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Monday, 2 March 2026

त्यौहार सांस्कृतिक आदान प्रदान के शक्तिशाली माध्यम हैं मार्च के पर्व उत्सव Festivals are powerful means of cultural exchange. Festivals in March Neelam Bhagi

 


त्यौहार  सांस्कृतिक आदान प्रदान के शक्तिशाली माध्यम हैं। इसमें सीमाओं का बंधन नहीं होता है। उत्सव दर्शकों को आर्कषित करने के साथ साथ विभिन्न समुदायों के बीच समझ और प्रशंसा को भी बढ़ावा देते हैं। जिससे संस्कृतियों को एक दूसरे से सीखने का अवसर मिलता है। इससे पर्यटन, आतिथ्य क्षेत्रों को भारी बढ़ावा मिलता है।  सामुदायिक पहचान और सामाजिक सद्भाव बढ़ता है और सांस्कृतिेक एकीकरण के अवसर पैदा हुए हैं। अब हमारे पर्व, त्यौहार  दुनिया भर के लोगों को जोड़ते हैं।मासी मगम 2 मार्च, तमिलनाडु का एक प्रमुख त्योहार है जिसमें मूर्तियों को पवित्र स्नान के लिए नदियों या समुद्र तक जुलूस के रूप में ले जाया जाता है।

अट्टुकल पोंगल 3 मार्च,  तिरुवनंतपुरम, केरल के अट्टुकल भगवती मंदिर में मनाया जाने वाला, यह महिलाओं का सबसे बड़ा धार्मिक समागम माना जाता है।दुनिया का सबसे बड़ा ’आट्टुकल पोंगाला’ महिला उत्सव!! अट्टुकल भवानी मंदिर तिरुअनंतपुरम केरल में मनाया जाता है। इन्हीं दिनों मलयालम महिना पंचाग के अनुसार तिथि निकलने पर दस दिन का केरल और तमिलनाडु का उत्सव आट्टुकल पोंगाला अपना नाम दुनिया में महिलाओं का सबसे बड़ा जमावड़ा होने के कारण 2009 में गिन्नी बुक ऑफ वर्ड रिकार्ड में दर्ज करवा चुका है। जिसमें 25 लाख महिलाओं ने गुड़, नारियल, केले से पायसम बनाया। इसमें पुरुषों का प्रवेश मना है। कहते हैं ये 1000 साल पहले से मनाया जा रहा है। तमिल महाकाव्य ’सिलप्पथी कारम’ की मुख्य पात्र कन्नकी का यहां अवतार हुआ था। मुख्यदेवी कन्नकी को भद्रकाली के रुप में जाना जाता है। इनका एक नाम अटुकलाम्मा है। ऐसी मान्यता है दस दिवसीय उत्सव में देवी अटुकल मंदिर में रहती हैं। इनका जन्म भगवान शिव के तीसरे नेत्र से हुआ है। राजा पांडया पर कन्नकी की जीत का जश्न पोंगाला उत्सव है। इन दिनो तिरुवनंतपुरम उत्सव के रंग में रंग जाता है। श्रद्धा से देवी को आट्टुकाल अम्मा कहते हैं। महिलाएं वहीं पर उनको खीर बना कर अर्पित करती हैं। मंदिर के चारों ओर चूल्हे बने होते हैं। पुजारी मंदिर के गर्भग्रह से पवित्र अग्नि देता है। एक से दूसरा चूल्हा जलता है और वह सब पर फूल और पवित्र जल  छिड़क कर आर्शीवाद देता है। यह फसल का पर्व है और इस दस दिवसीय उत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं। जिसमें बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।  तीरथ वर नैमिष विख्याता, अति पुनीत साधक सिद्धि दाता। 

फाल्गुन मास की पूर्णिमा को नैमिषारण्य  यात्रा सम्पन्न होती है। और....और रात को होलिका दहन होगा।

बैर उत्पीड़न की प्रतीक होलिका मुहूर्त पर जलाई जाती है। होलिका जलने के बाद बचता है प्रहलाद!!

