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Thursday, 3 September 2026

"त्योहारों और बदलाव" का महीना है न सितम्बरSeptember is the month of festivals and change, isn't it? Neelam Bhagi नीलम भागी

 


मानसून खत्म होने को है, फसल तैयार है और गर्मी कम हो रही है तो हल्की ठंड की शुरुआत होने लगती है। इसलिए सितम्बर  को "त्योहारों और बदलाव" का महीना कहते हैं।सोलंग महोत्सव (1 से 5 सितंबर)अरुणाचल प्रदेश (आदि जनजाति द्वारा) यह एक कृषि उत्सव है। इसमें फसल की देवी किने नाने और पशुओं के देवता दादी बोते की पूजा की जाती है। पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक दावतें इसका मुख्य आकर्षण हैं। मोंगमोंग फेस्टिवल (1से 6 सितम्बर) नागालैंड के ओओ नागा समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला फसल और धन्यवाद उत्सव है । यह नागालैंड के सांताम जनजाति का छह दिवसीय प्रसिद्ध फसल कटाई उत्सव भी है। उत्सव का मुख्य बिंदु

"एकता और हमेशा साथ रहना" है। छह दिनों का मुख्य क्रम है। पहला दिन तैयारी और सामान जुटाना दूसरा दिन पारंपरिक अनुष्ठान और आशीर्वाद तीसरा दिन चूल्हे के तीन पत्थरों की पूजा और भोजन अर्पण चौथा दिन सामुदायिक सफाई और रास्ते ठीक करना पाँचवां दिन दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना, उपहारों का आदान-प्रदान। छठा दिन समापन प्रार्थना और बुरी ताकतों से बचाव के उपाय। कान्हा के जन्म (4 सितम्बर ) की खुशी हम ऐसे मनाते हैं जैसे परिवार में बालक का जन्म हुआ हो। मंदिरों में सजावट की जाती है। छोटे-छोटे बच्चों को कृष्ण के बाल रूप में सजाया जाता है। जगह-जगह कीर्तन होते हैं। लोग व्रत रखते हैं और कान्हा के जन्म के बाद व्रत का पारण करते हैं। महाराष्ट्र में जगह-जगह दही हांडी लगाई जाती है। कान्हा के बाल सखा बने युवक इसे फोड़ने की प्रतियोगिता में भाग लेते हैं। दक्षिण भारत में यह उत्सव 8 दिन तक मनाया जाता है। श्री कृष्णजन्माष्टमी के ठीक अगले दिन आता है, गोगा नवमी का पावन पर्व, 5 सितंबर को मनाया जाएगा।   इस दिन वीर गोगाजी (जाहरपीर) की पूजा की जाती है, जिन्हें सांपों से रक्षा करने वाला लोक देवता माना जाता है। भक्तगण अपने परिवार की रक्षा और कल्याण के लिए व्रत रखते हैं। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित गोगामेड़ी में इस अवसर पर विशाल मेला लगता है। इनको हिंदू और मुसलमान दोनों मानते हैं। हिंदुओं के गोगा वीर जी हैं और मुसलमान इन्हें जाहर पीर कहते हैं।

बैल पोला का  पारंपरिक त्योहार 10 सितंबर (श्रावण अमावस्या) को मनाया जाएगामवेशियों का उपकार मानना, हमारी भारतीय संस्कृति में अलग अलग रूपों में दिखाई देता है। मसलन पोला महोत्सव महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक के किसानों द्वारा मनाया जाता है। इस त्यौहार की तैयारी में बैलों को नहलाकर, उनकी तेल से मालिश करना, सींगों को रंग कर, नई लगाम और रस्सियाँ बदली जाती हैं। उन्हें शॉल, घंटियों और फूलों से सजाया जाता है। संगीत और नृत्य के साथ जुलूस के रूप में सब मवेशी गाँव के मैदान में ले जाये जाते हैं। सबसे पहले मैदान से बाहर जाने वाला एक बूढ़ा बैल होता है, उसके सींगों पर लकड़ी का फ्रेम(माखर) बंधा होता है। दो खंबों के बीच आम के पत्तों की रस्सी का बंधा तोरण होता है। वह माखर से इस तोरण को तोड़ता है। उसके पीछे सब मवेशी चलते हैं। कुछ की टांगों में घुंघरू भी बंधे होते हैं। जब जुलूस से मवेशी वापस आते हैं। तो परिवार उनकी पूजा की तैयार थाली, जिसमें घी का दिया, कुमकुम, पानी और मिठाई, पूरनपोली के साथ स्वागत करता है। गऊ माता को भी पूजता है। पोला के दिन किसान अपने बैलों से खेतों में काम नहीं करवाते। उन्हें बाजरे की खिचड़ी खिलाते हैं। किसान परिवार के साथ खेतों में मवेशियों ने भी बुआई, सिंचाई में मेहनत की है। किसान धूमधाम से ’बैल पोला’ उत्सव मना कर उनका धन्यवाद करते हैं। किसान परिवारों द्वारा खेती में बैलों के अमूल्य योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाने वाला एक प्रमुख उत्सव है और बच्चे मिट्टी या लकड़ी से बने नंदी बैल को सजाकर यह पर्व मनाते हैं।।


  नीलमपेरूर पडायनी (11 सितंबर): केरल के अलप्पुझा जिले में भगवती मंदिर में पारंपरिक कला और सांस्कृतिक अनुष्ठान के रूप में मनाया जाता है। वराह जयंती (13 सितंबर) को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु के तीसरे (वराह) अवतार को समर्पित है।

भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए यह रूप लिया था।

उत्तर भारत में महिलाओं का उत्सव हरतालिका तीज और दक्षिण भारत में इस व्रत को’’गौरी हब्बा’’(14 सितम्बर) के नाम से जाना जाता है। इस त्यौहार में प्रकृति ने हरियाली की चादर ओढ़ी होती है। इस दिन को भोलेनाथ और माता पार्वती के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। हरे भरे पेड़ो पर झूले पड़ जाते हैं। कहीं कहीं यह उत्सव तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन मायके से सिंधारा में घेवर मिठाई, मेहंदी, चूड़ियां आदि सुहाग की चीजे आतीं हैं। दूसरे दिन मेहंदी हाथ पैरों में लगाई जाती है। अगले दिन सौभाग्यवती महिलाएं निर्जला व्रत कर, पकवान बनाती हैं और हरी पोशाक पहने, श्रृंगार करके पति की लंबी आयु के लिए शिव पार्वती की पूजा कर, सास को बायना देती हैं। नई बहू को पहली तीज में मैके भेज दिया जाता है। तीज पर ससुराल से बहू के लिए सिंधारा जाता है। हमारे लोकगीतों में भी हरियाली, झूले, रिमझिम वर्षा की फुहारों में झूलती गाती सखियां होती हैं। पहले छोटी आयु में बेटियों की शादी हो जाती थी। पहला तीज उत्सव वह पुरानी सखियों के साथ मना जातीं है। हिंदू धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता है, सबके योग्य नियमों की लचीली व्यवस्था भी करता है। महानगरों की कामकाजी महिलाएं छुट्टी न होने से परिवार में नहीं जा पातीं, इसलिए जहां तीज महोत्सव का आयोजन किया जाता है, वहां पहुंच कर सखियों से मिल कर नाच गा भी लेती हैं। 


