Search This Blog

Showing posts with label #Bihu. Show all posts
Showing posts with label #Bihu. Show all posts

Thursday, 2 April 2026

धर्म, समाज, परिवार और प्रकृति से जोड़ते अप्रैल के पर्व और उत्सवApril's festivals and celebrations connect religion, society, family and Nature Neelam Bhagi

 


पंगुनी उथिरम प्रमुख तमिल त्योहार 1 अप्रैल  को मनाया । यह तमिल महीने पंगुनी की पूर्णिमा को पड़ता है, जब उथिरम नक्षत्र संरेखित होता है। यह दक्षिण भारत, विशेषकर मुरुगन मंदिरों में भगवान मुरुगन और देवयानी के दिव्य विवाह के रूप में बहुत उत्साह से मनाया जाता है। इसलिए इसे "दिव्य मिलन" का दिन माना जाता है।सुबह विशेष पूजा और अभिषेक होता है, जिसके बाद "थिरुकल्याणा उत्सव" (दिव्य विवाह समारोह) और शाम को स्वामी की शोभायात्रा निकाली जाती है। कभी मौसम भी महोत्सव की तारीख तय करता है!! मसलन  श्रीनगर का टयूलिप महोत्सव(1 से 30 अप्रैल) जब टयूलिप की कलियाँ खिलने को तैयार होती हैं तब यह उत्सव पंद्रह दिन से एक महीने तक मनाया जाता है। हर वर्ष मौसम इस महोत्सव की तारीखें तय करता है पर होता अप्रैल में ही है। प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सवों में 30वां श्री पण्डोखर धाम महा-महोत्सव शामिल है, जो 2 से 22 अप्रैल तक चलेगा।

उत्तर पूर्व भारत के नागालैंड के मोन जिले में आओलिंग महोत्सव(1 से 6 अप्रैल या 2 से 7 अप्रैल) कोन्याक जनजातियों का पर्व है। ये अपना अधिकतर समय खेती करने और शिकार करने में बिताते हैं। हर साल वसंत को चिहिंत करने के लिए यह त्योहार मनाते हैं। हनुमान जन्मोत्सव  (2 अप्रैल) को मंदिरों में सुदंरकाण्ड का पाठ और भण्डारे आयोजित किए जाते हैं। संकटमोचन संगीत महोत्सव यह वार्षिक संगीत महोत्सव हनुमान जयंती के अवसर पर वाराणसी के घाट पर आयोजित किया जाता है। भारत के सबसे प्रतिष्ठित इस महोत्सव में देश के लोकप्रिय शास्त्रीय संगीतकारों को सुनने का आनन्द मिलता है। 

मोपिन महोत्सव(5 से 7अप्रैल) अरूणाचल प्रदेश का आनन्दायक उत्सव है। यह फसल उत्सव एलॉन्ग, बसर और बामे के लोगों द्वारा मनाया जाने वाला उत्सव है। उस समय यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य बहुत मनमोहक होता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस उत्सव द्वारा बुरी आत्माओं को दूर रखा जाता है।  

13 अप्रैल 1699 को श्री केसरगढ़ साहिब आनन्दपुर में दसवें गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी इसलिए सभी गुरुद्वारों में वैसाखी समारोह मनाया जाता है। मुख्य समारोह आनन्दपुर साहिब में होता है। लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में संडे 5 अप्रैल को सिख कम्युनिटी ऑफ़ साउथर्न कैलिफोर्निया द्वारा बैसाखी उत्सव  लॉस एंजेलिस कन्वेंशन सेंटर में मनाया जाएगा। उत्कर्षनी राजीव जी ने कहा कि इस बार मैं भी उनके साथ बैसाखी समारोह में रहूंगी। वरुथिनी एकादशी(13 अप्रैल) के दिन भगवान श्री हरिहर विष्णु की पूजा की जाती है। ऐसा मानना है कि कुरूक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय जो एक मन सोना दान करके पुण्य मिलता है, वही पुण्य इस दिन व्रत करने से मिलता है। श्री वल्लभाचार्य जयंती इस वर्ष उनका 547वां जन्मदिन है। वाराणसी में तेलगु ब्राह्मण परिवार में जन्में महापुरूष के लिए प्रचलित मान्यता है कि भगवान कृष्ण श्रीनाथ जी के रूप में इनके सामने प्रकट हुए थे।

