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Sunday, 23 August 2026

तुलसी जयंती समारोह Tulsi Jayanti Celebration

 


तुलसी जयंती समारोह प्रोफेसर लल्लन प्रसाद अध्यक्ष उत्तर प्रदेश समाज के निवास पर उल्लासपूर्वक मनाया गया। समारोह में श्री कलराज मिश्र राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल तथा केंद्र सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री, मुख्य अतिथि रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री वाई. डी. बनकटा आई. ए. एस. ने की। कार्यक्रम का संचालन कायाकल्प साहित्यिक कला फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ अशोक मधुप ने किया। 20 से अधिक कवियों और कवित्रियों ने बहुत सुंदर सरस काव्य पाठ किया। जिनमें  प्रोफेसर लल्लन प्रसाद, बाबा कानपुरी, डॉक्टर तूलिका सेठ, संगीता गोयल, हाशिम देहलवी आदि शामिल थे। सुश्री निशा केसरी ने कथक नृत्य से सब का मन मोह लिया।


अपने उद्बोधन में श्री कलराज मिश्र ने तुलसीदास की भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति देन की सराहना की और कहा 'नई पीढ़ी को मानस के अध्ययन के लिए प्रेरित करना चाहिए।'  

श्री वीरेश तिवारी महासचिव उत्तर प्रदेश समाज में ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। नगर के साहित्य प्रेमी नागरिकों की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

https://www.instagram.com/reel/DcY7NMug8K2/?igsi=emxwNWlld3hhOGNq 











Friday, 14 August 2026

मीडिया कर्मियों के तनाव को दूर करने के लिए आध्यात्मिक एवं रिफ्रेशिंग सत्र आयोजितSpiritual and refreshing sessions organized to relieve stress among media personnel.

 


नोएडा। मीडिया जगत की व्यस्त और चुनौतीपूर्ण दिनचर्या के बीच पत्रकारों एवं मीडिया कर्मियों को मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और नई उमंग प्रदान करने के उद्देश्य से शुक्रवार को नोएडा मीडिया क्लब, सेक्टर-29 में ब्रह्माकुमारीज़, नोएडा की ओर से विशेष “स्पिरिचुअल & रिफ़्रेशिंग सेशन ” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मीडिया कर्मियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का उद्देश्य मीडिया कर्मियों को रोजमर्रा के कार्यों से कुछ समय निकालकर स्वयं से जुड़ने, तनाव कम करने और सकारात्मक सोच विकसित करने का अवसर प्रदान करना रहा। इस दौरान आध्यात्मिक मार्गदर्शन के साथ मेडिटेशन एवं तनाव से राहत के लिए ध्यान अभ्यास कराया गया। सत्र के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता का क्षेत्र अत्यंत जिम्मेदारी और निरंतर दबाव वाला कार्य है। समाचारों की आपाधापी और बदलते घटनाक्रम के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। नियमित मेडिटेशन और सकारात्मक चिंतन व्यक्ति को तनाव से निपटने के साथ-साथ कार्यक्षमता बढ़ाने में भी मदद करता है।

कार्यक्रम के दौरान ब्रह्माकुमारी बहनों ने उपस्थित मीडिया कर्मियों को स्नेह और भाईचारे के प्रतीक के रूप में राखी भी बांधी। इस अवसर पर उन्होंने सभी मीडिया कर्मियों के स्वस्थ, सुखी एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना की और समाज एवं देशहित में उनके निरंतर योगदान के लिए शुभकामनाएं दीं। राखी बांधने के इस आत्मीय अवसर ने कार्यक्रम के आध्यात्मिक एवं पारिवारिक भाव को और भी मजबूत किया।

कार्यक्रम में मौजूद मीडिया कर्मियों ने आध्यात्मिक एवं ध्यान सत्र को उपयोगी और सकारात्मक अनुभव बताया। प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से मन को शांति मिलती है और व्यस्त दिनचर्या के बीच ऊर्जा एवं उत्साह का संचार होता है।

कार्यक्रम के दौरान आपसी सौहार्द और आत्मीयता का वातावरण देखने को मिला। आयोजन के समापन पर मीडिया कर्मियों के लिए ब्रह्मा भोज का भी आयोजन किया गया।