गौरी हब्बा गणेश चतुर्थी से एक दिन पूर्व मनाया जाता है। यह माना जाता है कि इस दिन गौरां, इस तरह घर में आती है, जिस तरह कोई साधारण स्त्री अपने माता पिता के घर आती है। अगले दिन उनके पुत्र गणपति ऐसे आते हैं जैसे अपनी मां पार्वती को कैलाश पर्वत ले जाने आए हों। गणेशोत्सव(14 से 25 सितम्बर) दस दिन महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु गणपतिमय रहता है। बप्पा के आवाहन से लेकर विर्सजन तक श्रद्धालु, आरती, पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में, लगभग सभी उपस्थित रहते हैं। घरों में भी गणपति 1,3,5,7,9 दिन बिठाते हैं। इसमें गौरी पूजन, दो दिन महालक्ष्मी पूजन, छप्पन भोग हैं।

त्यौहार के बीच में बेटियां भी गणपति से मिलने मायके आती हैं और बहुएं भी मायके जाती हैं। मुंबई में मैंने देखा, सामने फ्लैट में एक परिवार ने गणपति बिठाए तो उनके तीनों भाइयों के परिवार, दूसरे शहरों से वहीं आ जाते हैं। पूजा तो हर समय नहीं होती, बच्चे आपस में घुल मिल जाते हैं। महिलाओं पुरुषों की अपनी गोष्ठियां चलती हैं। अष्टमी को ऐसा माना जाता है कि इस दिन गौंरा अपने गणपति से मिलने आती हैं। उपवास रखकर, कुल्हड़ गुड़ियों के रुप में गौरी को पूजते हैं और सबको भोजन कराते हैं। दक्षिणा उपहार देते हैं पर उस दिन नियम है कुछ भी, जूठन(सभ्य लोग हैं जूठा नहीं छोड़ते) तक नहीं फेंकते। यहां तक कि पान खिलाया तो उसका कागज भी दहलीज से बाहर नहीं डालते। अगले दिन दक्षिणा उपहार ले जा सकते हैं। शाम को आरती के बाद कीर्तन होता है। मंगलकारी बप्पा साल में एक बार तो आते हैं इसलिए उनके सत्कार में कोई कमी न रह जाए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार मोदक, लड्डू के साथ तरह तरह के व्यंजनों का भोग लगाते हैं। जो सब मिल जुल कर, प्रशाद में खाते हैं। थोड़ी सी जगह में संबंधियों, मित्रों के साथ आनंद पूर्वक नाच भी लेते हैं। सोसाइटी के गणपति उत्सव में सबकी भागेदारी होती है।

आनंद चर्तुदशी के दिन गणपति विर्सजन होता है। नाचते हुए गणपति से विनती करते हुए कहते हैं कि अगले बरस तूं जल्दी आ और विर्सजन जूलूस में जाते हैं।  

गणपति विसर्जन की कथाएं बड़ी रोचक हैं। महर्षि वेदव्यास महाभारत की कथा लिखना चाह रहे थे पर उनके विचार प्रवाह की रफ्तार से, कलम साथ नहीं दे रही थी। उन्होंने गणपति से लिखने को कहा। उन्होंने लिखना स्वीकार किया पर पहले तय कर लिया कि वे लगातार लिखेंगे, जैसे ही उनका सुनाना बंद होगा, वह आगे नहीं लिखेंगे। महर्षि ने भी गणपति से प्रार्थना कर, उन्हें कहा,’’ आप भी एडिटिंग साथ साथ करेंगे।’’ गणपति ने स्वीकार कर लिया। जहां गणपति करेक्शन के लिए सोच विचार करने लगते, तब तक महर्षि अगले प्रसंग की तैयारी कर लेते। वे लगातार कथा सुना रहे थे। दसवें दिन जब महर्षि ने आखें खोलीं तो पाया कि गणपति के शरीर का ताप बढ़ गया है। उन्होंने तुरंत पास के जलकुंड से जल लाकर उनके शरीर पर प्रवाहित किया। उस दिन भाद्रपद की चतुर्दशी थी। इसी कारण प्रतिमा का विर्सजन चतुर्दशी को किया जाता है। महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। 

   गणपति उत्सव की शुरूवात, सांस्कृतिक राजधानी पुणे से हुई थी। शिवाजी के बचपन में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कस्बा में गणपति की स्थापना की थी। तिलक ने जब सार्वजनिक गणेश पूजन का आयोजन किया था तो उनका मकसद सभी जातियों धर्मों को एक साझा मंच देना था। पहला मौका था, जब सबने देव दर्शन कर चरण छुए थे। उत्सव के बाद प्रतिमा को वापस मंदिर में हमेशा की तरह स्थापित किया जाने लगा तो एक वर्ग ने इसका विरोध किया कि ये मूर्ति सबके द्वारा छुई गई है। उसी समय निर्णय लिया गया कि इसे सागर में विसर्जित किया जाए। दोनों पक्षों की बात रह गई। तब से गणपति विर्सजन शुरु हो गया। हर प्रांत के लोग गणपति उत्सव मनाते हैं क्योंकि दक्षिण भारत के कला शिरोमणि गणपति तो सबके हैं। तिलक ने गणेश उत्सव द्वारा, अंग्रेजों के विरुद्ध सबको संगठित किया था। आज देश विदेश में भारतवासी इसे मिलजुल कर ही मनाते हैं। 

    लोकमान्य तिलक के लगाए पौधे की शाखाएं देशभर में फैल गईं हैं। आनंद चतुर्दशी को गणपति विर्सजन होता है और जहां रामलीला होती है, उस स्थान का भूमि पूजन होता है।

सृजन, निर्माण, वास्तुकला, औजार, शिल्पकला, मूर्तिकला एवं वाहनों के देवता विश्वकर्मा की जयंती (17 सितम्बर) को मनाई जायेगी। कारीगरों का यह उत्सव का दिन है। सब एक जगह इक्कट्ठा होकर पूजा करते हैं और फिर मूर्ति का विर्सजन करते हैं।

ऋषि पंचमी (15 सितंबर) इस दिन सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) की पूजा की जाती है। बलराम जयंती (हल षष्ठी / ललही छठ) , 16 सितंबर को मनाई जाएगी।

मीनाक्षी अम्मन मंदिर कुंभाभिषेकम (17 सितंबर): मदुरै, तमिलनाडु में ऐतिहासिक मीनाक्षी अम्मन मंदिर का यह विशेष अनुष्ठान लगभग 17 साल के अंतराल के बाद आयोजित हो रहा है।

राधाष्टमी(18 सितम्बर) का त्योहार परंपरागत रूप से ब्रज, बरसाना, मथुरा वृंदावन के आसपास के क्षेत्र के साथ उत्तर भारत में मनाते हैं। मंदिरों में कीर्तन का आयोजन किया जाता है। महान शास्त्रीय संगीतकार, संगीतज्ञों के आराध्य, ध्रु्रपद के जनक, स्वामी हरिदास का जन्म भी इसी दिन हुआ था। बैजू बावरा, तानसेन जेैसे दिग्गज संगीतज्ञ उनके शिष्य थे। इनके जन्मोत्सव पर विश्वभर के शास्त्रीय संगीतज्ञ उन्हें भावांजलि देने, स्वामी हरिदास संगीत एवं नृत्य महोत्सव में आते हैं।