वैसाखी उत्सव फसल कटाई समय को दर्शाता है और ऐसा माना जाता है कि गंगा नदी वैसाखी को धरती पर अवतरित हुई थी इसलिए इस दिन गंगा स्नान का महत्व है जो नहीं पहुंच सकते, वे अपने आस पास बहने वाली नदी पर जाते हैं। पंजाब में वैसाखी के दिन नदियों के पास ही मेले लगते हैं। सुबह सपरिवार जो भी पास में नदी या बही होती है, वहाँ स्नान करते हैं। लौटते हुए जलेबी और अंदरसे खाते हैं। लोटे में नदी का जल, गेहूँ की पाँच छिंटा(बालियोंवाली डंडियां) घर लाकर उस पर कलेवा बांध कर मुख्य द्वार से लटका दिया जाता है और नदी के जल को पूजा की जगह रख दिया जाता है। स्कूलों में भी बाडियां( गेहूं की कटाई) की छुट्टियां हो जाती हैं। फिर सपरिवार कटाई में लग जाते हैं। इन दिनों जो नौकरी पेशा सदस्य दूसरे शहरों में रहते हैं। वे भी पैतृक घरों में जाकर बाडियां में मदद करते हैं।  कटाई के बाद बैसाखी के दिन  लाये उस नदी के जल को खाली खेत में छिड़क दिया जाता है।

पूर्वोतर भारत का मुख्य रोजगार चाय बगान है। किसी के पास कोई भी हुनर नहीं है तो भी उसके लिए रोजगार है, चाय की पत्ती तोडने का। हथकरघे का काम तो प्रत्येक घर में होता ही है। लोग बहुत र्कमठ हैं। महिलाएं कुछ ज्यादा ही मेहनती हैं, खेती के साथ कपड़ा भी बुनती हैं। इतनी मेहनत के बाद, त्यौहारों को बहुत उत्साह से मनाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बैसाख यानि अप्रैल में मनाया जाने बिहु उत्सव है। इस समय बसन्त के कारण प्राकृतिक सौन्दर्य चारों ओर होता है। इसे रोंगाली बिहु या बोहाग बिहू(14 से 20 अप्रैल) भी कहते हैं। एक महीना रात भर किसी न किसी के घर बीहू नृत्य गाना होता है। जो अपने घर करवाता है। वह सबका खाना पीना, बकरी ,सूअर का मांस पकाता है और हाज (चावल की बीयर) आदि का बन्दोबस्त करता है। इसे सम्मान सेवा कहते हैं। मूंगा सिल्क जिसे दुनिया में गोल्डन सिल्क ऑफ आसाम कहते हैं, विश्व में और कहीं और नहीं होता। पुरूष गमझा गले में डालते हैं । मेखला चादर तो बहुत ही खूबसूरत पोशाक है, उसे नृत्य के समय पहनते हैं। सब रेशम का होता है। बिहु की विशेषता है इसे सब मनाते हैं कोई जाति, वर्ग, धनी निर्धन का भेद भाव नहीं होता। 

शाद सुक मिंसिएम उत्सव(14 अप्रैल) मेघालय का लोकप्रिय त्योहार है। जैसे भारत के अधिकतर हिस्सों में फसल कटाई की खुशी के पर्व हैं। उसी तरह खासी पुरूष और महिलाएं भी रेशमी कपड़ों में और गहनों से सजकर, पुरूष रेशमी धोती, बास्केट, पंख लगी पगड़ी और पारंपरिक आभूषण पहन कर साथ साथ नाचते हैं। इसे थैंक्सगिविंग फैस्टिवल के नाम से भी जाना जाता है।

 उत्तराखण्ड में बिखोती उत्सव मनाया जाता है जिसमें पवित्र नदी में स्नान करके राक्षस को पत्थर मारने की प्रथा है। 

यूनेस्को द्वारा 2016 में मानवता की सांस्कृतिक विरासत के रुप में दर्ज, पाहेला वैशाख(14 या 15 अप्रैल ) बंगाल, त्रिपुरा, बांगलादेश में उत्सव पर मंगल शोभा जात्रा का आयोजन होता है। झारखण्ड के आदिवासी, समुदाय के साथ सरहुल मनाते हैं और सरना देवी की पूजा करते हैं। उसके बाद से नया धान, फल, फूल खाते हैं और बीज बोया जाता है। यह माँ प्रकृति की पूजा और वसंत उत्सव है जो प्रजनन का भी संकेत देता है और शादी विवाह की शुरूआत होती है। जुरशीतल भारत और नेपाल क्षेत्र में मैथिलों द्वारा मनाया जाता है। मैथिल नववर्ष को जुरशीतल के उत्सव 14 अप्रैल को मिथिला दिवस का अवकाश रहता है। मैथिल इस दिन भात और बारी(बेसन की सरसों के तेल में छनी) और गुड़ वाली पूरी बनाते हैं। पाना संक्राति, महा बिशुबा संक्राति, उड़िया नुआ बरसा, उड़िया नया साल का सामाजिक, सांस्कृतिक धार्मिक उत्सव है। इस समारोह का मुख्य आर्कषण मेरु जात्रा, झामु जात्रा और चाडक पर्व है। कहीं कहीं पर छाऊ नृत्य, लोक शास्त्रीय नृत्य समारोह होता है। अंगारों पर भी चलते हैं। 