होली 4 मार्च,  और प्रहलाद यानि आनन्द बचता है जिसे बहुत हर्षोलास से रंगों से सराबोर शिव के गण बने, एक दूसरे को शिव के बराती बनाते हैं। शिव की बारात(होली का जुलूस) निकालने के बाद सब नए कपड़े पहन कर एक दूसरे के घर होली मिलने जाते हैं। जिसके लिए महिलाएं तीन चार दिन पहले से मीठे, नमकीन बनाकर तैयारी करती हैं। अमेरिका प्रवास के दौरान मैंने जाना गीता दित्या के हम उम्र गैर भारतीय बच्चे होली को भूले नहीं थे और आने वाले दिनों में होली का इंतजार कर रहे थे। जिसमें बच्चे खुश तो परिवार भी खुश। लगता है होली उनका प्रिय त्यौहार हो गया है । भारतीय त्यौहारों में कथाएं, पारंपरिक संगीत और नृत्य, स्वादिष्ट व्यंजन, परिवार और मित्रों का इक्ट्ठा होना मुख्य आर्कषण होता है। होली के रंग और गीत उल्लास को बढ़ाते हैं। डिजिटल युग और बॉलीवुड ने हमारे होली के त्यौहार के प्रभाव प्रसार में क्रांति ला दी है। होली पर गीत तकरीबन हर पिक्चर में होता है और बॉलीवुड की फिल्में दुनिया भर में देखी जाती हैं।  होली केवल स्थानीय उत्सव नहीं रह गया है। वह दुनियां भर के लोगों को जोड रहा हैं। आज देश दुनिया के पर्यटक ब्रज की लट्ठमार होली देखने आते हैं। विदेश में जहाँ भारतीय मूल के लोग अधिक हैं, वे मिलजुल कर मनाते हैं।

जिसमें देश दुनिया के वहाँ रहने वाले प्रवासी और स्थानीय लोग भी शामिल होते हैं। मैं वेस्ट हॉलीवुड, लॉस एंजेलस गई। यहाँ भारतीय कम हैं तो भी वहाँ लॉन्ग बीच आदि पर महीने में वीकएंड पर, चार बार पर अलग अलग कंपनियों ने अलग-अलग जगह, अलग-अलग दिन होली के त्यौहार का आयोजन किया। हिंदुओं के अलावा और लोग भी आते हैं,  तभी तो इतने बड़े कार्यक्रम होते हैं। होली की छुट्टी तो होती नहीं हैं इसलिए होली के दिन त्यौहार न मना कर, लोगों की सुविधा, अनुसार संडे को मना लेते हैं। जो लोग भारत नहीं आ सकते हैं, उनके लिए विदेशों में होली हो जाती है। जमकर रंग खेला जाता है, पारंपरिक व्यंजंन खाए जाते हैं। सेल्फी प्वाइंट होते हैं , रंग लगे लोग सपरिवार फोटो लेते हैं। समुद्री रेत पर होली खेली जाती है,  धुलाई, सफाई की भी जरूरत नहीं है। संगीत के बिना उत्सव कैसा! विद्वानों का मानना है जो जनजातियाँ नाचती गाती नहीं, उनकी संस्कृति मर जाती है। बॉलीवुड से कलाकार बुलाए जाते हैं। जमकर नाच गाना होता है।  प्रोडृयूसर पूजा कोहली तनेजा परिवार क्यूपर्टिनों शहर में रहता है। क्यूपर्टिनों, विश्वप्रसिद्ध सिलिकॉन वैली के पश्चिमी छोर पर सांता क्रूज़ पर्वत की तलहटी में स्थित है। कैलिफोर्निया का यह शहर एप्पल कम्प्यूटर इंक. और उच्च श्रेणी के पब्लिक स्कूलों के कारण मशहूर है। पूजा परिवार होली के त्यौहार का आयोजन करता है। दिन, मौसम और छुट्टियों के अनुसार तय किया जाता है। जब सबको सुविधा होती है इसलिए पूजा परिवार की होली का सबको इंतजार रहता है। होली भारत से बाहर भी एकता और खुशी का प्रतीक बन गया है। अटलांटिका में इस्कॉन द्वारा होली उत्सव बहुत विशाल स्तर पर मनाया जाता है। हिंदू धर्म की यही तो विशेषता है जो सब को धारण ही नहीं करती बल्कि इसमें लचीली व्यवस्था भी है। भारत में निश्चित दिन और विदेश में सुविधानुसार होली का आनन्द उठाया जाता है।  

सांस्कृतिक आदान प्रदान के साथ पर्यटन तो होता ही है।

नृत्य, गायन उत्सवों की शुरूआत भारत के मंदिरों में हुई थी। लेकिन अब देश विदेश से इन उत्सवों को देखने पर्यटक आते हैं। गीतों का आनंद उठाते हैं।  मुंबई से लेकर कई राज्यों की होली देखी पर नौएडा में मनाई, पहली होली याद है। होली ने तो महानगरों में भारत को एक जगह कर दिया है।  

