पेड़ो पर झूले पड़ जाते हैं। कहीं कहीं यह उत्सव तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन मायके से सिंधारा में घेवर मिठाई, मेहंदी, चूड़ियां आदि सुहाग की चीजे आतीं हैं। दूसरे दिन मेहंदी हाथ पैरों में लगाई जाती है। अगले दिन सौभाग्यवती महिलाएं निर्जला व्रत कर, पकवान बनाती हैं और हरी पोशाक पहने, श्रृंगार करके पति की लंबी आयु के लिए शिव पार्वती की पूजा कर, सास को बायना देती हैं। नई बहू को पहली तीज में मैके भेज दिया जाता है। तीज पर ससुराल से बहू के लिए सिंधारा जाता है। हमारे लोकगीतों में भी हरियाली, झूले, रिमझिम वर्षा की फुहारों में झूलती गाती सखियां होती हैं। पहले छोटी आयु में बेटियों की शादी हो जाती थी। पहला तीज उत्सव वह पुरानी सखियों के साथ मना जातीं है। हिंदू धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता है, सबके योग्य नियमों की लचीली व्यवस्था भी करता है। महानगरों की कामकाजी महिलाएं छुट्टी न होने से परिवार में नहीं जा पातीं, इसलिए जहां तीज महोत्सव का आयोजन किया जाता है, वहां पहुंच कर सखियों से मिल कर नाच गा भी लेती हैं। 


गौरी हब्बा गणेश चतुर्थी से एक दिन पूर्व मनाया जाता है। यह माना जाता है कि इस दिन गौरां, इस तरह घर में आती है, जिस तरह कोई साधारण स्त्री अपने माता पिता के घर आती है। अगले दिन उनके पुत्र गणपति ऐसे आते हैं जैसे अपनी मां पार्वती को कैलाश पर्वत ले जाने आए हों। गणेशोत्सव(14 से 25 सितम्बर) दस दिन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु गणपतिमय रहता है। बप्पा के आवाहन से लेकर विर्सजन तक श्रद्धालु, आरती, पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में, लगभग सभी उपस्थित रहते हैं। घरों में भी गणपति 1,3,5,7,9 दिन बिठाते हैं। इसमें गौरी पूजन, दो दिन महालक्ष्मी पूजन, छप्पन भोग हैं।

त्यौहार के बीच में बेटियां भी गणपति से मिलने मायके आती हैं और बहुएं भी मायके जाती हैं। मुंबई में मैंने देखा, सामने फ्लैट में एक परिवार ने गणपति बिठाए तो उनके तीनों भाइयों के परिवार, दूसरे शहरों से वहीं आ जाते हैं। पूजा तो हर समय नहीं होती, बच्चे आपस में घुल मिल जाते हैं। महिलाओं पुरुषों की अपनी गोष्ठियां चलती हैं। अष्टमी को ऐसा माना जाता है कि इस दिन गौंरा अपने गणपति से मिलने आती हैं। उपवास रखकर, कुल्हड़ गुड़ियों के रुप में गौरी को पूजते हैं और सबको भोजन कराते हैं। दक्षिणा उपहार देते हैं पर उस दिन नियम है कुछ भी, जूठन(सभ्य लोग हैं जूठा नहीं छोड़ते) तक नहीं फेंकते। यहां तक कि पान खिलाया तो उसका कागज भी दहलीज से बाहर नहीं डालते। अगले दिन दक्षिणा उपहार ले जा सकते हैं। शाम को आरती के बाद कीर्तन होता है। मंगलकारी बप्पा साल में एक बार तो आते हैं इसलिए उनके सत्कार में कोई कमी न रह जाए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार मोदक, लड्डू के साथ तरह तरह के व्यंजनों का भोग लगाते हैं। जो सब मिल जुल कर, प्रशाद में खाते हैं। थोड़ी सी जगह में संबंधियों, मित्रों के साथ आनंद पूर्वक नाच भी लेते हैं। सोसाइटी के गणपति उत्सव में सबकी भागेदारी होती है।

आनंद चर्तुदशी के दिन गणपति विर्सजन होता है। नाचते हुए गणपति से विनती करते हुए कहते हैं कि अगले बरस तूं जल्दी आ और विर्सजन जूलूस में जाते हैं।  