 तमिल नववर्ष को पुथांडु उत्सव कहते हैं। तमिल महीने चितराई के पहले दिन पुथांडु, तमिल नाडु, पांडीचेरी, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, मारीशियस में और विश्व में जहां भी तमिलियन हैं, मनाया जाता है। यह आमतौर पर 14 अप्रैल को पड़ता है। इस दिन को तमिल नववर्ष या पुथुवरुशम के नाम से भी जाना जाता है। यह त्यौहार परिवार के सभी लोग एक साथ मिलकर मनाते हैं। घर की सफाई, फूलों और लाइटों से सजावट करके, र्हबल स्नान कर, नये कपड़े पहन कर मंदिर जाते हैं। घरों में शाकाहारी भोजन वडा, पायसम, खासतौर पर ’मैंगो पचड़ी’ बनाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि इस दिन देवी मीनाक्षी ने भगवान सुन्दरेश्वर से विवाह किया था। चिथिराई महोत्सव, एक महीने 14,15  अप्रैल से  मदुरै तमिलनाडु,  मदुरै के प्रसिद्ध मंदिर में भगवान सुंदरेश्वर के साथ देवी मीनाक्षी के विवाह के उपलक्ष में मनाया जाता है। जोड़े की मूर्तियों को सजाए गए रथ में शहर के चारों ओर ले जाया जाता है। जिसका लोग बड़े उत्साह से स्वागत करते हैं। इस अवसर पर व्यापार प्रदर्शनी, मेले आयोजित किए जाते हैं।

केरल के कोल्लम में प्रसिद्ध कोल्लम पूरम उत्सव का आयोजन 15 अप्रैल को होने की संभावना है। यह केरल की संस्कृति का एक प्रमुख उत्सव है जो भव्य जुलूसों, पारंपरिक संगीत (पंचवाद्यम), और सजे हुए हाथियों के साथ मनाया जाता है, जो इस क्षेत्र का एक प्रमुख आकर्षण है। रंग-बिरंगे पारंपरिक पोशाक में नृत्य, अनुष्ठान और स्थानीय खाद्य पदार्थ।

ऊटी का मरियम्मन मंदिर उत्सव आमतौर पर हर साल अप्रैल महीने में मनाया जाता है।  2026 के लिए विशिष्ट तिथियों की आधिकारिक घोषणा अभी लंबित है, लेकिन परंपरा के अनुसार यह मध्य अप्रैल 2026 के दौरान होने की उम्मीद है। 

इस उत्सव में देवी मरियम्मन की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है और भक्त अपनी मन्नतें पूरी करने के लिए विभिन्न अनुष्ठान करते हैं। ऊटी मरियम्मन मंदिर, नीलगिरी। कन्नूर (केरल) में मरियम्मन मंदिरों (जैसे धर्मडम श्री मरियम्मन मंदिर) में अक्सर थेय्यम का आयोजन होता है। अप्रैल पेनकुनी उत्सव यह तिरुवनंतपुरम में 24 मार्च से 2 अप्रैल तक चल रहा है । तमिलनाडु के अन्य क्षेत्रों में मरियम्मन उत्सवों की कुछ तिथियाँ घोषित हो चुकी हैं, जैसे ओझुगईमंगलम में 5 अप्रैल से 12 अप्रैल तक रथ उत्सव मनाया जाएगा। 

केरल का नववर्ष मलियाली महीने मेदान के पहले दिन विशु मनाया जाता है। आसपास के राज्यों के कुछ हिस्सों में भी मनाया जाता है। 14 या 15 अप्रैल को परिवार के साथ मनाते हैं। यह पर्व भगवान विष्णु और उनके अवतार कृष्ण को समर्पित है। इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। पिछली फसल के लिए भगवान का धन्यवाद किया जाता है और धान की बुआई की जाती है। परिवार के बुजुर्ग विशुकानी(विष्णु की झांकी) सजाते हैं। सुबह बच्चों की आंखो को ढक कर परिवार का बड़ा, बच्चे को विशुकानी के सामने लाकर आंखों सेे हाथ हटा लेता है। अर्थात सुबह सबसे पहले भगवान के दर्शन करते हैं। बुजुर्ग बच्चों को विषुक्कणी(भेंट या रूपए) देते हैं। मंदिर जाते हैं। विषु भोजन करते हैं जिसमें 26 प्रकार का शाकाहारी भोजन होता है। इतने प्यारे फसलों के त्यौहार, जिसमें सुस्वादु भोजन बनते हैं, नौकरी के कारण परिवार से दूूर गए सदस्यों को भी अति व्यस्त होने पर भी, कुटुंब में आने को मजबूर करते हैं। कदम्मनिता पदयानी(14 से 23 अप्रैल) यह त्यौहार केरल में राज्य की समृद्ध संस्कृति, कौशल, सजावट, परंपराओं और रंग का शानदार प्रर्दशन है। इसलिए इन दिनों बहुत से कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 