ब्रह्माकुमारीज़, नोएडा की ओर से कहा गया कि समाज के लिए निरंतर कार्य करने वाले मीडिया कर्मियों के मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए भविष्य में भी इस तरह के सकारात्मक और प्रेरणादायी कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे। कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया और आध्यात्मिक शांति, सकारात्मकता एवं आनंद को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया।







Saturday, 8 August 2026

धोबी के घर आए चोर, लूटे गए और! Dhobi ke ghar aye chor loote gaye aur Neelam Bhagi नीलम भागी

 


गीता प्रेस वाले को कपड़े  देती है तो शाम को या रात तक ले लेती है। मैंने उससे पूछा, " क्या प्रेस वाला भैया, तुम्हारे कपड़े लेकर भाग जाएगा! यहां वह रहता है और उसका रोजगार है।" गीता का जवाब बहुत संतोषजनक लगा। उसने एक लोक कथन बोला, " धोबी के घर आए चोर, लूटे गए और" यानी यदि प्रेस वाले के घर में चोरी हो गई तो कपड़े तो औरों के जाएंगे। यह बहुत कड़ी मेहनत से और मुश्किल से परिवार का पालन कर रहा है इसलिए हर्जाना तो देगा नहीं क्योंकि पैसे जो चोरी हो गए हैं। महानगर में धोबी बहुत डिमांड में रहते हैं।  जगह महंगी है। किराया दे नहीं सकते क्योंकि किराया भी बहुत है इसलिए बेरोजगार प्रेस वाला जब शहर में आता है तो वह खाली प्लॉट या जिस जगह मकान में किराएदार रहता है लेकिन लोकेशन अच्छी हो मसलन पार्क और  सड़क के बीच जगह देखकर एक मेज़, प्रेस, कोयला और अपने हुनर के भरोसे, निजी मेहनत से कारोबार शुरू कर देता है और पहले दिन से ही उसका काम शुरू हो जाता है। जिसके घर के आगे होते हैं उसका कपड़ा मुफ्त में किया जाता है। बदले में उनसे पानी आदि मिल जाता है और उसके घर की रखवाली भी हो जाती है। किसी प्रेस वाले को सुविधा की बिजली भी मिल जाती है इसलिए वह दोनों तरह की प्रेस का इस्तेमाल करता है। धूप में बचने के लिए जो आड़ लगाई जाती है, वह बाद में झुग्गी में बदल जाती हैं और आसपास के ब्लॉक को सुख हो जाता है कि पड़ोस में ही कपड़े प्रेस हो जाते हैं। कोई कपड़ा अर्जेंट हो तो वह भी तुरंत प्रेस हो जाता है। कुछ साल पहले मेरे स्कूल में प्रेस वाले के बच्चे पढ़ते थे। पति-पत्नी प्रेस करते थे। किसी ग्राहक के द्वारा पति का मिडिल ईस्ट जाने का, जाकर कमाने का काम बन गया और वह विदेश कमाने चला गया। पत्नी ने पति की जगह काम के लिए किसी को गिनती पर आधे पैसे में रख लिया। धीरे-धीरे उसका खूब काम चल गया। अब वह खुद भी प्रेस नहीं करती औरों को प्रेस करने के लिए रख लिया। आप वह बस हिसाब किताब देखती। किसी का कपड़ा न खो जाए गलत जगह न चला जाए, इसका बहुत ध्यान रखती। 1 साल बाद पति छुट्टी पर आया। उसने पत्नी के काम का फैलाव देखा तो तुरंत पत्नी को गांव वापस भेजने का फैसला किया। वह जब बच्चों की टी.सी लेने आई तो मैंने पूछा, " तुम्हारे बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे हैं क्यों इनका नाम कटवा रही हो? " सुनते ही वह रोने लगी और बोली, "दीदी मैं बहुत अच्छा कमाने लगी हूं और यहां पर जमा हुआ रोजगार है। ठिये की कीमत भी बहुत अच्छी मिल रही है। 1 साल में मेरा काम हो गया है। मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं इसलिए मैंने बच्चों को ट्यूशन वगैरा सब लगा दिया है। सब ठीक-ठाक चल रहा है इन्होंने ठिया का पैसा ले लिया है और ठिया आगे किसी को दे दिया है। हमें गांव में अपने परिवार के संरक्षण में रखकर फिर विदेश जाएंगे।" उसके जाते ही मैं साेच में पड़ गई कि वह यहां भी तो पत्नी के साथ काम करके इस काम को और बढ़ा सकता था।