नौकरी के कारण अलग अलग राज्यों से आए, नगरवासी जो परिवार में नहीं जा पाते, अब होली तो अकेले खेली नहीं जाती तो एक ही पार्क में बरसाने की लठ्मार होली, कुमांऊ की बैठकी, हरियाणा की धुलैंडी जिसमें देवर भाभी को सताता है और भाभी धुलाई करती है। मिलजुल कर मना लेते हैं। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु का जन्मदिन जुलूस निकाल कर मनाते हैं। इस्कॉन मंदिरों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वह सांझी होली में भी मनाया। फिल्म के गीत और लोकगीत, रसिया और जोगीरा सारा.. रा.. रा.. के सवाल जवाब से तो सांझी होली जीवन में रंग भर देती है। दक्षिण भारतीयों ने होलिका दहन की राख माथे पर लगाई तो सबने उन्हें सूखे रंगो से रंग दिया। नार्थ ईस्ट में मणिपुर की दंत कथा के अनुसार रुक्मणी को भगवान कृष्ण, आम भाषा में कहते हैं, भगाकर ले गए थे। ज्यादातर इसी से संबंधित लोकगीत होते हैं और जहां कन्हैया हों वहां होली न हो ऐसा हो नहीं सकता!! वहां छ दिन पारंपरिक नृत्य लोक कथाओं पर चलते हैं। मणिपुरी नृत्य का कॉस्ट्यूम विश्व प्रसिद्ध है। इसलिए नार्थइस्ट वाले तालियों से साथ दे रहे होते हैं। रंगों का यह त्योहार  भारत में  उत्साह के साथ मनाया जाता है। पूर्वोत्तर भारत असम में डोल जात्रा/फगुआ और स्थानीय जनजातीय उत्सव वसंत ऋतु के आगमन का जश्न मनाएंगे। यह समय प्रकृति के नवजीवन और क्षेत्रीय सांस्कृतिक समारोहों के लिए जाना जाता है। 

होली/डोल जात्रा, पूरे पूर्वोत्तर, विशेषकर असम और मणिपुर में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाएगा।

अरुणाचल प्रदेश (जैसे कि सिंक केन), मणिपुर (याओशांग) और अन्य राज्यों में वसंतकालीन उत्सव होने की प्रबल संभावना है। 

याओसांग मणिपुर के मेइती लोगों द्वारा मनाया जाने वाला एक जीवंत उत्सव है। यह एकता और सदभाव का प्रतीक है। बसंत के आगमन का स्वागत रंगीन पारंपरिक कपड़े पहनकर और नाच गा कर मनाते हैं। 

केरल में होली को मंजल कुली कहते हैं जिसका मतलब हल्दी स्नान है। 

डोलयात्रा सिक्किम का होली से मिलता जुलता उत्सव है और उसी दिन मनाया जाता है। यह राधा कृष्ण के प्रेम के जश्न के रूप में मनाया जाता है। राधा कृष्ण की मूर्तियों को जुलूस में ले जाया जाता है। लोग गुलाल उड़ाते हुए नाचते हैं। महिलाएं गाते हुए चलती हैं। पुरूष सभी पर रंग डालते हैं। 

होला मोहल्ला विशेषकर आनंदपुर साहब में सिक्खों द्वारा मार्शल आर्ट एवं बहादुरी का प्रर्दशन है। होलगढ़ किले में रंग बिरंगे मुकाबले होते हैं। होली के पांचवें दिन महाराष्ट्र में मछुआरा समुदाय के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस दिन नृत्य गायन के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। इस जश्न को शिमगो के नाम से जाना जाता है। देश के कई हिस्सों में होली का उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा को शुरू होकर रंग पंचमी को समाप्त होता है।

शीतला अष्टमी (10 मार्च) मौसम बदलने के कारण  इसमें ताजा प्रशाद नहीं बनता एक दिन पहले बनता है उसे बसोड़ा कहते हैं। वही देवी को भोग लगता है और दिनभर खाया जाता है। देवी से प्रार्थना की जाती है कि चेचक, खसरा आदि से बचाये। 

ऋतु संधि का पर्व नवरात्र चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा हिन्दू नवसंवत्सर से  शुरु होते हैं और इस वर्ष 19 मार्च से, देश भर में अलग अलग नाम से इन दिनों को उत्सव की तरह मनाने में प्रकृति का भी सहयोग होता है। पेड़ पौधे नई नई कोंपले और फूलों से लदे होते हैं। इसलिए इन्हें वासंती नवरात्र भी कहा जाता है। तापमान रोगाणुओं के पनपने और संक्रमण का है। अघ्यात्म से जुड़ने के कारण इन्हें मनाने के तरीके, नौ दिन में हमें स्वच्छ तन मन और खान पान के द्वारा आने वाले मौसम बदलाव के लिए तैयार करते हैं।  मेहनत का फल आलू, गेहूँ, जौ, मसूर, चना, अलसी, मटर व सरसों खलियान में आ गई होती है या कुछ कटाई के लिए तैयार होती हैं । अब पकने के लिए खुश्क और गर्म वातावरण चाहिए और कटाई फरवरी के अंतिम सप्ताह से  शुरू होती है। जो कड़ी मेहनत का काम है। जिसके लिए स्वस्थ रहना भी जरूरी है। नवरात्र के नौ दिन शाकाहार, अल्पहार, उपवास, नियम, अनुशासन से आने वाले मौसम परिवर्तन के लिए शरीर को तैयार करते हैं।