 भारतीय संविधान के पिता, भारत के महान व्यक्तित्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर का जन्मदिन 14 अप्रैल को धूमधाम से मनाया जाता है। कोल्लम पूरम, कोल्लम(15 अप्रैल) उत्सव की शुरुआत 'चूटु वैपू' अनुष्ठान से होती है, जिसमें मंदिर के पवित्र दीपक से आग जलाई जाती है और पारंपरिक 'थप्पु' वाद्ययंत्र बजाया जाता है। कोल्लम के आश्रमम मैदान में एक सप्ताह तक चलने वाले इस उत्सव के दौरान मंदिर की मूर्ति को एक भव्य पालकी पर ले जाया जाता है। जिसके पीछे भक्त अनुष्ठान करते हैं। नर्तक और संगीतकार अपनी कला के द्वारा श्रद्वांजलि देते हैं। सजे हुए हाथी इसे सबसे लोकप्रिय उत्सव बनाते हैं। इस उत्सव में स्थानीय प्रर्दशन, अनुष्ठान, भोजन केरल के असली रंग से परिचित कराता है।  परशुराम जयंती 19 अप्रैल महर्षि के सम्मान में इस दिन को उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति करने के लिए, जीवन की सुखसुविधाओं का त्याग करने के तरीके के रूप में मनाया जाता है। इसको अक्षय तृतीया भी कहा जाता है, जो नए प्रयास शुरू करने, व्यवसाय शरू करने, सोना खरीदने के लिए यह दिन बहुत शुभ होता है। इस दिन बिना महूर्त के कोई भी शुभ कार्य कर लेते हैं। मसलन खूब शादियाँ होतीं हैं। इसे हिंदू और जैन दोनों मनाते हैं। बसव जयंती(20 अप्रैल) लिंगायतों द्वारा पारंपरिक रूप से मनाई जाने वाली बसवन्ना की जयंती है जो 12वीं सदी के हिंदू कन्नड़ कवि और दार्शनिक शिव के अनुयायी थे। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना में मनाया जाता है। कर्नाटक और महाराष्ट्र में सरकारी अवकाश होता है। उत्सव बसवेश्वर मंदिरों में मनाया जाता है। मातंगी जयंती देवी मातंगी को दस महाविद्या में नवीं महाविद्या के रूप में पूजते हैं। इनके पूजन से वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। इस दिन कन्या पूजन भी किया जाता है।

 गरिया पूजा(21 अप्रैल) त्रिपुरा में सात दिन तक चलने वाला यह उत्सव है। इसमें गरिया देवता की पूजा होती है जो पशुधन और धन की रक्षा करते हैं। इस दौरान भगवान गरिया को प्रसन्न करने के लिए बच्चे ढोल बजा कर नाचते गाते हैं। अंतिम दिन सरकारी अवकाश होता है। यह त्यौहार समृद्धि और कल्याण के देवता भगवान गरिया को समर्पित है, जो पारंपरिक रूप से वैशाख महीने के सातवें दिन शुरू होता है। शंकराचार्य जयंती, महान संत प्रसिद्ध दार्शनिक, आदिशंकराचार्य का जन्म केरल के कलाडी क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने अद्वैत वेदांत दर्शन के सिद्धांत पर चलकर, हिंदू संस्कृति को तब बचाया, जब हिंदू संस्कृति को संजोय रखने की ज़रूरत थी। रामानुज जयंती, रामानुजाचार्य प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय थे। इन्होंने उपनिषदों, ब्रह्म सूत्रों के दर्शन को मिश्रित किया और भक्ति परंपरा को एक मजबूत बौद्धिक आधार दिया। 

  22 अप्रैल को पर्यावरण सुरक्षा के सर्मथन में विश्व पृथ्वी मनाते हैं।  गंगा सप्तमी का त्योहार 23 अप्रैल  को गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण के उपलक्ष्य में मनाया मनाया जाएगा। इस दिन गंगा स्नान और पूजा करना बेहद पवित्र माना जाता है। बगुलामुखी जयंती(24 अप्रैल) इन्हें मां पीताम्बरा या ब्रह्मास्त्र विद्या, आठवीं महाविद्या भी कहा जाता है। देवी की पीली पोशाक और पीला श्रंृगार होता है। तांत्रिक लोग इन्हें बहुत मानते हैं। पीताम्बरा पीठ, दतिया मध्य प्रदेश में और हिमाचल के बगुलामुखी मंदिर में मेला लगता है। सीता नवमी (जानकी जयंती 25 अप्रैल) को मनाई जाएगी। यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पड़ती है, जो माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र त्यौहार है। 30 अप्रैल को नरसिंह जयंती, छिन्नमस्ता जयंती मनाई जायेगी। फसल उत्सव, प्रेरणास्रोत महापुरुषों का जन्मदिन, पशुधन और पर्यावरण संरक्षण को विशेष दिनों में मनाना हमारे जीवन को खुशहाल बनाता है।