अगर आपका कपड़ा वापस प्रेस होकर नहीं आया तो यहां प्रेस वाला परवाह नहीं करता है। आप पूछने जाएंगे तो कहेगा किसी के पास गलती से चला गया होगा अगर वह लौटा देगा तो आपको मिल जाएगा। आप अगर गुस्सा करेंगे तो कहेगा। आप आधे पैसे ले लो पर फिर मैं आपका कपड़ा प्रेस नहीं करूंगा। यहां भी बतासों की बात ठीक लगी। उसकी गलती से नुकसान धोबी का नहीं आपका होगा। इनकी एक बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। बच्चों को अपनी समर्थ के अनुसार स्कूल में पढ़ाते हैं। मेरे घर के पास वाला धोबी हमेशा अपने बेटे को कोसता रहता था। इतनी तेरी फीस देता हूं, पढ़ता नहीं है। अब तो नालायक ने स्कूल जाना भी बंद कर दिया है। पर उस नालायक बेटे ने घूमते-फिरते एक नई मल्टी स्टोरी सोसाइटी देख ली। पिताजी ने वहां पर उसको मेज़ लगा दी। काम चल निकला अब पिताजी ने इस ठिए को आगे किसी को देकर कैश हाथ में लिया और नालायक बेटे की मदद करने उसके पास चले गये।

Wednesday, 5 August 2026

दित्या की भाषा Ditya's Language Neelam Bhagi Migration to America अमेरिका प्रवास नीलम भागी

 


मैं जब अमेरिका गई तो दित्या मुझसे हिंदी में बात करती थी। जाने से पहले जब भी मैं वीडियो कॉल करती वह मुझे कहती, "नानी आओ।" मैं उसे जवाब देती कि तू मेरे साथ हिंदी में बात करेगी तो आऊंगी। उत्कर्षनी और राजीव जी उससे हिंदी में बात करते हैं। मेरे वहां जाने पर उसने मेरे साथ हिंदी में ही बात की और हर वक्त मेरे साथ रही सोई भी मेरे साथ थी। उसे डर था मैं भारत न लौट जाऊं। डेढ़ महीने बाद जब मैं लौटी, एयरपोर्ट पर मुझे जाते देखकर वह चीख़ चीख़ के रोने लगी। मेरा मन भी भारी था। मेरे बाजू में बैठकर मुझे छोड़ने आई थी। गाड़ी से उतरते समय मैंने उसे प्यार भी नहीं किया। रोने से डर कर मैं उससे मिली नहीं। उसे बिना देखें एयरपोर्ट चली गई। भारत आने पर जब भी मैं वीडियो कॉल करती। वह हिंदी नहीं बोलती। जब भी मैं कहती, " दित्या हिंदी बोलो। " वह जवाब देती, "मैं भूल गई I forgot." 3 महीने बाद मैं फिर अमेरिका गई। उसने एक भी शब्द मुझसे हिंदी का नहीं बोला। घूमती, फिरती, सोती  मेरे साथ थी। अजीब तरह से गुस्से में भरी रहती। समझदार इतनी कि मुझे नानी कहती है लेकिन अपने स्कूल में, डांस, स्विमिंग, सॉकर क्लास के टीचर और दोस्तों से मेरा परिचय कराते समय कहती, "माय ग्रैंडमा।"  उत्कर्षनी  बताती है ऐसा इसलिए कहती है कि यहां नानी शब्द नहीं होता तो कोई नानी को नैनी न समझें।😃 पर मुझसे नाराजगी  दिखाने का यही तरीका था कि एक शब्द भी हिंदी का न बोलना। केरल का एक परिवार इनका मित्र है। उनका बेटा केलव और दित्या एक ही अस्पताल में एक ही दिन पैदा हुए थे। उत्कर्षनी ने उनसे कहा कि दित्या को पता नहीं क्या हो गया! पिछली बार मम्मी आई थीं यह उनसे हिंदी में बोलती थी 1 मिनट भी आंखों से ओझल नहीं होने देती हैं। इस बार उनके आते ही हिंदी बोलना बंद और गुस्से में रहती है। उन्होंने कहा, " यह उनसे नाराज है। मेरे मम्मी पापा भी जब पहली बार इसको छोड़ कर गए थे। दोबारा आए तो केलव का भी उनसे यही व्यवहार था। जब वह काफी दिन रह लिए फिर यह उनसे नार्मल हो गया। अब इसको यह समझ आ गया कि यह आते जाते रहेंगे। अब सबको तसल्ली हो गई है । एक महीने बाद दित्या मेरे साथ पहले जैसी हो गई। साढ़े चार महीने  रुकी फिर उसको धीरे-धीरे समझाया कि मैं वापस जा रही हूं फिर मैं आऊंगी। उसको समझ आ गया कि जाने के बाद आते भी हैं फिर जाते हैं। दित्या हिंदी में बात करने लगी। जहां उसको शब्दों की कमी होती है। अपनी कोई भाषा बोल देती है। इंग्लिश तो वहां बोलते हैं, स्पेनिश सीख रही है। घर में हिंदी बोली जाती है। इससे हिंदी में पूछे प्रश्न का जवाब सुने 😃   https://www.instagram.com/reel/Dbq5FqPS9_C/?igsh=MXBvd2FzMndybHR6eA==