   विविधताओं के हमारे देश में उत्तर भारत में चैत्र नवरात्र में देवी के नौ रूपों की पूजा होती है। सर्दियाँ विदा हो रही होती हैं। खान पान तो जलवायु के अनुसार होता है। सर्दी से बचाव के लिए शरीर को गरिष्ठ भोजन की आदत हो जाती है। देवी उपासना के माध्यम से खान पान, रहन सहन, देवी पूजन में अपनाए गए संयम, तन और मन को शक्ति और उर्जा देते हैं। 9 दिन आत्म अनुशासन की पद्धति से मानसिक स्थिति बहुत मजबूत हो जाती है। इन दिनों आहार ऐसा होता है जिसका संबंध हमारे स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। घट स्थापना के साथ, जौं की खेती बोई जाती है। जिसे नवमीं को व्रत पारण के साथ प्रशाद के साथ लेते हैं। वही नवरात्र की खेती का ही रूप माइक्रोग्रीन यानि दाल सब्ज़ियों का छोटा रूप व्यवसाय बन गया है। सितारा होटल में सलाद पर माइक्रोग्रीन से गार्निश किया जाता है।  चैत्र नवरात्र में देवी पूजन देशभर में घरों में किया जाता है। इनके बीच में विशेष दिनों का भी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आयाम है।        

  गुड़ी पड़वा उत्सव महाराष्ट्रीयन और कोंकणी मनाते हैं। पूरनपोली, श्रीखंड, घी शक्कर खाने खिलाने का रिवाज़ है। गुड़ी का अर्थ है विजय पताका। महिषासुर, धूम्रलोचन, चंड मुंड, रक्तबीज असुरों का वध कर देवी ने असुरों पर विजय प्राप्त की। जिसके प्रतीक स्वरुप एक बांस पर बर्तन को उल्टा रखकर, उस पर नया कपड़ा लपेट कर पताका की तरह ऊंचाई पर रखा जाता है। जो दूर से देखने में ध्वज की तरह लगता है। मुख्यद्वार पर अल्पना और आम के पत्तों का तोरण तो सभी हिन्दू घरों में दिखता है। आम के पत्ते घट स्थापना में होते हैं। घर में सकारात्मक उर्जा आती है। दक्षिण भारत के कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में उगादी का पर्व मनाते हैं। मंदिर जाते हैं और एक विशेष भोजन पचड़ी बनाया जाता है। पचड़ी को नीम की कोंपले फूल, आम, हरी मिर्च, नमक, इमली और गुड़ से बनाते हैं। जो सभी स्वादों को जोड़ती है। यानि मीठा, खट्टा, नमकीन, कडवा, कसैला और तीखा। तेलगु और कन्नड़ हिन्दु परंपराओं में पचड़ी प्रतीकात्मक है कि आने वाले वर्ष में हमें सभी अनुभवों की अपेक्षा करनी चाहिए और उनका लाभ उठाना चाहिए। इसके बाद से दक्षिण भारत में आम खाना शुरु हो जाता है। गुड़ी पड़वा से अगले दिन चेटी चंड सिंधी हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है। जिसे सिंधी झूलेलाल के जन्मदिन के रुप में मनाते हैं।

मायोको त्योहार 21 मार्च अरूणाचल प्रदेश के अपतानी, डिबो हिजा, हरिबुला आदिवासियों द्वारा मनाया जाने वाला मुख्य त्योहार है। दोस्ती और सद्भावना के इस उत्सव में आसपास के सभी गाँव इक्ट्ठे होते हैं। 10 दिनों तक चलने वाले इस फसल उत्सव में यदि बारिश आ जाये तो और शुभ माना जाता है। त्यौहार के दिनों में लोग अपने घर के दरवाजे खुले रखते हैं। यह उत्सव प्रकृति पूजा है।   गणगौर राजस्थान और आसपास के राज्यों में मनाया जाने वाला 15 दिवसीय उत्सव है। पति की लम्बी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए देवी पार्वती को समर्पित विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला यह उत्सव है। अविवाहित लड़कियाँ सुयोग्य पति की कामना के लिए प्रार्थना करतीं हैं। उत्सव का अंतिम दिन बहुत आर्कषक होता है। नृत्य संगीत के साथ मूर्तियों को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। जिस उत्साह से हम उत्सव मनाते हैं, उसी तरह मत्सय जयंती 21 मार्च चैत्र नवरात्र के समय और गणगौर के साथ मेल खाता है। यह भगवान विष्णु के मत्सय अवतार की वर्षगांठ है। इस उत्सव पर विशेष पूजा, अर्चना और अभिषेक कर मत्सय पुराण, विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया जाता है। आन्ध्र प्रदेश के नागालपुरम में सोलहवीं शताबदी में विजयनगर साम्राज्य के शासक श्री कृष्णदेव राय द्वारा निर्मित श्री वेदनारायण स्वामी मंदिर भगवान मत्सय को समर्पित है। इस पावन अवसर पर यहाँ भव्य आयोजन किया जाता है। पूर्वोत्तर भारत में चैत्र महीने की षष्ठी को ’’चैती छठ’’ मनाया जाता है। इसमें परिवार नदी में स्नान करके वहाँ वेदी बना कर पूजा का कलश स्थापित करता है और सूर्य को अर्घ्य देता है। चैत्र नवरात्रों में नदी में अष्टमी स्नान किया जाता है। वहाँ मेला लगा होता है जहाँ खा पीकर खरीदारी करके लौटते हैं।