नीलम भागी

जर्नलिस्ट, लेखिका, ब्लॉगर, ट्रैवलर

 प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा द्वारा प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के अप्रैल अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है।




Saturday, 3 January 2026

क़ृषि चक्र, मेलों, क्षत्रिये संस्कृतियों, स्थानीय जनजातियों से जुड़े January त्यौहारFestivals associated with the agricultural cycle, regional cultures, local tribes Neelam Bhagi, नीलम भागी

 माघ मेले  की आपको हार्दिक शुभकामनायें। यह लेख प्रेरणा शोध संस्थान से प्रकाशित प्रेरणा विचार पात्रिका के जनवरी अंक में प्रकाशित हुआ है।







Friday, 3 January 2025

अध्यात्म, कला के साधकों, सांस्कृतिक गतिविधियों का जनवरी नीलम भागी

संगीत में आत्मा को सुकून देने की क्षमता होती है। इसलिए लोगों को संगीत के प्रति जागरूक करने के लिए हिन्दू धर्म में संगीत महोत्सवों का आयोजन किया जाता है। सबसे बड़ा वार्षिक सांस्कृतिक संगीत कार्यक्रम मद्रास संगीत महोत्सव एक महीने तक चल कर 15 जनवरी को समापन होगा। इस महोत्सव के दौरान पूरे चेननई में पारंपरिक नृत्य, दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत और संगीत से जुड़े कई सेमिनार, प्रदर्शन और चर्चाएं होतीं हैं। इनकी संख्या 1000 से ज्यादा होती है। 3 से 9 जनवरी तक मद्रास एकादमी, मद्रास द्वारा 18 वां नृत्य महोत्सव का आयोजन है।  

गुरू गोविंद सिंह जयंती(6 जनवरी) सिख धर्म के दसवें और अंतिम गुरू गोविंद सिंह जी का जन्मोत्सव दुनिया भर के गुरूद्वारों में मनाया जाता है।

गंगा सागर मेला ’’सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार’’ मकर संक्राति (14 जनवरी) को गंगा जी जहाँ सागर (बंगाल की खाड़ी) में विलीन होती हैं, वहीं उनके सागर में समाने से पहले, वहाँ गंगा जी में पवित्र डुबकी लगाने के लिए तीर्थयात्री देश विदेश से गंगासागर पहुँचते हैं। यहाँ 8 जनवरी से 16 जनवरी को लगने वाले मेले को गंगा सागर मेला कहते हैं। लेकिन डुबकी मकर संक्राति को ही लगाई जाती है।

 बीकानेर ऊँट महोत्सव(11 से 12 जनवरी) इसकी शुरूवात जूनागढ़ किले के परिसर से ऊँटों के एक रंगीन जुलूस से होती है। राष्ट्रीय युवा महोत्सव पर 12 जनवरी( स्वामी विवेकानन्द के जन्मदिवस ) को आयोजित किया जा रहा है। जिसमें स्वामी विवेकानन्द जो युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं उनके विचारों और दर्शन को अपनाने के लिए युवाओं को प्रोत्साहित किया जाता है। 