लेह लद्दाख महोत्सव(20 से 25 सितम्बर) का मुख्य उद्देश्य लदृदाख की समृद्ध संास्कृतिक, विरासत और परंपरा को पुर्नजीवित कर देश दुनिया के सामने लाना है। सात दिवसीय यह उत्सव जम्मू-कश्मीर पर्यटन, स्थानीय समुदायों जिला प्रशासन के सहयोग से आयोजित किया जाता है। लेह के विभिन्न क्षेत्रों से मंडलियां, स्थानीय नेता, स्कूली बच्चे और नर्तक पारंपरिक पोशाक में शामिल होते है। सब धुनों पर नृत्य करते चलते हैं। इस त्यौहार के मुख्य आर्कषण हैं संगीत, रंगमंच, पोलो, तीरंदाजी, मुखौटा और स्थानीय कला और शिल्प आदि। लोक नृत्य और अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों के साथ लद्दाखी भोजन, स्थानीय व्यंजन मसलन सेल रोटी, खंबीर, मामोज, खंपा का देश दुनिया के लोग आनन्द उठाते हैं।

हेइक्रू हिदोंगबा (22 सितंबर): मणिपुर तिथि   (पारंपरिक चंद्र कैलेंडर के अनुसार)विशेषता: यह एक ऐतिहासिक और धार्मिक नौका दौड़ उत्सव है। इसमें लंबी और संकीर्ण नावों पर सवार होकर लोग पारंपरिक अनुष्ठान व प्रतियोगिता करते हैं। वामन जयंती (वामन द्वादशी 23 सितंबर) को है। इस दिन भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया था।

इस दिन भगवान विष्णु के पांचवें वामन रूप की पूजा की जाती है। जीरो फेस्टिवल ऑफ म्यूजिक (24 से 27 सितंबर):जीरो वैली, अरुणाचल प्रदेश में यह भारत का सबसे बड़ा आउटडोर इंडी म्यूजिक फेस्टिवल है। इस उत्सव को बांस के बने मंचों और इको-फ्रेंडली तौर-तरीकों से आयोजित किया जाता है।  अरुणाचल प्रदेश के जीरो घाटी में होने वाला प्रसिद्ध इंडी-म्यूजिक और सांस्कृतिक उत्सव है ।

मिम कुट मिजोरम (कुकी-चिन-मिजो समुदाय) का मक्का की फसल के स्वागत से जुड़ा एक प्राचीन उत्सव है, जिसमें गीत-संगीत और लोक नृत्य किए जाते हैं। आमतौर पर उत्सव का दिन सितंबर के महीने की शुरुआत (निश्चित तिथि फसल और स्थानीय पंचांग पर निर्भर करती है) में मक्के की फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है। यह मिजोरम और पूर्वोत्तर भारत के मिज़ो-कुकी-ज़ो समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक पारंपरिक फसल और पूर्वजों की याद का त्योहार है। त्योहार में मुख्य पूर्वजों की आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना और भोजन अर्पित करना है। उत्सव में पारंपरिक संगीत, लोक नृत्य और सामूहिक दावत है।

हिन्दू धर्म में पितृ पक्ष(26 सितम्बर से 10 अक्तूबर) का विशेष महत्व है। मान्यता है कि यमराज श्राद्ध पक्ष में पितरों को मुक्त कर देते हैं ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। पितरों के निमित्त किए गए तर्पण से पितर, तृप्त होकर वंशजों को आर्शीवाद देते हैं। जिससे जीवन में सुख समृद्धि प्राप्त होती है।

   दस दिन तक घर-घर में गणपति बप्पा, नई शुरुआत, बुद्धि और समृद्धि का प्रतीक बिठाये हैं।

गणेश विसर्जन यानि बप्पा को विदाई। "अगले बरस तू जल्दी आ" के साथ दी जाती है। फिर पितरों को याद करते हैं।"त्योहारों और बदलाव" का महीना है न सितम्बर।

 प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के सितंबर अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है।





Sunday, 23 August 2026

तुलसी जयंती समारोह Tulsi Jayanti Celebration

 


तुलसी जयंती समारोह प्रोफेसर लल्लन प्रसाद अध्यक्ष उत्तर प्रदेश समाज के निवास पर उल्लासपूर्वक मनाया गया। समारोह में श्री कलराज मिश्र राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल तथा केंद्र सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री, मुख्य अतिथि रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री वाई. डी. बनकटा आई. ए. एस. ने की। कार्यक्रम का संचालन कायाकल्प साहित्यिक कला फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ अशोक मधुप ने किया। 20 से अधिक कवियों और कवित्रियों ने बहुत सुंदर सरस काव्य पाठ किया। जिनमें  प्रोफेसर लल्लन प्रसाद, बाबा कानपुरी, डॉक्टर तूलिका सेठ, संगीता गोयल, हाशिम देहलवी आदि शामिल थे। सुश्री निशा केसरी ने कथक नृत्य से सब का मन मोह लिया।


अपने उद्बोधन में श्री कलराज मिश्र ने तुलसीदास की भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रति देन की सराहना की और कहा 'नई पीढ़ी को मानस के अध्ययन के लिए प्रेरित करना चाहिए।'  

श्री वीरेश तिवारी महासचिव उत्तर प्रदेश समाज में ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। नगर के साहित्य प्रेमी नागरिकों की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

https://www.instagram.com/reel/DcY7NMug8K2/?igsi=emxwNWlld3hhOGNq 











Friday, 14 August 2026

मीडिया कर्मियों के तनाव को दूर करने के लिए आध्यात्मिक एवं रिफ्रेशिंग सत्र आयोजितSpiritual and refreshing sessions organized to relieve stress among media personnel.

 


नोएडा। मीडिया जगत की व्यस्त और चुनौतीपूर्ण दिनचर्या के बीच पत्रकारों एवं मीडिया कर्मियों को मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और नई उमंग प्रदान करने के उद्देश्य से शुक्रवार को नोएडा मीडिया क्लब, सेक्टर-29 में ब्रह्माकुमारीज़, नोएडा की ओर से विशेष “स्पिरिचुअल & रिफ़्रेशिंग सेशन ” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मीडिया कर्मियों ने सहभागिता की।

कार्यक्रम का उद्देश्य मीडिया कर्मियों को रोजमर्रा के कार्यों से कुछ समय निकालकर स्वयं से जुड़ने, तनाव कम करने और सकारात्मक सोच विकसित करने का अवसर प्रदान करना रहा। इस दौरान आध्यात्मिक मार्गदर्शन के साथ मेडिटेशन एवं तनाव से राहत के लिए ध्यान अभ्यास कराया गया। सत्र के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता का क्षेत्र अत्यंत जिम्मेदारी और निरंतर दबाव वाला कार्य है। समाचारों की आपाधापी और बदलते घटनाक्रम के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। नियमित मेडिटेशन और सकारात्मक चिंतन व्यक्ति को तनाव से निपटने के साथ-साथ कार्यक्षमता बढ़ाने में भी मदद करता है।