Saturday, 1 August 2026

झूला तो पड़ गए, आंबुआ की डार पे जी एजी कोई राधा को, गोपाला बिन राधा को... झुलावे झूला कौन!!

 


हमारे विशाल भारत में कहीं न कहीं प्रतिदिन उत्सव है और हिंदू धर्म में उत्सव के बारे में प्रचलित कथाएँ उसे और भी लोकमंगलकारी बना देती हैं। श्रावण मास शुरू है।   सावन में भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। सावन केे पहले सोमवार(3, 10,17,24 अगस्त) से शिवभक्त कांवड लेने जा सकते हैं। फिर हरिद्वार या गोमुख से यात्रा आरम्भ होती है। कंधे पर कांवड़, जिसमें गंगा जल होता है और ये यात्रा कांवड़ यात्रा कहलाती है। जो कांवड़ लेने जाते हैं वे भगवा भेष में होते हैं। कोई शिवजी का गण बना होता है। सजा हुआ कावंड उठाए कांवड़िए का एक ही नाम होता है ’भोला’। इस यात्रा में भोले कंघी, तेल, साबुन का इस्तेमाल नहीं करते हैं। मार्ग में कांवड़ को धरती से नहीं छूना है। कांवड़ शिविर में उसे टांगते हैं और आराम करते हैं। यात्रा में इनके आपस में पारिवारिक संबंध भी बन जाते हैं। जो कांवड़ लेने नहीं जाते वे कांवड़  शिविर में सेवा करने जाते हैं। सावन की शिवरात्री(11 अगस्त)  को शिवजी का श्री गंगाजल से रूद्राभिषेक किया जाता है। सावन के सोमवार को तो शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। तेलंगाना का 1 महीने तक चलने वाला बोनालू मुख्य उत्सव (पुराना शहर और लाल दरवाजा हैदराबाद ) 2 अगस्त को है। बोनालू का समापन 9 अगस्त और सार्वजनिक अवकाश 10 अगस्त को है। इस भव्य उत्सव के दौरान, श्रद्धालु (विशेषकर महिलाएं) पारंपरिक वेशभूषा में सजकर सिर पर बोनम (चावल, गुड़, दूध और दही से भरा कलश) रखकर देवी को अर्पित करते हैं। उत्सव के मुख्य आकर्षणों में पोथुराजु का पारंपरिक नृत्य और भविष्यवाणियों से जुड़ा अनुष्ठान 'रंगम' शामिल हैं। सिंधारा तीज जिसे हरियाली तीज(15 अगस्त) भी कहते हैं। सावन में आने वाले इस त्यौहार में प्रकृति ने हरियाली की चादर ओढ़ी होती है। इस दिन को भोलेनाथ और माता पार्वती के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन की बौछारों में हरे भरे पेड़ो पर झूले पड़ जाते हैं। कहीं कहीं यह उत्सव तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन मायके से सिंधारा में घेवर मिठाई, मेहंदी, चूड़ियां आदि सुहाग की चीजे आतीं हैं। दूसरे दिन हरी हरी मेहंदी हाथ पैरों में लगाई जाती है। अगले दिन सौभाग्यवती महिलाएं पकवान बनाती हैं और हरी पोशाक पहने, श्रृंगार करके माता पार्वती की पूजा करती हैं। सास को बायना देकर उनसे आर्शीवाद लेकर सपरिवार भोजन करती हैं। कहीं कहीं पर इससे पहले दिन से निर्जला वृत रखती हैं। नई बहू को पहले सावन में मैके भेज दिया जाता है। रिवाज़ है कि पहला सावन सास बहू इक्ट्ठे नहीं रहतीं हैं। तीज पर ससुराल से बहू के लिए सिंधारा जाता है। हमारे लोकगीतों में भी हरियाली, सावन के झूले, रिमझिम वर्षा की फुहारों में झूलती गाती सखियां होती हैं। पहले छोटी आयु में बेटियों की शादी हो जाती थी। हरियाली तीज उत्सव से वह पहला सावन पुरानी सखियों के साथ मना जातीं हैं। उस अवसर पर भीषण गर्मी से राहत मिलने के कारण मन खुश रहता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनन्द मनाती हैं। दक्षिण भारत का स्वर्ण गौरी व्रत  मुख्य रूप से कर्नाटक में विवाहित महिलाओं द्वारा देवी गौरी (पार्वती) की पूजा और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाने वाला इस दिन व्रत है।