अंतर्राष्ट्रीय पतंग महोत्सव(11 -14 जनवरी) साबरमती रिवरफ्रंट अहमदाबाद में पतंगबाज पहुंचेंगे। और देशभर में मसलन अमृतसर में छोटी पतंग को गुड्डी कहते हैं और बड़ी पतंग को गुड्डा कहते हैं। यहां लोहड़ी को पतंगबाजी देखने लायक होती है। इस दिन छुट्टी होती है। बाजार बंद रहते हैं। आसमान गुड्डे, गुड़ियों से भर जाता है। छतों पर माइक लगा कर कमैंट्री चलती है। मसलन लाल गुड्डी दा चिट्टे गुड़डे नाल पेंचा लड़दा पेया। लाल गुड्डी आई बो।(लाल और सफेद पतंग का पेच लड़ रहा है। लाल पतंग कट गई)। आई बो के साथ ही शोर मचता है। घरवालों को पतंगाजों खाने पीने की चिंता है तो छत पर पहुंचा दो, ये खा लेंगे, वरना भूखे मुकाबला करते रहेंगे। लेकिन मोर्चा छोड़ कर नहीं जायेंगे, वहीं डटे रहेंगे। शाम को लोहड़ी जलाई जाती है। तब ये पतंगबाज, लोहड़ी मनाने, ढोल पर नाचने के लिए नीचे उतरकर आते हैं। बाकि बची पतंगे संक्रांति को उड़ाते हैं। यहां पर परंपरा का पालन जरुर किया जाता है। रात को सरसों का साग और गन्ने के रस की खीर घर में जरुर बनती हैं, जिसे अगले दिन मकर सक्रांति को खाया जाता है। इसके लिए कहते हैं ’पोह रिद्दी, माघ खादी’(पोष के महीने में बनाई और माघ के महीने में खाई) बाकि जो कुछ मरजी़ बनाओ, खाओ। हमारा कृषि प्रधान देश है। फसल का त्यौहार हैैं। इस समय खेतों में गेहंू, सरसों, मटर और रस से भरे गन्ने की फसल लहलहा रही होती है। आग जला कर अग्नि देवता को तिल, चौली(चावल) गुड़ अर्पित करते हैं। परात में मूंगफली, रेवड़ी और भूनी मक्का के दाने, चिड़वा लेकर परिवार सहित अग्नि के चक्कर लगा कर, थोड़ा अग्नि को अर्पित कर, प्रशाद खाते और बांटतें हैं। नई बहू के घर में आने पर और बेटा पैदा होने पर उनकी पहली लोहड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। भोज भी करते  हैं। कडा़के की सर्दी में आग के पास ढोलक पर उत्सव के अवसरों पर गाये जाने वाले अलिखित और अज्ञात रचनाकारों द्वारा रचित अनेकानेक लोकगीत सुनने को मिलते हैं। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक परांपरा से सुरक्षित है। अगले दिन मकर संक्राति को खिचड़ी और तिल का दान करते हैं और खिचड़ी और तिल के लड्डू खाये जाते हैं। स्वाद से खाते हुए बुर्जुग कवित्त बोलते हैं ’खिचड़ी तेरे चार यार, घी, पापड,़ दहीं, अचार’। क्योंकि देशभर में कई शहरों में पतंगे मकर संक्रांति को उड़ाने की परंपरा है इसलिए इसे पतंग उत्सव भी कहते हैं। कुछ राज्यों तेलंगाना, गुजरात, राजस्थान, पंजाब में ’पतंग महोत्सव’ मनाया जाता है। उत्तर भारत में इन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ती है। इस दिन पतंगें उड़ाते हुए, कई घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए बेहद लाभदायक होता है।

शाकंभरी देवी जयंती उत्सव(13 जनवरी) माँ शाकंभरी देवी मंदिर सहारनपुर में मेले का आयोजन किया जाता है। इस दिन लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। 

धार्मिक तीर्थ यात्रा महाकुंभ महापर्व मेला प्रयागराज में 13 जनवरी को आयोजित होने जा रहा है। यहां चारों आचार्यों, रामानुज, मध्व, निर्म्बाण और वल्लभ संप्रदाय से जुड़े सन्यासी और अखाड़े भी एकत्रित होते हैं। आज भारत मे मान्यता प्राप्त अखाड़ों की संख्या 13 हो गई है। हर अखाड़े का अपना इतिहास है। पहले इन्हें साधू संयासियों का जत्था कहा जाता था। मुगलकाल में इन्हें अखाड़ा नाम दिया गया। यह शैव, वैष्णव एवं उदासीन पन्त के सन्यासियों के अखाड़े हैं। जोे शास्त्र विद्या में भी महारती होते हैं। सन्यासी तप साधना र्माग से आगे बढ़े हैं। उनका शास्त्रज्ञ होना आवश्यक नहीं है। शास्त्रज्ञ की भूमिका में अखाड़े के आचार्य होते हैं। आचार्य नये सन्यासियों को दीक्षा देते हैैं। महन्त और आचार्य पद सामान महत्व के पद हैं।  अखाड़े तप साधना में लीन सन्यासियों का संगठन होता है। इनके शीर्ष पर महन्त विराजमान होते हैं। हर अखाड़ा शास्त्रज्ञ सन्यासियों को अपने महामंडलेश्वर के पद पर अभिषिक्त करता हेै। प्रचार प्रसार के इस युग में  महामंडलेश्वर का पद वैभवपूर्ण हो गया है। कुम्भ में नये सन्यासियों को दीक्षा दी जाती है। स्नान के साथ यहाँ ज्ञान यज्ञ भी होता है। देश दुनिया के लोग कुम्भ स्नान के साथ साधू महात्माओं के दर्शन की लालसा लेकर आते हैं। देश की जनसंख्या के लगभग एक प्रतिशत सन्यासी है। इनका  आध्यात्मिक जीवन ही नहीं इनका आर्थिक दृृष्टि से भी बहुत महत्व है। ये आदरणीय लोग स्वेच्छा से न्यूनतम भौतिक साधनों पर जीवन निर्वाह करते हुए पूरे समाज के सामने सादगी और त्याग का आदर्श रख रहें है। दूर दूर से करोडों की संख्या में देशवासी, विभिन्न संस्कृतियों भाषा के साधू संतों को देख कर हेैरान रह जाते हैं और इनके चरण छूकर आर्शीवाद लेना अपना सौभाग्य समझते हैं। इस अवसर पर प्राचीन काल से कौन अखाड़ा पहले स्नान करेगा इसका विधान है।