पूर्वोतर भारत में इस समय बसन्त के कारण प्राकृतिक सौन्दर्य चारों ओर होता है। झारखण्ड के आदिवासी, समुदाय के साथ सरहुल मनाते हैं और सरना देवी की पूजा करते हैं। उसके बाद से नया धान, फल, फूल खाते हैं और बीज बोया जाता है। यह माँ प्रकृति की पूजा और वसंत उत्सव है जो प्रजनन का भी संकेत देता है और शादी विवाह की शुरूवात होती है।  प्रतिप्रदा में सब अतीत को भूल कर आने वाले समय में खुशी और सकारात्मकता की कामना करते हैं। , यह दिन नई शुरुआत का प्रतीक है।

        दुर्गा अष्टमी और नवमी को नवरात्र के व्रत में व्रतियों द्वारा कन्या पूजन से व्रत का पारण करते हैं।   51 शक्तिपीठों में शक्ति स्वरूपा जगदम्बा के दर्शनों के लिए मौसम भी अनुकूल होता है। श्रद्धालू भक्ति भाव से देवी दर्शन को बड़ी संख्या में जाते हैं। जिसमें अध्यात्मिक आनन्द के साथ, इस धार्मिक तीर्थयात्रा में मानसिक सुख के साथ पर्यटन भी हो जाता है।  

होयसल महोत्सव आधिकारिक तौर पर यह एक दिवसीय नृत्य और संगीत उत्सव है जो अक्सर मार्च के मध्य में मनाया जाता है। होयसल महोत्सव कर्नाटक के अन्य स्थानो और प्राचीन मंदिरों में मनाया जाने वाला नृत्य और संगीत का उत्सव है। मंदिरों को मिट्टी के दियों से सजाया जाता है। पूरे दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस त्यौहार में अपनी पारंपरिक कला रूपों का जश्न मनाना है।

 श्री राम नवमी 26 और 27 मार्च भगवान राम का जन्मोत्सव  भारतीय मंदिरों में विशेष रूप से मनाया जाता है। इस्कॉन और स्मार्त परंपराओं के अनुसार इसकी तिथियां 26 और 27 मार्च को पड़ रही हैं। स्वामीनारायण जयंती भी 27 को मनाई जाएगी।

कबाली 63 महोत्सव 30 मार्च, सोमवार चेन्नई के प्रसिद्ध कपालेश्वर मंदिर  में 63 नयनमारों के सम्मान में भव्य जुलूस निकाला जाता है। 31 मार्च को महावीर जयंती मनाई जाएगी। बेलूर श्री चेन्नाकेशव मंदिर रथोत्सव: यह उत्सव 31 मार्च और 1 अप्रैल 2026 को आयोजित किया जाएगा।

  हमारी एक ही संस्कृति हमें जोड़ती है। ये देखकर ही तो कहते हैं कि भारत सभ्यताओं का नहीं, संस्कृति का राष्ट्र है। सभ्यताओं में संघर्ष हो सकता है पर संस्कृति हमें जोड़ती है। 

नीलम भागी(लेखिका,जर्नलिस्ट, ब्लॉगर, ट्रैवलर)

 यह लेख प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के मार्च अंक में प्रकाशित हुआ है।









Saturday, 12 March 2022

सुन गौरां तेरे मायके का हाल, तेरी मां है कंगाल, तेरा बाप है कंगाल। नीलम भागी Utsav Manthan Neelam Bhagi

           