कार्यक्रम के दौरान ब्रह्माकुमारी बहनों ने उपस्थित मीडिया कर्मियों को स्नेह और भाईचारे के प्रतीक के रूप में राखी भी बांधी। इस अवसर पर उन्होंने सभी मीडिया कर्मियों के स्वस्थ, सुखी एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना की और समाज एवं देशहित में उनके निरंतर योगदान के लिए शुभकामनाएं दीं। राखी बांधने के इस आत्मीय अवसर ने कार्यक्रम के आध्यात्मिक एवं पारिवारिक भाव को और भी मजबूत किया।

कार्यक्रम में मौजूद मीडिया कर्मियों ने आध्यात्मिक एवं ध्यान सत्र को उपयोगी और सकारात्मक अनुभव बताया। प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से मन को शांति मिलती है और व्यस्त दिनचर्या के बीच ऊर्जा एवं उत्साह का संचार होता है।

कार्यक्रम के दौरान आपसी सौहार्द और आत्मीयता का वातावरण देखने को मिला। आयोजन के समापन पर मीडिया कर्मियों के लिए ब्रह्मा भोज का भी आयोजन किया गया।

ब्रह्माकुमारीज़, नोएडा की ओर से कहा गया कि समाज के लिए निरंतर कार्य करने वाले मीडिया कर्मियों के मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए भविष्य में भी इस तरह के सकारात्मक और प्रेरणादायी कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे। कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी मीडिया कर्मियों का आभार व्यक्त किया और आध्यात्मिक शांति, सकारात्मकता एवं आनंद को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया।







Saturday, 8 August 2026

धोबी के घर आए चोर, लूटे गए और! Dhobi ke ghar aye chor loote gaye aur Neelam Bhagi नीलम भागी

 


गीता प्रेस वाले को कपड़े  देती है तो शाम को या रात तक ले लेती है। मैंने उससे पूछा, " क्या प्रेस वाला भैया, तुम्हारे कपड़े लेकर भाग जाएगा! यहां वह रहता है और उसका रोजगार है।" गीता का जवाब बहुत संतोषजनक लगा। उसने एक लोक कथन बोला, " धोबी के घर आए चोर, लूटे गए और" यानी यदि प्रेस वाले के घर में चोरी हो गई तो कपड़े तो औरों के जाएंगे। यह बहुत कड़ी मेहनत से और मुश्किल से परिवार का पालन कर रहा है इसलिए हर्जाना तो देगा नहीं क्योंकि पैसे जो चोरी हो गए हैं। महानगर में धोबी बहुत डिमांड में रहते हैं।  जगह महंगी है। किराया दे नहीं सकते क्योंकि किराया भी बहुत है इसलिए बेरोजगार प्रेस वाला जब शहर में आता है तो वह खाली प्लॉट या जिस जगह मकान में किराएदार रहता है लेकिन लोकेशन अच्छी हो मसलन पार्क और  सड़क के बीच जगह देखकर एक मेज़, प्रेस, कोयला और अपने हुनर के भरोसे, निजी मेहनत से कारोबार शुरू कर देता है और पहले दिन से ही उसका काम शुरू हो जाता है। जिसके घर के आगे होते हैं उसका कपड़ा मुफ्त में किया जाता है। बदले में उनसे पानी आदि मिल जाता है और उसके घर की रखवाली भी हो जाती है। किसी प्रेस वाले को सुविधा की बिजली भी मिल जाती है इसलिए वह दोनों तरह की प्रेस का इस्तेमाल करता है। धूप में बचने के लिए जो आड़ लगाई जाती है, वह बाद में झुग्गी में बदल जाती हैं और आसपास के ब्लॉक को सुख हो जाता है कि पड़ोस में ही कपड़े प्रेस हो जाते हैं। कोई कपड़ा अर्जेंट हो तो वह भी तुरंत प्रेस हो जाता है। कुछ साल पहले मेरे स्कूल में प्रेस वाले के बच्चे पढ़ते थे। पति-पत्नी प्रेस करते थे। किसी ग्राहक के द्वारा पति का मिडिल ईस्ट जाने का, जाकर कमाने का काम बन गया और वह विदेश कमाने चला गया। पत्नी ने पति की जगह काम के लिए किसी को गिनती पर आधे पैसे में रख लिया। धीरे-धीरे उसका खूब काम चल गया। अब वह खुद भी प्रेस नहीं करती औरों को प्रेस करने के लिए रख लिया। आप वह बस हिसाब किताब देखती। किसी का कपड़ा न खो जाए गलत जगह न चला जाए, इसका बहुत ध्यान रखती। 1 साल बाद पति छुट्टी पर आया। उसने पत्नी के काम का फैलाव देखा तो तुरंत पत्नी को गांव वापस भेजने का फैसला किया। वह जब बच्चों की टी.सी लेने आई तो मैंने पूछा, " तुम्हारे बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे हैं क्यों इनका नाम कटवा रही हो? " सुनते ही वह रोने लगी और बोली, "दीदी मैं बहुत अच्छा कमाने लगी हूं और यहां पर जमा हुआ रोजगार है। ठिये की कीमत भी बहुत अच्छी मिल रही है। 1 साल में मेरा काम हो गया है। मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं इसलिए मैंने बच्चों को ट्यूशन वगैरा सब लगा दिया है। सब ठीक-ठाक चल रहा है इन्होंने ठिया का पैसा ले लिया है और ठिया आगे किसी को दे दिया है। हमें गांव में अपने परिवार के संरक्षण में रखकर फिर विदेश जाएंगे।" उसके जाते ही मैं साेच में पड़ गई कि वह यहां भी तो पत्नी के साथ काम करके इस काम को और बढ़ा सकता था।

अगर आपका कपड़ा वापस प्रेस होकर नहीं आया तो यहां प्रेस वाला परवाह नहीं करता है। आप पूछने जाएंगे तो कहेगा किसी के पास गलती से चला गया होगा अगर वह लौटा देगा तो आपको मिल जाएगा। आप अगर गुस्सा करेंगे तो कहेगा। आप आधे पैसे ले लो पर फिर मैं आपका कपड़ा प्रेस नहीं करूंगा। यहां भी बतासों की बात ठीक लगी। उसकी गलती से नुकसान धोबी का नहीं आपका होगा। इनकी एक बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। बच्चों को अपनी समर्थ के अनुसार स्कूल में पढ़ाते हैं। मेरे घर के पास वाला धोबी हमेशा अपने बेटे को कोसता रहता था। इतनी तेरी फीस देता हूं, पढ़ता नहीं है। अब तो नालायक ने स्कूल जाना भी बंद कर दिया है। पर उस नालायक बेटे ने घूमते-फिरते एक नई मल्टी स्टोरी सोसाइटी देख ली। पिताजी ने वहां पर उसको मेज़ लगा दी। काम चल निकला अब पिताजी ने इस ठिए को आगे किसी को देकर कैश हाथ में लिया और नालायक बेटे की मदद करने उसके पास चले गये।

Wednesday, 5 August 2026

दित्या की भाषा Ditya's Language Neelam Bhagi Migration to America अमेरिका प्रवास नीलम भागी

 