पूर्वोत्तर भारत में भोगाली बिहू मनाते हैं। यह मकर संक्राति का उत्सव, माघ बिहू एक सप्ताह तक मनाया जाता हैं। मकर संक्रातिं की पूर्व संध्या को लकड़ी बांस, फूस आदि से मेजी बनाई जाती हैं। वहां पारंपरिक भोज बनाये और खाए जाते हैं। मकर संक्रातिं को सुबह मेजी की प्रदक्षिणा करके उसमें आग लगा दी जाती है। एक दूसरे को गमुछा(गमछा) भेंट करके प्रणाम करते हैं। चिड़वा, दहीं, गुड़ खाया जाता है। हुरुम(परमल), नारियल, तिल के लड्डू बनाते हैं। दावत में तिल नारियल का पीठा जरुर  बनता है। भोगाली बिहू यानि माघ बिहू में अलाव जलाने और भोज खाने और खिलाने की परंपरा है। नये कपड़े  पहनते हैं पर युवाओं का दूसरे के बाड़े से सब्जी चुरा कर तोड़ना शगल है।   

 नवान्न और सम्पन्नता लाने का त्यौहार पोंगल(13 से 17 जनवरी) का इतिहास कम से कम 1000 वर्ष पुराना है। दक्षिण भारतीय देश विदेश में जहां भी रहते हैं। पोंगल उत्साह से मनाते हैं। इस त्यौहार का नाम पोंगल इसलिए है क्योंकि सूर्यदेव को जो प्रसाद अर्पित करते हैं, वह पगल कहलाता है। तमिल भाषा में पोंगल का एक अर्थ है, अच्छी तरह उबालना। चार दिनों तक चलने वाले पोंगल में वर्षा, धूप, खेतिहर मवेशियों की अराधना की जाती है। जनवरी में चलने वाले पहली पोंगल को भोगी पोंगल कहते हैं जो देवराज इन्द्र( जो भोग विलास में मस्त रहते हैं) को समर्पित है। शाम को अपने घरों का पुराना कूड़ा, कपड़े लाकर आग लगा कर, उसके इर्द गिर्द युवा भोगी कोट्टम(एक प्रकार का ढोल जिये भैंस के सींग से बजाते हैं) बजाते हैं।

दूसरा पोंगल सूर्य देवता को निवेदित सूर्य पोंगल है। मिट्टी के बर्तन में नये धान, मूंग की दाल और गुड़ से बनी खीर और गन्ने के साथ, सूर्य देव की पूजा की जाती है।

 तीसरा मट्टू पोंगल तमिल मान्यताओं के अनुसार माट्टु भगवान शंकर का बैल हैं जिसे उन्होंने पृथ्वी पर हमारे लिए अन्न पैदा करने को भेजा है। इस दिन बैल, गाय और बछड़ों को सजा कर उनकी पूजा की जाती है। कहीं कहीं इसे कनु पोंगल भी कहते हैं। बहने भाइयों की खुशहाली के लिए पूजा करतीं हैं। भाई उन्हें उपहार देते हैं। 

चौथा दिन कानुम पोंगल मनाया जाता है। इस दिन दरवाजे पर तोरण बनाए जाते हैं। महिलाएं मुख्यद्वार पर रंगोली बनाती हैं। नये कपड़े पहनते हैं। रात को सामुदायिक भोज होता है।

 तमिल की तन्दनानरामयाण के अनुसार श्री राम ने मकर संक्रातिं को पतंग उड़ाई थी और उनकी पतंग इन्द्रलोक में चली गई। अब सागर तट पर लोग पतंग उड़ाते और धूप से मुफ्त में प्राप्त विटामिन डी का सेवन करते मिलेंगे।