  मैं भी बहुत लंबी लाइन जो महाशिवरात्रि को मंदिर में लगी थी, उसमें जाकर लग गई। शिवरात्रि जिसे हमारे यहां बसंत के आने से भी जोड़ा जाता है। लोटे में पानी या दूध, बेलपत्र चावल, बेर आदि फल, धतूरे के फूल लेकर व्रती पूजा की प्रतीक्षा में खड़े थे। धीरे धीरे लाइन चल रही थी और मेरे दिमाग में विचार भी चल रहे थे। बारह ज्योर्तिलिंग जो पूजा के लिए भगवान शिव के पवित्र स्थल और केन्द्र हैं। वे स्वयंभू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। इनमें से जहां भी गई, वहां एक वाक्य सुनने को मिला कि शिवरात्रि को यहां बहुत भीड़ रहती है। जहां मैं नहीं जा पाई अब उनके लिए दुखी होने लगी क्योंकि यहां जाना भारत को जानना है। फिर मन को समझाया कि मैं कौन सा मरने वाली हूं!! मुझे दर्शनों को जाना है तभी तो मैं कोराना से जंग जीती हूं। अब मेरी मैमोरी रिवर्स होने लगी। दूसरी लहर का प्रभाव कम हो रहा था और मैं भी स्वस्थ हो रही थी। दो साल से मेरी यात्रा बंद थी। अब व्हाटसअप पर यात्रा का मैसेज देखा, दिए नम्बर पर फोन किया वो बोले,’’हम आपको जानते हैं। मैं चल दी। छ बसे जा रहीं थीं, यहां मैं किसी को नहीं जानती थी। पर कुछ ही समय में ये शिवजी के भक्त मेरे एक बड़े परिवार की तरह हो गए थे।

  यात्रा में मेरा जाने का एक उसूल है ’’एटीटयूड घर में रख कर जाओ, जरुरी सामान ले जाना भूल न जाओ।’’ इस यात्रा में शिवजी का एक ही नाम था ’भोले’  

    शिवखोड़ी पर्वतीय यात्रा का मनमोहक रास्ता समृद्ध प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है। कलकल बहते झरने, हर तरह के पेड़ पौधे कोई भी हरे रंग का शेड नहीं बचा था जो इन वनस्पतियों में न हो। सुबह बारिश हो चुकी थी इसलिए पेड़ पौधे नहाए से लग रहे थे। जहां भगवान शंकर जी ने वास किया है वो स्थान क्यों नहीं इतना सुन्दर होगा!! जन्नत ऐसी ही होती होगी!! यहां भोले शिवालिक पर्वतश्रृंखला में परिवार सहित रहे। यही गुफा शिवखोड़ी जम्मू कश्मीर के रयासी जिले में स्थित है। वैसे भी कश्मीर में शिवरात्रि का उत्सव तीन चार दिन पहले से और दो दिन बाद तक मनाया जाता है। मेरी आंखें बस से बाहर गढ़ी हुई थीं। जहां प्रकृति ने इतना सौन्दर्य बिखेर रखा हो!! इन सहयात्रियों को इससे कोई मतलब नही,ं बस भोले की भक्ति में लीन थे। कानों में श्रद्धालुओ के भजन सुनाई दे रहें थे मसलन 

’’सुन गौरां तेरे मायके का हाल, तेरी मां है कंगाल, तेरा बाप है कंगाल।’’ भोले शंकर गौरां के मायके को लेकर ताने मारते ही जा रहें हैं। मायके की बुराई तो कोई महिला नहीं सुनती! आखिर में पार्वती ने ’’काढ़ लिया घूंघट, फूला लिए गाल’’ और रुठ गयीं, फिर भोले ने बड़ी मुश्किल से मनाया।

    यहां भजनों को सुनते हुए शब्दों पर तो कोई बेवकूफ ही जायेगा। सरल भोला भाव, सुर ताल ऐसा कि मैं कभी भी नहीं नाचती पर उस समय मेरा दिल कर रहा था कि मैं भी सबके साथ, चलती बस में उठ कर नाचंू। खड़ताल, मंजीरा, तो मैं ढोलक की थाप के साथ इस यात्रा में बजाना सीख गई थी। मैं जानतीं थी कि ये मेरे सहयात्री, न कवि हैं, न गीतकार हैं, न ही साहित्यिक हैं। जो भी सरल शब्दों में भक्तिभाव से गाते हैं वोे इनके मन के उद्गार थे। जिसमें सबकी श्रद्धा से कोरस मिलने सेे बस के अन्दर अलग सा समां बंध जाता था। हां यदि श्रद्धा मापने का कोई यंत्र होता तो सबका माप एक ही आता। दक्षिण भारत आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के सभी मंदिरों में श्रद्धालुओं की लाइने लगी रहती हैं। उज्जैन में महाकालेश्वर और जबलपुर तिलवाड़ा में जाना अपना सौभाग्य समझा जाता है। भगवान शिव की जटाओं से उनकी पुत्री माँ नर्मदा की उत्पत्ति हुई है। अमरकंटक में घूमते हुए माँ की कहीं भी जलधारा मिल जातीं थीं इसीलिये कहते हैं ’नर्मदा के कंकर सब शिवशंकर।