मैं जब अमेरिका गई तो दित्या मुझसे हिंदी में बात करती थी। जाने से पहले जब भी मैं वीडियो कॉल करती वह मुझे कहती, "नानी आओ।" मैं उसे जवाब देती कि तू मेरे साथ हिंदी में बात करेगी तो आऊंगी। उत्कर्षनी और राजीव जी उससे हिंदी में बात करते हैं। मेरे वहां जाने पर उसने मेरे साथ हिंदी में ही बात की और हर वक्त मेरे साथ रही सोई भी मेरे साथ थी। उसे डर था मैं भारत न लौट जाऊं। डेढ़ महीने बाद जब मैं लौटी, एयरपोर्ट पर मुझे जाते देखकर वह चीख़ चीख़ के रोने लगी। मेरा मन भी भारी था। मेरे बाजू में बैठकर मुझे छोड़ने आई थी। गाड़ी से उतरते समय मैंने उसे प्यार भी नहीं किया। रोने से डर कर मैं उससे मिली नहीं। उसे बिना देखें एयरपोर्ट चली गई। भारत आने पर जब भी मैं वीडियो कॉल करती। वह हिंदी नहीं बोलती। जब भी मैं कहती, " दित्या हिंदी बोलो। " वह जवाब देती, "मैं भूल गई I forgot." 3 महीने बाद मैं फिर अमेरिका गई। उसने एक भी शब्द मुझसे हिंदी का नहीं बोला। घूमती, फिरती, सोती  मेरे साथ थी। अजीब तरह से गुस्से में भरी रहती। समझदार इतनी कि मुझे नानी कहती है लेकिन अपने स्कूल में, डांस, स्विमिंग, सॉकर क्लास के टीचर और दोस्तों से मेरा परिचय कराते समय कहती, "माय ग्रैंडमा।"  उत्कर्षनी  बताती है ऐसा इसलिए कहती है कि यहां नानी शब्द नहीं होता तो कोई नानी को नैनी न समझें।😃 पर मुझसे नाराजगी  दिखाने का यही तरीका था कि एक शब्द भी हिंदी का न बोलना। केरल का एक परिवार इनका मित्र है। उनका बेटा केलव और दित्या एक ही अस्पताल में एक ही दिन पैदा हुए थे। उत्कर्षनी ने उनसे कहा कि दित्या को पता नहीं क्या हो गया! पिछली बार मम्मी आई थीं यह उनसे हिंदी में बोलती थी 1 मिनट भी आंखों से ओझल नहीं होने देती हैं। इस बार उनके आते ही हिंदी बोलना बंद और गुस्से में रहती है। उन्होंने कहा, " यह उनसे नाराज है। मेरे मम्मी पापा भी जब पहली बार इसको छोड़ कर गए थे। दोबारा आए तो केलव का भी उनसे यही व्यवहार था। जब वह काफी दिन रह लिए फिर यह उनसे नार्मल हो गया। अब इसको यह समझ आ गया कि यह आते जाते रहेंगे। अब सबको तसल्ली हो गई है । एक महीने बाद दित्या मेरे साथ पहले जैसी हो गई। साढ़े चार महीने  रुकी फिर उसको धीरे-धीरे समझाया कि मैं वापस जा रही हूं फिर मैं आऊंगी। उसको समझ आ गया कि जाने के बाद आते भी हैं फिर जाते हैं। दित्या हिंदी में बात करने लगी। जहां उसको शब्दों की कमी होती है। अपनी कोई भाषा बोल देती है। इंग्लिश तो वहां बोलते हैं, स्पेनिश सीख रही है। घर में हिंदी बोली जाती है। इससे हिंदी में पूछे प्रश्न का जवाब सुने 😃   https://www.instagram.com/reel/Dbq5FqPS9_C/?igsh=MXBvd2FzMndybHR6eA==

Saturday, 1 August 2026

झूला तो पड़ गए, आंबुआ की डार पे जी एजी कोई राधा को, गोपाला बिन राधा को... झुलावे झूला कौन!!

 


हमारे विशाल भारत में कहीं न कहीं प्रतिदिन उत्सव है और हिंदू धर्म में उत्सव के बारे में प्रचलित कथाएँ उसे और भी लोकमंगलकारी बना देती हैं। श्रावण मास शुरू है।   सावन में भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। सावन केे पहले सोमवार(3, 10,17,24 अगस्त) से शिवभक्त कांवड लेने जा सकते हैं। फिर हरिद्वार या गोमुख से यात्रा आरम्भ होती है। कंधे पर कांवड़, जिसमें गंगा जल होता है और ये यात्रा कांवड़ यात्रा कहलाती है। जो कांवड़ लेने जाते हैं वे भगवा भेष में होते हैं। कोई शिवजी का गण बना होता है। सजा हुआ कावंड उठाए कांवड़िए का एक ही नाम होता है ’भोला’। इस यात्रा में भोले कंघी, तेल, साबुन का इस्तेमाल नहीं करते हैं। मार्ग में कांवड़ को धरती से नहीं छूना है। कांवड़ शिविर में उसे टांगते हैं और आराम करते हैं। यात्रा में इनके आपस में पारिवारिक संबंध भी बन जाते हैं। जो कांवड़ लेने नहीं जाते वे कांवड़  शिविर में सेवा करने जाते हैं। सावन की शिवरात्री(11 अगस्त)  को शिवजी का श्री गंगाजल से रूद्राभिषेक किया जाता है। सावन के सोमवार को तो शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। तेलंगाना का 1 महीने तक चलने वाला बोनालू मुख्य उत्सव (पुराना शहर और लाल दरवाजा हैदराबाद ) 2 अगस्त को है। बोनालू का समापन 9 अगस्त और सार्वजनिक अवकाश 10 अगस्त को है। इस भव्य उत्सव के दौरान, श्रद्धालु (विशेषकर महिलाएं) पारंपरिक वेशभूषा में सजकर सिर पर बोनम (चावल, गुड़, दूध और दही से भरा कलश) रखकर देवी को अर्पित करते हैं। उत्सव के मुख्य आकर्षणों में पोथुराजु का पारंपरिक नृत्य और भविष्यवाणियों से जुड़ा अनुष्ठान 'रंगम' शामिल हैं। सिंधारा तीज जिसे हरियाली तीज(15 अगस्त) भी कहते हैं। सावन में आने वाले इस त्यौहार में प्रकृति ने हरियाली की चादर ओढ़ी होती है। इस दिन को भोलेनाथ और माता पार्वती के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन की बौछारों में हरे भरे पेड़ो पर झूले पड़ जाते हैं। कहीं कहीं यह उत्सव तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन मायके से सिंधारा में घेवर मिठाई, मेहंदी, चूड़ियां आदि सुहाग की चीजे आतीं हैं। दूसरे दिन हरी हरी मेहंदी हाथ पैरों में लगाई जाती है। अगले दिन सौभाग्यवती महिलाएं पकवान बनाती हैं और हरी पोशाक पहने, श्रृंगार करके माता पार्वती की पूजा करती हैं। सास को बायना देकर उनसे आर्शीवाद लेकर सपरिवार भोजन करती हैं। कहीं कहीं पर इससे पहले दिन से निर्जला वृत रखती हैं। नई बहू को पहले सावन में मैके भेज दिया जाता है। रिवाज़ है कि पहला सावन सास बहू इक्ट्ठे नहीं रहतीं हैं। तीज पर ससुराल से बहू के लिए सिंधारा जाता है। हमारे लोकगीतों में भी हरियाली, सावन के झूले, रिमझिम वर्षा की फुहारों में झूलती गाती सखियां होती हैं। पहले छोटी आयु में बेटियों की शादी हो जाती थी। हरियाली तीज उत्सव से वह पहला सावन पुरानी सखियों के साथ मना जातीं हैं। उस अवसर पर भीषण गर्मी से राहत मिलने के कारण मन खुश रहता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनन्द मनाती हैं। दक्षिण भारत का स्वर्ण गौरी व्रत  मुख्य रूप से कर्नाटक में विवाहित महिलाओं द्वारा देवी गौरी (पार्वती) की पूजा और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाने वाला इस दिन व्रत है।