टुसू महोत्सव(टुसू परब, मकर परब, पूस परब)(14दिसम्र से 15 जनवरी) झाड़खंड के कुड़मी और आदिवासियों का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। एक महीने तक नाच गानों, कर्मकांडों से मनाया जाता है। अंतिम दिन मकर संक्राति को मनाए जाने वाले इस लोक उत्सव में सुबह नदी में स्नान करके उगते सूरज की प्रार्थना की जाती है। और कुवांरी कन्याओं द्वारा बनाई टुसू देवी की मूर्ति, एक माह तक प्रतिदिन शाम को पूजने के बाद विसर्जित कर दी जाती है।

तिरूवल्लूर दिवस तमिलनाडु सरकार ईसा पूर्व चौथी शताब्दी के प्रसिद्ध तमिल कवि दार्शनिक, तिरूवल्लुर के सम्मान में 15 जनवरी को तिरूवल्लूर दिवस के रूप में मनाती है।

जयदेव केंडुली 15 जनवरी को कवि जयदेव की जयंती पर, केंडुली गाँव पश्चिम बंगाल में संगीत मेला आयोजित किया जाता है। जो घूमंतू गायकों द्वारा बाउल संगीत के लिए प्रसिद्ध है।

मोढेरो नृत्य महोत्सव 17 जनवरी गुजरात के मेहसाणा जिले में स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर में शास्त्रीय नृत्य उत्सव है। यह संस्कृति और परंपराओं को बढ़ावा देने वाला उत्सव पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है। 

तैलंग स्वामी जयंती(21 जनवरी) तैलंग स्वामी अपनी योग शक्तियों और लंबे जीवन के लिए प्रसिद्ध हैं।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती(23 जनवरी) हमारे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता, आज़ाद हिंद फ़ौज को गठने वाले, देश को राष्ट्रीय नारा ’’जय हिन्द’’ देने वाले नेताजी को इस दिन देश याद करता है।  

गणतंत्र दिवस(26 जनवरी) सुबह परेड देखना और दिन भर जगह जगह देशभक्ति के कार्यक्रमों में शिरकत करके राष्ट्रीय त्यौहार को मनाते हैं। 

फ्लोट फैस्टिवल 26 जनवरी  भक्ति और संस्कृति को दर्शाता फ्लोट उत्सव तमिलनाडु के मदुरै में यहाँ की समृद्ध सांस्कृतिक झलक को पेश करता है। भगवान सुंदरेश्रवर और देवी मीनाक्षी की मूर्तियों को विशेष श्रृंगार करके फूलों और रोशनी से सजे फ्लोट पर रख कर मरियम्मन तेप्पाकुललम तालाब में चारों ओर घुमाया जाता है। इसका दर्शन करने दूर दूर से श्रद्धालू पहुँचते हैं।

नागौर महोत्सव 28 जनवरी यह भव्य पशु मेला के कारण भी राजस्थान के ससे जीवंत त्योहारों में है। चार दिन राजस्थानी संगीत, लोक नृत्य और स्थानीय व्यंजनों का आनन्द लिया जाता है। तरह तरह की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जातीं हैं। हस्तशिल्प और आभूषणों की जमकर खरीदारी होती है। तीन महीने का रन उत्सव तो चल ही रहा है।  

  मौनी अमावस्या 29 जनवरी को माघी अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन गंगा स्नान या अपने आस पास की पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करने के साथ भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और दान का महत्व है। इस दिन मौन व्रत रखा जाता है इसलिए इसे मौनी अमावस्या कहा जाता है। महाकुंभ के कारण इस दिन का विशेष स्नान है।

साहित्य कला संस्कृति का 30 से 3 फरवरी को जयपुर लिटरेचर फैस्टिवल है जिसमें देश विदेश की कई मशहूर हस्तियाँ हिस्सा लेंगी।

 तमिल नाडु से जुड़े होने से यही दिन आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में संक्रान्ति के नाम से मनाया जाता है। केरल में राजा राजशेखर ने अयप्पा को देव अवतार मान कर सबरीमालाई में देवताओं के वास्तुकार विश्कर्मा से डिजाइन करवा कर अयप्पा का मन्दिर बनवाया। ऋषि परशुराम ने उनकी मूर्ति की रचना की और मकर संक्रातिं को स्थापित की। आज भी यह प्रथा है कि हर साल मकर संक्रातिं के अवसर पर पंडालम राजमहल से अयप्पा के आभूषणों को संदूक में रख कर एक भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है। जो 90 किलोमीटर तीन दिन में सबरीमाला पहुंचती है। इस प्रकार मकर संक्राति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक हमें अलग अलग रुपों में दिखाई देती है। सर्दियों की विदाई और लंबे दिनों की शुरूआत है। तिल, गुड, अलाव, ढोल की थाप, नाच गाना, खिचडी और पोंगल है। जिसमें प्रकृति के साथ मवेशियों का भी उपकार माना जाता है।     

यह लेख प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से पकाशित

 प्रेरणा विचार पत्रिका के जनवरी अंक में प्रकाशित है।