    ब्ंागलादेश के चंद्रनाथ धाम जो चिटगांव के नाम से प्रसिद्ध है। वहां कहते हैं इस दिन अभिषेक करने से सुयोग्य पति पत्नी मिलते हैं। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में देश दुनिया से श्रद्धालू पहुंचते हैं।

’शिवरात्रि’ का अर्थ है भगवान शिव की महान रात्रि सभी हमारे हिन्दू उत्सव दिन में मनाये जाते हैं। पर इस पर्व में रात्रि के चारों पहर अभिषेक होता है। एक साधारण इनसान शिव के 28 अवतार, शिवपुराण नहीं जानता, उसे बस ये पता है कि भोलेनाथ बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए जैसा सुनता देखता है, वही उसकी पूजा की विधि बन जाती है। जिसे वह श्रद्धा से करता है और श्रद्धा से बुद्धि को बल मिलता है। तुलसीदास ने भी लिखा है 

शिवद्रोही मम दास कहावा सो नर सपनेहु मोहि नहिं पावा।

   1921 से पूरी दुनिया में 8 मार्च महिला दिवस उत्सव के रुप में मनाया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति प्रेम प्रकट करते हुए महिलाओं के कठिनाइयों के सापेक्ष उपलब्धियों को स्लोगन, भाषण, संदेश, लेखन, शायरी और निबंध द्धारा नागरिकों तक पहुंचाया जाता है।

दुनिया का सबसे बड़ा ’आट्टुकल पोंगाला’ महिला उत्सव अट्टुकल भवानी मंदिर तिरुअनंतपुरम केरल में मनाया जाता है। इन्हीं दिनों मलयालम महिना पंचाग के अनुसार तिथि निकलने पर दस दिन का केरल और तमिलनाडु में उत्सव आट्टुकल पोंगाला मनाया जाता है। ये अपना नाम दुनिया में महिलाओं का सबसे बड़ा जमावड़ा होने के कारण 2009 में गिन्नी बुक ऑफ वर्ड रिकार्ड में दर्ज करवा चुका है। जिसमें 25 लाख महिलाओं ने गुड़, नारियल, केले से पायसम बनाया। इसमें पुरुषों का प्रवेश मना है। कहते हैं ये 1000 साल पहले से मनाया जा रहा है। तमिल महाकाव्य ’सिलप्पथी कारम’ की मुख्य पात्र कन्नकी का यहां अवतार हुआ था। मुख्यदेवी कन्नकी को भद्रकाली के रुप में जाना जाता है। इनका एक नाम ंअटुकलाम्मा है। ऐसी मान्यता है दस दिवसीय उत्सव में देवी अटुकल मंदिर में रहती हैं। इनका जन्म भगवान शिव के तीसरे नेत्र से हुआ है। राजा पांडया पर कन्नकी की जीत का जश्न पोंगाला उत्सव है। इन दिनो तिरुवनंतपुरम उत्सव के रंग में रंग जाता है। श्रद्धा से देवी को आट्टुकाल अम्मा कहते हैं। महिलाएं वहीं पर उनको खीर बना कर अर्पित करती हैं। मंदिर के चारों ओर चूल्हे बने होते हैं। पुजारी मंदिर के गर्भग्रह से पवित्र अग्नि देता है। एक से दूसरा चूल्हा जलता है और वह सब पर फूल और पवित्र जल छिड़क कर आर्शीवाद देता है। यह फसल का पर्व है और इस दस दिवसीय उत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं। जिसमें बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।    

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिप्रदा से शुरू होने वाली विश्व प्रसिद्ध 84 कोसी(252किमी)  नैमिषारण्य परिक्रमा चक्रतीर्थ या गोमती नदी में स्नान करके गजानन को लडडू का भोग लगा कर यात्रा शुरु करते हैं। रोज आठ कोस पैदल चलते हैं। 15 दिन तक ये यात्रा चलती है। महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियां दान देने से पहले तीर्थो का दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी। इंद्र ने सभी तीर्थों को नैमिषारण्य में 5 कोस की परिधी में आमंत्रित कर स्थापित किया। महर्षि दधीचि ने सबके दर्शन करके शरीर का त्याग किया था। दूर दूर से श्रद्धालू परिक्रमा करने आते हैं। यात्रा में लोगों का प्यार और सहयोग बहुत मिलता है। भंडारा, चाय और पीने के पानी की व्यवस्था रहती है। बागों में रुकते हैं। कुछ यात्री अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। परिक्रमा में वे पेड़ पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाते, न लड़ते झगड़ते, न ही किसी की निंदा करते हैं। भजन कीर्तन चलता रहता है। मैं जब नैमिषारण्य गई तो कड़ाके की सर्दी थी। मंदिरों में दर्शन करते हुए जरा थकान होने लगती तो मुझे कल्पना में 84 कोसी नैमिषारण्य परिक्रमा करते श्रद्धालु दिखते और मेरी थकान उतर जाती। रामचरितमानस में भी लिखा है


तीरथ वर नैमिष विख्याता, अति पुनीत साधक सिद्धि दाता। 

फाल्गुन मास की पूर्णिमा को यात्रा सम्पन्न होती है। और....