  नाग को हमारे यहां देवता की तरह पूजा जाता है। नागपंचमी(17 अगस्त) पर इनकी पूजा का विशेष दिन होता है। हमारे पूर्वजों ने इनकी पूजा करके हमें बताया है कि सभी सांप जहरीले नहीं होते हैं। इनको देखते ही मारना नहीं चाहिए। सांपों का मुख्य भोजन चूहे हैं और चूहे अनाज को नष्ट करते हैं। चूहों के मल मूत्र से खतरनाक हन्ता वायरस फैलने का डर रहता है।  

 गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ था। इस वर्ष (19 अगस्त) को उनकी  जयंती है। इनके द्वारा रचित श्री रामचरितमानस और हनुमान चालीसा को घर में रखना शुभ मानते हैं। तुलसी जयंती पर देश भर में संगोष्ठी और सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। श्रावण पुत्रदा एकादशी (24 अगस्त) मनाई जाएगी। यह व्रत संतान प्राप्ति, संतान की सुरक्षा और परिवार की सुख-शांति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित होता है।

 ओणम (26 अगस्त)  केरल का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध फसल उत्सव, जो दस दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। इसमें नौ प्रकार के पारंपरिक व्यंजन (ओणम साड्या), नौका दौड़ (वल्लम कली) और रंग-बिरंगी रंगोलियाँ (पूकक्लम) शामिल हैं। दक्षिण भारत में ओणम केरल का प्राचीन पारंपरिक, धार्मिक, सांस्कृतिक उत्सव हैं, जिसे दुनियाभर में मलयाली समाज मनाता है। 16 अगस्त से शुरु होकर 26  को इसका समापन होगा। केरल में चार दिन की छुट्टी होती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन प्रत्येक वर्ष राजा महाबलि पाताल लोक से धरती पर अपनी प्रजा को आर्शीवाद देने आते हैं और नई फसल आने की खुशी भी होती है। ओणम उत्सव अपनी सांस्कृतिक प्रथाओं में नाव दौड़, नृत्य रुपों, फूलों, रंगीन कला, भोजन और पारंपरिक कपड़ों से लेकर ओनसद्या यानि भोज है, जिसमें केले के पत्ते पर 29 शाकाहारी व्यंजन परोसे जाते हैं। तिरुवोनम, दसवें दिन अपने घरों के प्रवेश द्वार पर आटे के घोल से अल्पना सजाते हैं। नये कपड़े पहनते हैं। ऐसा मानना है कि इस दिन राजा महाबली हर घर जाते हैं और परिवार को आर्शीवाद देते हैं और परिवार दावत के लिए इक्ट्ठा होता है। 

रक्षाबंधन, वर लक्ष्मी व्रत, नारली पूर्णिमा (28 अगस्त)  

वरलक्ष्मी व्रतम्   दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में देवी लक्ष्मी की कृपा और धन-धान्य की प्राप्ति के लिए विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला अत्यंत शुभ व्रत है।

नारली पूर्णिमा महाराष्ट्र, गोआ, केरल, गुजरात सागर तटीय प्रांतों में इसे नारियल पूर्णिमा भी कहते हैं। इसमें वर्षा के देवता वरूण की पूजा करके समुद्र से शांत रहने की प्रार्थना करते हैं और समुद्र को नारियल भेट करते हैं। फिर बहने भाई को रक्षासूत्र बांधतीं हैं। इस दिन से फिर से मछली पकड़ना शुरू किया जाता है। यह

मछुआरों का त्योहार महाराष्ट्र और कोंकण तट के मछुआरा समुदाय द्वारा समुद्र और जल के देवता वरुण को धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है। Q

समुद्र की पूजा इस दिन समुद्र में नौकायन को सुरक्षित बनाने और मौसम के अनुकूल होने की प्रार्थना के साथ समुद्र में नारियल अर्पित किया जाता है। क्योंकि

नारियल को भगवान शिव के तीन नेत्रों का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे प्रसाद के रूप में पूजा में शामिल किया जाता है और त्योहार के दिन नारियल के पकवान (जैसे नारियल चावल) बनाए जाते है।

बहन की सुरक्षा के लिए भाई की प्रतिबद्धता, भाई बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षा बंधन सावन मास की पूर्णिमा को  को मनाया जाता है। रक्षाबंधन के बारे में कई पौराणिक कथाएँ हैं, मसलन भगवान कृष्ण ने जब शिशुपाल का वध किया था तो सुर्दशन चक्र से उनकी अंगुली पर घाव हो गया था। उनकी अंगुली से रक्त बहता देखकर द्रोपदी ने अपनी साड़ी चीर कर उसका टुकड़ा, उनकी अंगुली पर बांधा था। श्री कृष्ण उनके स्नेह से प्रभावित हुए। जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था तो श्रीकृष्ण उसकी रक्षा के लिए पहुँचे। तभी से रक्षा बंधन मनाने की परंपरा है। इतिहास में भी कई कहानियां हैं। रक्षा बंधन मनाने के पीछे हमारे पूर्वजों की बहुत प्यारी सोच है। गांव की बेटी, दूसरे गांव में ब्याही जाती है। उसके सुख दुख की खबर भी रखनी है। माता पिता सदा तो रहते नहीं हैं। उनके बाद भाई बहन की सुध लेता रहे। इस त्यौहार पर भाई के घर बहन आती है या भाई, बहन के घर राखी बंधवाने जाता है। बहन भाई का यह उत्सव परिवारिक मिलन है। इसे देश विदेश में रहने वाले समस्त हिन्दू मनाते हैं। पहले राजपुरोहित राजा को रक्षा सूत्र बांधते थे। राजा धर्म और सत्य की रक्षा का संकल्प लेता था। पारिवारिक उत्सव तो है ही, जो चलता आ रहा है। धार्मिक मान्यताओं के कारण समस्त हिन्दू धर्म का प्रत्येक वर्ग, जाति और वर्ण इसे मनाता है। इस पर्व की उत्पत्ति लोक संस्कृति से हुई, जिसमें पारंपरिक रूप से एक जिम्मेदारी का हिस्सा दिया जाता है। जो रक्त से रिश्तेदार नहीं हैं, वे भी आपस में रक्षासूत्र बांधने से स्वैक्षिक संबंधों की परम्परा के सम्मान के प्रतीक के रूप में बंध जाते हैं।  

   संघ परिवार के साथ परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समस्त हिन्दू समाज में सामजस्य स्थापित करने के लिए इस दिन परम पवित्र भगवा ध्वज पर रक्षा सूत्र बांधकर उस संकल्प का स्मरण करवाया जिसमें कहा गया है कि धर्मों रक्षित रक्षितः अर्थात हम सब मिलकर धर्म की रक्षा करें। समस्त हिन्दू समाज मिलकर, समस्त हिन्दू समाज की रक्षा का संकल्प ले। स्वयंसेवकों ने समस्त हिन्दू धर्म की रक्षा का संकल्प लिया। इस प्रकार इस सुन्दर स्वरूप के साथ रक्षा बंधन, चौथा संघ उत्सव हो गया। रक्षा बंधन, धर्म का बंधन है जो परिवार को बांधता है और परिवारों से राष्ट्र है।