गणपति विसर्जन की कथाएं बड़ी रोचक हैं। महर्षि वेदव्यास महाभारत की कथा लिखना चाह रहे थे पर उनके विचार प्रवाह की रफ्तार से, कलम साथ नहीं दे रही थी। उन्होंने गणपति से लिखने को कहा। उन्होंने लिखना स्वीकार किया पर पहले तय कर लिया कि वे लगातार लिखेंगे, जैसे ही उनका सुनाना बंद होगा, वह आगे नहीं लिखेंगे। महर्षि ने भी गणपति से प्रार्थना कर, उन्हें कहा,’’ आप भी एडिटिंग साथ साथ करेंगे।’’ गणपति ने स्वीकार कर लिया। जहां गणपति करेक्शन के लिए सोच विचार करने लगते, तब तक महर्षि अगले प्रसंग की तैयारी कर लेते। वे लगातार कथा सुना रहे थे। दसवें दिन जब महर्षि ने आखें खोलीं तो पाया कि गणपति के शरीर का ताप बढ़ गया है। उन्होंने तुरंत पास के जलकुंड से जल लाकर उनके शरीर पर प्रवाहित किया। उस दिन भाद्रपद की चतुर्दशी थी। इसी कारण प्रतिमा का विर्सजन चतुर्दशी को किया जाता है। महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। 

   गणपति उत्सव की शुरूवात, सांस्कृतिक राजधानी पुणे से हुई थी। शिवाजी के बचपन में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कस्बा में गणपति की स्थापना की थी। तिलक ने जब सार्वजनिक गणेश पूजन का आयोजन किया था तो उनका मकसद सभी जातियों धर्मों को एक साझा मंच देना था। पहला मौका था, जब सबने देव दर्शन कर चरण छुए थे। उत्सव के बाद प्रतिमा को वापस मंदिर में हमेशा की तरह स्थापित किया जाने लगा तो एक वर्ग ने इसका विरोध किया कि ये मूर्ति सबके द्वारा छुई गई है। उसी समय निर्णय लिया गया कि इसे सागर में विसर्जित किया जाए। दोनों पक्षों की बात रह गई। तब से गणपति विर्सजन शुरु हो गया। हर प्रांत के लोग गणपति उत्सव मनाते हैं क्योंकि दक्षिण भारत के कला शिरोमणि गणपति तो सबके हैं। तिलक ने गणेश उत्सव द्वारा, अंग्रेजों के विरुद्ध सबको संगठित किया था। आज देश विदेश में भारतवासी इसे मिलजुल कर ही मनाते हैं। 

    लोकमान्य तिलक के लगाए पौधे की शाखाएं देशभर में फैल गईं हैं। आनंद चतुर्दशी को गणपति विर्सजन होता है और जहां रामलीला होती है, उस स्थान का भूमि पूजन होता है।

सृजन, निर्माण, वास्तुकला, औजार, शिल्पकला, मूर्तिकला एवं वाहनों के देवता विश्वकर्मा की जयंती (17 सितम्बर) को मनाई जायेगी। कारीगरों का यह उत्सव का दिन है। सब एक जगह इक्कट्ठा होकर पूजा करते हैं और फिर मूर्ति का विर्सजन करते हैं।

ऋषि पंचमी (15 सितंबर) इस दिन सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) की पूजा की जाती है। बलराम जयंती (हल षष्ठी / ललही छठ) , 16 सितंबर को मनाई जाएगी।

मीनाक्षी अम्मन मंदिर कुंभाभिषेकम (17 सितंबर): मदुरै, तमिलनाडु में ऐतिहासिक मीनाक्षी अम्मन मंदिर का यह विशेष अनुष्ठान लगभग 17 साल के अंतराल के बाद आयोजित हो रहा है।

राधाष्टमी(18 सितम्बर) का त्योहार परंपरागत रूप से ब्रज, बरसाना, मथुरा वृंदावन के आसपास के क्षेत्र के साथ उत्तर भारत में मनाते हैं। मंदिरों में कीर्तन का आयोजन किया जाता है। महान शास्त्रीय संगीतकार, संगीतज्ञों के आराध्य, ध्रु्रपद के जनक, स्वामी हरिदास का जन्म भी इसी दिन हुआ था। बैजू बावरा, तानसेन जेैसे दिग्गज संगीतज्ञ उनके शिष्य थे। इनके जन्मोत्सव पर विश्वभर के शास्त्रीय संगीतज्ञ उन्हें भावांजलि देने, स्वामी हरिदास संगीत एवं नृत्य महोत्सव में आते हैं।