  नाग को हमारे यहां देवता की तरह पूजा जाता है। नागपंचमी(17 अगस्त) पर इनकी पूजा का विशेष दिन होता है। हमारे पूर्वजों ने इनकी पूजा करके हमें बताया है कि सभी सांप जहरीले नहीं होते हैं। इनको देखते ही मारना नहीं चाहिए। सांपों का मुख्य भोजन चूहे हैं और चूहे अनाज को नष्ट करते हैं। चूहों के मल मूत्र से खतरनाक हन्ता वायरस फैलने का डर रहता है।  

 गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ था। इस वर्ष (19 अगस्त) को उनकी  जयंती है। इनके द्वारा रचित श्री रामचरितमानस और हनुमान चालीसा को घर में रखना शुभ मानते हैं। तुलसी जयंती पर देश भर में संगोष्ठी और सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। श्रावण पुत्रदा एकादशी (24 अगस्त) मनाई जाएगी। यह व्रत संतान प्राप्ति, संतान की सुरक्षा और परिवार की सुख-शांति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित होता है।

 ओणम (26 अगस्त)  केरल का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध फसल उत्सव, जो दस दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। इसमें नौ प्रकार के पारंपरिक व्यंजन (ओणम साड्या), नौका दौड़ (वल्लम कली) और रंग-बिरंगी रंगोलियाँ (पूकक्लम) शामिल हैं। दक्षिण भारत में ओणम केरल का प्राचीन पारंपरिक, धार्मिक, सांस्कृतिक उत्सव हैं, जिसे दुनियाभर में मलयाली समाज मनाता है। 16 अगस्त से शुरु होकर 26  को इसका समापन होगा। केरल में चार दिन की छुट्टी होती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन प्रत्येक वर्ष राजा महाबलि पाताल लोक से धरती पर अपनी प्रजा को आर्शीवाद देने आते हैं और नई फसल आने की खुशी भी होती है। ओणम उत्सव अपनी सांस्कृतिक प्रथाओं में नाव दौड़, नृत्य रुपों, फूलों, रंगीन कला, भोजन और पारंपरिक कपड़ों से लेकर ओनसद्या यानि भोज है, जिसमें केले के पत्ते पर 29 शाकाहारी व्यंजन परोसे जाते हैं। तिरुवोनम, दसवें दिन अपने घरों के प्रवेश द्वार पर आटे के घोल से अल्पना सजाते हैं। नये कपड़े पहनते हैं। ऐसा मानना है कि इस दिन राजा महाबली हर घर जाते हैं और परिवार को आर्शीवाद देते हैं और परिवार दावत के लिए इक्ट्ठा होता है। 