   सबसे श्रेष्ठ संबंध भातृत्व भाव है। इस भावना से स्वयंसेवक किसी भी प्रांत या भाषा के वंचित गरीब परिवारों में जाकर वहाँ रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते हैं। उनके साथ भोजन करते हैं। जो रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र बंध गया तो इन परिवारों के संपर्क में रहते हैं। इस उत्सव के द्वारा समाज के वे वर्ग जो हाशिए पर खड़े थे, वे भी मुख्यधारा में आने लगे हैं। यह व्यक्तिगत  बहन भाई का उत्सव, संघ के प्रयास से धीरे धीरे सभी प्रांतों में सामाजिक स्तर पर मनाया जाने लगा है। अब रक्षाबंधन सामाजिक समरसता का प्रतीक है। स्वयंसेवक रक्षासूत्र बांधते समय और बंधवाते समय कभी गरीबी, अमीरी, जाति, प्रांतीयता का मन में भाव नहीं लाते। उड़ीसा में किसान मवेशियों को भी रक्षा सूत्र बांधते हैं क्योंकि इस दिन खेती के देवता बलभद्र का जन्मदिन है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में कजरी पूर्णिमा है तो पंजाब हरियाणा में इसे सलोनो कह कर मनाया जाता है। झारखंड, उत्तराखंड में तो श्रावणी मेला लगता है। देवघर जाने पर मैंने देखा वहाँ तो भगवा के सिवाय कोई रंग ही नज़्ार नहीं आ रहा था।  अब कुछ और भी परिवर्तन होने लगे हैं। आजकल दो बच्चों का, देश विदेश में नौकरी के कारण एकल परिवार है। कहीं दो बहनें हैं तो कहीं दो भाई हैं। त्यौहार भारतीय संस्कृति की आधारशिला हैं। वो तो मनाया जायेगा ही इसलिए बहन बहन को, और भाई भाई को राखी बांधता है  और मिलकर पकवान बनाते हैं। इसमें हम पर्यावरण को भी नहीं भूलें हैं इसलिए पेड़ों की रक्षा के लिए उन्हें भी राखी बांधने लगे हैं। 

कजरी तीज सोमवार, 31 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 30 अगस्त की सुबह 09:36 बजे शुरू होकर 31 अगस्त की सुबह 08:50 बजे तक रहेगी। यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और पारिवारिक समृद्धि के लिए रखा जाता है

  हिंदू धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता है, सबके योग्य नियमों की लचीली व्यवस्था भी करता है। महानगरों की कामकाजी महिलाएं अपनी व्यवस्थता के कारण और छुट्टी न होने से परिवार में नहीं जा पातीं लेकिन घर में उत्सव जरुर मनाती हैं। जहां तीज महोत्सव का आयोजन किया जाता है, वहां पहुंच कर सखियों से मिलन भी हो जाता है। हरियाली धरती का सौन्दर्य है। उसी से हम सबका जीवन संभव है। और हमारा कर्त्तव्य है कि इसकी हरियाली को बनाये रखें।

पेड़ लगाए और जल संचयन करें।

नीलम भागी ( पत्रकार, लेखिका, ब्लॉगर, ट्रैवलर )

 प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के अगस्त अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है









Sunday, 26 July 2026

कारगिल विजय दिवस पर भारतीय सशस्त्र बलों को समर्पित विशाल रक्तदान महोत्सव A massive blood donation festival dedicated to the Indian Armed Forces on Kargil Vijay Diwas.

 


लक्ष्मी नारायण मंदिर, ए-2, सेक्टर-56, नोएडा   द्वारा मंदिर प्रांगण में  कारगिल विजय दिवस पर भारतीय सशस्त्र बलों को समर्पित विशाल रक्तदान महोत्सव आज 26 जुलाई (रविवार) को कारगिल के अमर वीरों को रक्तदान के माध्यम से सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

रक्त संग्रह के लिए भारतीय सेना की टीम स्वयं उपस्थित रही।

शिविर को रक्तदान करने  166  दाता आए,                   

25 लोगों को फिर आने के लिए कहा गया और 141 रक्त यूनिट प्राप्त हुए और यह हमारे  लिए एक गर्व की बात है।

इस बार कुछ पत्रकार बन्धुओं ने स्वयं भी रक्तदान करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रक्तदान के साथ साथ एम्स न्यू दिल्ली की टीम ने नेत्र दान व अंग दान का आयोजन भी किया जिसमें  20 दाताओं ने नेत्र और अंगदान का संकल्प लिया।

दाताओं को प्रोत्साहित करने के लिए  कई गर्णमान्य व्यक्तियों  ने जिनमें प्रमुख थे, विपिन मल्हन, प्रधान  व वी के सेठ, महासचिव- एनईए व एन ई ए की टीम, दीपक विग चेयरमैन व संजीव पुरी, वाईस चेयरमैन - पंजाबी विकास मंच  व  उनकी टीम, के के जैन महा सचिव फ़ोनरवा व उनकी टीम, संजय  मावी, प्रधान- आर डवल्लू ए- 56 व उनकी टीम,  हरीश जुगरान प्रधान नया बाँस सोसाइटी व उनकी टीम ने आकर  सब दाताओं उत्साहवर्धन किया।

आज मंदिर समिति ने मंदिर के लिए 10 किलोवाट का सोलर सिस्टम उपलब्ध करवाने में सहयोग देने के लिए नया बांस सोसाइटी के प्रधान हरीश जुगरान व मंदिर की अन्नपूर्णा रसोई में चिमनी की व्यवस्था में सहयोग देने के लिए मंदिर महिला मंडल की सदस्य विनोद कुमारी बंसल जी को भी इस अभूतपूर्व सहयोग के लिए आभार प्रकट करते हुए माननीय विपिन मल्हन व मंदिर समिति के प्रधान आर एन गुप्ता जी द्वारा सम्मानित किया गया।

आयोजक हृदयपूर्वक सभी दाताओं, आर्मी के ब्लड बैंक व एम्स न्यू दिल्ली की टीमों का आभार व्यक्त करते हैं।

आयोजक निष्ठा से सभी स्वयंसेवकों, नकद एवं वस्तुओं के स्वरूप में दान देनेवाले दाताओं का हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।

लगभग 10 सदस्यों वाली  ब्लड डोनेशन टीम ने इस कार्य का संचालन मन्दिर समिति के सदस्य और इस प्रोजेक्ट के मुख्य प्रेरक ए.के. गुप्ता के नेतृत्व में किया।

 आयोजकों में  मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारी आर.एन. गुप्ता, ओ पी गोयल, जे एम सेठ,  जी.के. बंसल, आर के भट्ट, इंदर पाल खंडपुर, हरीश सभरवाल, अंबेश भांबरी, संजीव बांधा ,ब्लड डोनेशन टीम के डा॰ कर्नल योगेश मानिकतला,करण अनेजा, अभिषेक जैन, सुशील रियू, नितिन गुप्ता, अशोक त्यागी, निर्मल हांडा,मंजू सेठ,मधु भट्ट , वंदना बंसल, आदि सबने इस नेक काम में योगदान  करने के लिए प्रेरित किया।

लक्ष्मी नारायण मंदिर की ओर से,

जे. एम. सेठ

प्रबंध ट्रस्टी,

https://www.instagram.com/reel/DbQm5lCg8wq/?igsh=MXEyM2tta3ViejFydA==










Wednesday, 22 July 2026

समाज के ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित 'दहकते अंगारे' पुस्तक का भव्य विमोचन Grand launch of the book 'Dahakte Angare', focused on burning social issues.