लेह लद्दाख महोत्सव(20 से 25 सितम्बर) का मुख्य उद्देश्य लदृदाख की समृद्ध संास्कृतिक, विरासत और परंपरा को पुर्नजीवित कर देश दुनिया के सामने लाना है। सात दिवसीय यह उत्सव जम्मू-कश्मीर पर्यटन, स्थानीय समुदायों जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित किया जाता है। लेह के विभिन्न क्षेत्रों से मंडलियां, स्थानीय नेता, स्कूली बच्चे और नर्तक पारंपरिक पोशाक में शामिल होते है। सब धुनों पर नृत्य करते चलते हैं। इस त्यौहार के मुख्य आर्कषण हैं संगीत, रंगमंच, पोलो, तीरंदाजी, मुखौटा और स्थानीय कला और शिल्प आदि। लोक नृत्य और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों के साथ लद्दाखी भोजन, स्थानीय व्यंजन मसलन सेल रोटी, खंबीर, मामोज, खंपा का देश दुनिया के लोग आनन्द उठाते हैं।

हेइक्रू हिदोंगबा (22 सितंबर): मणिपुर तिथि   (पारंपरिक चंद्र कैलेंडर के अनुसार)विशेषता: यह एक ऐतिहासिक और धार्मिक नौका दौड़ उत्सव है। इसमें लंबी और संकीर्ण नावों पर सवार होकर लोग पारंपरिक अनुष्ठान व प्रतियोगिता करते हैं। वामन जयंती (वामन द्वादशी 23 सितंबर) को है। इस दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था।

इस दिन भगवान विष्णु के पांचवें वामन रूप की पूजा की जाती है। जीरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक (24 से 27 सितंबर):जीरो वैली, अरुणाचल प्रदेश में यह भारत का सबसे बड़ा आउटडोर इंडी म्यूजिक फेस्टिवल है। इस उत्सव को बांस के बने मंचों और इको-फ्रेंडली तौर-तरीकों से आयोजित किया जाता है।  अरुणाचल प्रदेश के जीरो घाटी में होने वाला प्रसिद्ध इंडी-म्यूजिक और सांस्कृतिक उत्सव है ।

मिम कुट मिजोरम (कुकी-चिन-मिजो समुदाय) का मक्का की फसल के स्वागत से जुड़ा एक प्राचीन उत्सव है, जिसमें गीत-संगीत और लोक नृत्य किए जाते हैं। आमतौर पर उत्सव का दिन सितंबर के महीने की शुरुआत (निश्चित तिथि फसल और स्थानीय पंचांग पर निर्भर करती है) में मक्के की फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है। यह मिजोरम और पूर्वोत्तर भारत के मिज़ो-कुकी-ज़ो समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक पारंपरिक फसल और पूर्वजों की याद का त्योहार है। त्योहार में मुख्य पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना और भोजन अर्पित करना है। उत्सव में पारंपरिक संगीत, लोक नृत्य और सामूहिक दावत है।

हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष(26 सितम्बर से 10 अक्तूबर) का विशेष महत्व है। मान्यता है कि यमराज श्राद्ध पक्ष में पितरों को मुक्त कर देते हैं ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। पितरों के निमित्त किए गए तर्पण से पितर, तृप्त होकर वंशजों को आर्शीवाद देते हैं। जिससे जीवन में सुख समृद्धि प्राप्त होती है।

   दस दिन तक घर-घर में गणपति बप्पा, नई शुरुआत, बुद्धि और समृद्धि का प्रतीक बिठाये हैं।

गणेश विसर्जन यानि बप्पा को विदाई। "अगले बरस तू जल्दी आ" के साथ दी जाती है। फिर पितरों को याद करते हैं।"त्योहारों और बदलाव" का महीना है न सितम्बर।

 प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के सितंबर अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है।





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