रक्षाबंधन, वर लक्ष्मी व्रत, नारली पूर्णिमा (28 अगस्त)  

वरलक्ष्मी व्रतम्   दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में देवी लक्ष्मी की कृपा और धन-धान्य की प्राप्ति के लिए विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला अत्यंत शुभ व्रत है।

नारली पूर्णिमा महाराष्ट्र, गोआ, केरल, गुजरात सागर तटीय प्रांतों में इसे नारियल पूर्णिमा भी कहते हैं। इसमें वर्षा के देवता वरूण की पूजा करके समुद्र से शांत रहने की प्रार्थना करते हैं और समुद्र को नारियल भेट करते हैं। फिर बहने भाई को रक्षासूत्र बांधतीं हैं। इस दिन से फिर से मछली पकड़ना शुरू किया जाता है। यह

मछुआरों का त्योहार महाराष्ट्र और कोंकण तट के मछुआरा समुदाय द्वारा समुद्र और जल के देवता वरुण को धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है। Q

समुद्र की पूजा इस दिन समुद्र में नौकायन को सुरक्षित बनाने और मौसम के अनुकूल होने की प्रार्थना के साथ समुद्र में नारियल अर्पित किया जाता है। क्योंकि

नारियल को भगवान शिव के तीन नेत्रों का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे प्रसाद के रूप में पूजा में शामिल किया जाता है और त्योहार के दिन नारियल के पकवान (जैसे नारियल चावल) बनाए जाते है।

बहन की सुरक्षा के लिए भाई की प्रतिबद्धता, भाई बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षा बंधन सावन मास की पूर्णिमा को  को मनाया जाता है। रक्षाबंधन के बारे में कई पौराणिक कथाएँ हैं, मसलन भगवान कृष्ण ने जब शिशुपाल का वध किया था तो सुर्दशन चक्र से उनकी अंगुली पर घाव हो गया था। उनकी अंगुली से रक्त बहता देखकर द्रोपदी ने अपनी साड़ी चीर कर उसका टुकड़ा, उनकी अंगुली पर बांधा था। श्री कृष्ण उनके स्नेह से प्रभावित हुए। जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था तो श्रीकृष्ण उसकी रक्षा के लिए पहुँचे। तभी से रक्षा बंधन मनाने की परंपरा है। इतिहास में भी कई कहानियां हैं। रक्षा बंधन मनाने के पीछे हमारे पूर्वजों की बहुत प्यारी सोच है। गांव की बेटी, दूसरे गांव में ब्याही जाती है। उसके सुख दुख की खबर भी रखनी है। माता पिता सदा तो रहते नहीं हैं। उनके बाद भाई बहन की सुध लेता रहे। इस त्यौहार पर भाई के घर बहन आती है या भाई, बहन के घर राखी बंधवाने जाता है। बहन भाई का यह उत्सव परिवारिक मिलन है। इसे देश विदेश में रहने वाले समस्त हिन्दू मनाते हैं। पहले राजपुरोहित राजा को रक्षा सूत्र बांधते थे। राजा धर्म और सत्य की रक्षा का संकल्प लेता था। पारिवारिक उत्सव तो है ही, जो चलता आ रहा है। धार्मिक मान्यताओं के कारण समस्त हिन्दू धर्म का प्रत्येक वर्ग, जाति और वर्ण इसे मनाता है। इस पर्व की उत्पत्ति लोक संस्कृति से हुई, जिसमें पारंपरिक रूप से एक जिम्मेदारी का हिस्सा दिया जाता है। जो रक्त से रिश्तेदार नहीं हैं, वे भी आपस में रक्षासूत्र बांधने से स्वैक्षिक संबंधों की परम्परा के सम्मान के प्रतीक के रूप में बंध जाते हैं।  