 


वरिष्ठ पत्रकार सुरेश चौरसिया की कृति समाज के ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित 'दहकते अंगारे' पुस्तक का  भव्य विमोचन


 नोएडा के सेक्टर 6 स्थित एनईए भवन के ऑडिटोरियम में  वरिष्ठ पत्रकार सुरेश चौरसिया की कृति समाज के ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित 'दहकते अंगारे' पुस्तक का भव्य विमोचन संपन्न हुआ।

पत्रकारिता जगत में अपनी बेबाक लेखनी और तीखे तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले श्री चौरसिया की यह पुस्तक समाज के अनछुए पहलुओं और समकालीन ज्वलंत मुद्दों को उजागर करती है।

विमोचन समारोह में नोएडा की कई प्रतिष्ठित हस्तियां, प्रबुद्धजन एवं साहित्यकार और कवि उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान साहित्य, समाज और पत्रकारिता की दशा-दिशा पर सार्थक चर्चा भी हुई।

इस मौके पर ठाकुर एनपी सिंह, स्वामी पद्मनारायनाचार्य ,  पीठाधीश्वर हनुमंत कृपाधाम, वृंदावन, शालिनी सिंह अध्यक्ष नोएडा सिटीजन फोरम, विपिन मल्हन अध्यक्ष एनईए, आलोक द्विवेदी अध्यक्ष नोएडा मीडिया सेंटर , अशोक चौहान, भाजपा नेता , यू एस शर्मा, कपिल शर्मा की गौरवमयी उपस्थित और उनके उच्च कोटि के विचारों ने बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोताओं के मन को मोह लिया। मंच का संचालन हास्य व्यंग्यकार शशि पांडेय ने बड़ी खूबसूरत अंदाज़ में किया।

इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि

'दहकते अंगारे' निश्चित रूप से पाठकों में नई चेतना जगाने का काम करेगी।

कार्यक्रम के अंत में सुरेश चौरसिया  को इस अभूतपूर्व कृति के लिए शुभकामनाएं दी गईं।

साथ ही कार्यक्रम के उतरार्द्ध में सभी प्रतिष्ठित अतिथियों व शहर के प्रतिष्ठित लोगों को मोमेंटों देकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर एक भव्य कवि सम्मेलन संपन्न हुआ। इस कवि सम्मेलन में वरिष्ठ कवि साहित्य कुमार चंचल 'साधक' कवयित्री किरण सिंह, अंजली करण ' सरधना ' रजनीश त्यागी ( पूर्व एनएसजी कमांडो) ने अपनी उम्दा कविताओं, गजलों के माध्यम से श्रोताओं का दिल जीत लिया।

इस मौके पर शहर के बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

कार्यक्रम को सफल बनाने में बीनू शर्मा, प्रवीण पांडे, पवन राज सिंह , अनीश अहमद का बड़ा योगदान रहा।

Tuesday, 21 July 2026

पॉपी रिजर्व - "नारंगी कालीन" Poppy Reserve – "Orange Carpet": The Antelope Valley California Poppy Reserve. Neelam Bhagi Migration to America नीलम भागी अमेरिका प्रवास

 


पूरी घाटी नारंगी, पीली और बैंगनी फूलों से ढक जाती है।यहां सिर्फ हवा और मधुमक्खियों की भिनभिनाहट की आवाज सुनाई देती है। शहर का शोर बिल्कुल नहीं है।

रास्ते में बोनस नजारे हैं। उत्कर्षनी ने बताया था कि सूरज ढलते वक्त पहाड़ियों पर सुनहरी रोशनी और लाखों पॉपी हवा में लहराती हैं। यह फोटो के लिए बेस्ट टाइम होता है। I-5 पर उत्तर जाते वक्त सामने विशाल गहरा नीला आसमान है। रात में बादल न हों तो Milky Way भी दिखती है। हम शाम होने से पहले ही यहां से चल पड़े क्योंकि गीता और दित्या फूल देखकर बहुत खुश थीं और इधर-उधर मैदान में भाग रही थीं क्योंकि यहाँ के खेतों में रैटलस्नेक (Rattlesnakes) पाए जाते हैं, इसलिए पर्यटकों को सावधानी बरतने और पगडंडियों (trails) पर ही रहने की सलाह दी जाती है। बच्चों को शायद स्कूल में सिखाया जाता है कोई भी बच्चा फूल नहीं तोड़ रहा था। पर यह दोनों शैतान तितलियों के पीछे भाग रही थीं। फूलों पर शहद की मक्खियाँ भी खूब थीं इसलिए राजीव जी ने इतनी सुंदर जगह से जल्दी दूसरी जगह जाने का प्रोग्राम बना लिया। यहां शहद भी बिक रहा था। कुछ फ्लाइज हमारी गाड़ी में भी आ गई। इसलिए दित्या का ध्यान बट गया। फ्लाइज हमने बाहर निकाले फ़िर भी एक दो गाड़ी में रह गई। दित्या का टॉपिक बदल गया। अब उसे चिंता सताने लगी कि यह तो हमारे साथ जा रही है। उनकी मम्मी इनको ढूंढेंगी 😃।

यह संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के उत्तरी लॉस एंजिल्स काउंटी में स्थित एक संरक्षित प्राकृतिक अभयारण्य है। कैलिफोर्निया का राज्य पुष्प, 'पॉपी' (Poppy), प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में खिलता है।

पॉपी के अलावा यहाँ उल्लू का तिपतिया घास (Owl’s Clover), ल्यूपिन, और गोल्डफील्ड्स जैसे अन्य जंगली फूल भी पाए जाते हैं।

यह रिजर्व समुद्र तल से लगभग 2,600 से 3,000 फीट की ऊंचाई पर मोजावे रेगिस्तान (Mojave Desert) जलवायु क्षेत्र में स्थित है। राज्य के कानून के अनुसार यहाँ से जंगली फूल तोड़ना अवैध है।

यहाँ कुत्तों या अन्य पालतू जानवरों को लाने की अनुमति नहीं है (केवल प्रशिक्षित सर्विस जानवरों को छोड़कर)।

नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं।

   क्रमशः

 https://www.instagram.com/reel/DbBqmlsS1Ar/?igsh=MXRpdzd0eHE1NGc1eg==

https://www.instagram.com/reel/Da-8MITSGlq/?igsh=MTRvY3N0aXltbHhxOQ==

  https://www.instagram.com/reel/Da5Y038A7zq/?igsh=MTNuNG5wemh1YWcxNw==

https://www.instagram.com/reel/Da0p1mmyC92/?igsh=MWh4a3UxNGJhdTQwMQ==