बैर उत्पीड़न की प्रतीक होलिका मुहूर्त पर जलाई जाती है और प्रहलाद यानि आनन्द बचता है जिसे बहुत हर्षोलास से शिव के गण बने, एक दूसरे को शिव के बराती बनाते हैं। शिव की बारात(होली का जुलूस) निकालने के बाद सब नए कपड़े पहन कर एक दूसरे के घर होली मिलने जाते हैं। जिसके लिए महिलाएं तीन चार दिन पहले से मीठे, नमकीन बनाकर तैयारी करती हैं। 18 अगस्त 1982 में जब मैं नौएडा में शिफ्ट हुई, तब हमारा ब्लॉक में पांचवा घर था और सभी अलग अलग प्रदेश से थे। हम सबने एक दूसरे के घर जाकर गुजिया, नमकीन, कांजी बड़े और जिसके यहां जो बनता था, बनवाने में मदद की और बनाना सीखा। साथ में इतना बतियाये कि आज हम सब बारह सेक्टर छोड़ चुके हैं पर होली ने हमें ऐसा जोड़ा कि हमारे बच्चों के परिवार भी एक दूसरे से मिलते हैं। मुंबई से लेकर कई राज्यों की होली देखी पर इस होली ने तो भारत एक जगह कर दिया था।  

यहां की पहली होली में सुबह उत्तराखंड की टोली के मधुर गीत से नींद खुली और बाहर आकर देखा सबके सिरों पर टोपियां थी एक हाथ में ढपली थी और स्लोमोशन में नाचते हुए गा रहे थे

’बेड़ू पाको बारह मासा, नरेली काफल पाके चैता मेरी छैला’

  सब उनका स्वागत व्यंजनों से करते और टोली में शामिल होते गए। जिस भी ब्लॉक या पास के सेक्टरों में गए, सबका चेहरा खुशी से खिल जाता था। अब ये टोली बड़े से टोले में तब्दील हो गई और एक बड़े पार्क में बैठ गई, कहीं से ढोलक भी आ गई थी। नौकरी के कारण अलग अलग राज्यों से आए नगरवासियों ने उसी पार्क में बरसाने की लठ्मार होली, कुमांऊ की बैठकी, हरियाणा की धुलैंडी जिसमें देवर भाभी को सताता है और भाभी धुलाई करती है। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु का जन्मदिन जुलूस निकाल कर मनाते हैं वह भी मनाया। नवरंग और झनक झनक पायल बाजे, वी शान्ताराम की फिल्म के गीत और सिलसिला का लोकगीत रंग बरसे गीत, रसिया और जोगीरा सारा.. रा.. रा.. के सवाल जवाब से तो सांझी होली ने जीवन में रंग भर दिए। दक्षिण भारतीयों ने होलिका दहन की राख माथे पर लगाई तो सबने उन्हें सूखे रंगो से रंग दिया। नार्थ ईस्ट में मणिपुर की दंत कथा के अनुसार रुक्मणी को भगवान कृष्ण, आम भाषा में कहते हैं भगाकर ले गए थे। ज्यादातर इसी से संबंधित लोकगीत होते हैं और जहां कन्हैया हों वहां होली न हो ऐसा हो नहीं सकता!! वहां छ दिन पारंपरिक नृत्य लोक कथाओं पर चलते हैं। मणिपुरी नृत्य का कॉस्ट्यूम विश्व प्रसिद्ध है। इसलिए नार्थइस्ट वाले तालियों से साथ दे रहे थे।    

जिस उत्साह से हम उत्सव मनाते हैं, उसी तरह 20 मार्च विश्व गौरैया दिवस को आंगन में फुदकने वाली गौरैया को बचाने के लिए, महानगरों में रहने वाले आर्टीफिशियल घोंसला लगाते हैं।  

22 मार्च विश्व जल दिवस पर प्रण करना होगा ’न जल बरबाद करेंगे और न करने देंगे।’ इस माह का अंतिम उत्सव शीतला अष्टमी है, मौसम बदलता है इसमें ताजा प्रशाद नहीं बनता एक दिन पहले बनता है उसे बसोड़ा कहते हैं। वही देवी को भोग लगता है और दिनभर खाया जाता है। देवी से प्रार्थना की जाती है कि चेचक, खसरा आदि से बचाये। जल बचाएं, गौरेया बचाएं क्योंकि उत्सवों के रंग तो पर्यावरण के संग ही हैं।

नीलम भागी(लेखिका, पत्रकार, ब्लॉगर)

केशव संवाद के मार्च अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है