   संघ परिवार के साथ परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समस्त हिन्दू समाज में सामजस्य स्थापित करने के लिए इस दिन परम पवित्र भगवा ध्वज पर रक्षा सूत्र बांधकर उस संकल्प का स्मरण करवाया जिसमें कहा गया है कि धर्मों रक्षित रक्षितः अर्थात हम सब मिलकर धर्म की रक्षा करें। समस्त हिन्दू समाज मिलकर, समस्त हिन्दू समाज की रक्षा का संकल्प ले। स्वयंसेवकों ने समस्त हिन्दू धर्म की रक्षा का संकल्प लिया। इस प्रकार इस सुन्दर स्वरूप के साथ रक्षा बंधन, चौथा संघ उत्सव हो गया। रक्षा बंधन, धर्म का बंधन है जो परिवार को बांधता है और परिवारों से राष्ट्र है।

   सबसे श्रेष्ठ संबंध भातृत्व भाव है। इस भावना से स्वयंसेवक किसी भी प्रांत या भाषा के वंचित गरीब परिवारों में जाकर वहाँ रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते हैं। उनके साथ भोजन करते हैं। जो रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र बंध गया तो इन परिवारों के संपर्क में रहते हैं। इस उत्सव के द्वारा समाज के वे वर्ग जो हाशिए पर खड़े थे, वे भी मुख्यधारा में आने लगे हैं। यह व्यक्तिगत  बहन भाई का उत्सव, संघ के प्रयास से धीरे धीरे सभी प्रांतों में सामाजिक स्तर पर मनाया जाने लगा है। अब रक्षाबंधन सामाजिक समरसता का प्रतीक है। स्वयंसेवक रक्षासूत्र बांधते समय और बंधवाते समय कभी गरीबी, अमीरी, जाति, प्रांतीयता का मन में भाव नहीं लाते। उड़ीसा में किसान मवेशियों को भी रक्षा सूत्र बांधते हैं क्योंकि इस दिन खेती के देवता बलभद्र का जन्मदिन है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में कजरी पूर्णिमा है तो पंजाब हरियाणा में इसे सलोनो कह कर मनाया जाता है। झारखंड, उत्तराखंड में तो श्रावणी मेला लगता है। देवघर जाने पर मैंने देखा वहाँ तो भगवा के सिवाय कोई रंग ही नज़्ार नहीं आ रहा था।  अब कुछ और भी परिवर्तन होने लगे हैं। आजकल दो बच्चों का, देश विदेश में नौकरी के कारण एकल परिवार है। कहीं दो बहनें हैं तो कहीं दो भाई हैं। त्यौहार भारतीय संस्कृति की आधारशिला हैं। वो तो मनाया जायेगा ही इसलिए बहन बहन को, और भाई भाई को राखी बांधता है  और मिलकर पकवान बनाते हैं। इसमें हम पर्यावरण को भी नहीं भूलें हैं इसलिए पेड़ों की रक्षा के लिए उन्हें भी राखी बांधने लगे हैं। 

कजरी तीज सोमवार, 31 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 30 अगस्त की सुबह 09:36 बजे शुरू होकर 31 अगस्त की सुबह 08:50 बजे तक रहेगी। यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और पारिवारिक समृद्धि के लिए रखा जाता है

  हिंदू धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता है, सबके योग्य नियमों की लचीली व्यवस्था भी करता है। महानगरों की कामकाजी महिलाएं अपनी व्यवस्थता के कारण और छुट्टी न होने से परिवार में नहीं जा पातीं लेकिन घर में उत्सव जरुर मनाती हैं। जहां तीज महोत्सव का आयोजन किया जाता है, वहां पहुंच कर सखियों से मिलन भी हो जाता है। हरियाली धरती का सौन्दर्य है। उसी से हम सबका जीवन संभव है। और हमारा कर्त्तव्य है कि इसकी हरियाली को बनाये रखें।

पेड़ लगाए और जल संचयन करें।

नीलम भागी ( पत्रकार, लेखिका, ब्लॉगर, ट्रैवलर )

 प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के अगस्त अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है