Search This Blog

Showing posts with label #Kajari Teej #putrda ekadashi. Show all posts
Showing posts with label #Kajari Teej #putrda ekadashi. Show all posts

Saturday, 1 August 2026

झूला तो पड़ गए, आंबुआ की डार पे जी एजी कोई राधा को, गोपाला बिन राधा को... झुलावे झूला कौन!!

 


हमारे विशाल भारत में कहीं न कहीं प्रतिदिन उत्सव है और हिंदू धर्म में उत्सव के बारे में प्रचलित कथाएँ उसे और भी लोकमंगलकारी बना देती हैं। श्रावण मास शुरू है।   सावन में भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। सावन केे पहले सोमवार(3, 10,17,24 अगस्त) से शिवभक्त कांवड लेने जा सकते हैं। फिर हरिद्वार या गोमुख से यात्रा आरम्भ होती है। कंधे पर कांवड़, जिसमें गंगा जल होता है और ये यात्रा कांवड़ यात्रा कहलाती है। जो कांवड़ लेने जाते हैं वे भगवा भेष में होते हैं। कोई शिवजी का गण बना होता है। सजा हुआ कावंड उठाए कांवड़िए का एक ही नाम होता है ’भोला’। इस यात्रा में भोले कंघी, तेल, साबुन का इस्तेमाल नहीं करते हैं। मार्ग में कांवड़ को धरती से नहीं छूना है। कांवड़ शिविर में उसे टांगते हैं और आराम करते हैं। यात्रा में इनके आपस में पारिवारिक संबंध भी बन जाते हैं। जो कांवड़ लेने नहीं जाते वे कांवड़  शिविर में सेवा करने जाते हैं। सावन की शिवरात्री(11 अगस्त)  को शिवजी का श्री गंगाजल से रूद्राभिषेक किया जाता है। सावन के सोमवार को तो शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। तेलंगाना का 1 महीने तक चलने वाला बोनालू मुख्य उत्सव (पुराना शहर और लाल दरवाजा हैदराबाद ) 2 अगस्त को है। बोनालू का समापन 9 अगस्त और सार्वजनिक अवकाश 10 अगस्त को है। इस भव्य उत्सव के दौरान, श्रद्धालु (विशेषकर महिलाएं) पारंपरिक वेशभूषा में सजकर सिर पर बोनम (चावल, गुड़, दूध और दही से भरा कलश) रखकर देवी को अर्पित करते हैं। उत्सव के मुख्य आकर्षणों में पोथुराजु का पारंपरिक नृत्य और भविष्यवाणियों से जुड़ा अनुष्ठान 'रंगम' शामिल हैं। सिंधारा तीज जिसे हरियाली तीज(15 अगस्त) भी कहते हैं। सावन में आने वाले इस त्यौहार में प्रकृति ने हरियाली की चादर ओढ़ी होती है। इस दिन को भोलेनाथ और माता पार्वती के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन की बौछारों में हरे भरे पेड़ो पर झूले पड़ जाते हैं। कहीं कहीं यह उत्सव तीन दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन मायके से सिंधारा में घेवर मिठाई, मेहंदी, चूड़ियां आदि सुहाग की चीजे आतीं हैं। दूसरे दिन हरी हरी मेहंदी हाथ पैरों में लगाई जाती है। अगले दिन सौभाग्यवती महिलाएं पकवान बनाती हैं और हरी पोशाक पहने, श्रृंगार करके माता पार्वती की पूजा करती हैं। सास को बायना देकर उनसे आर्शीवाद लेकर सपरिवार भोजन करती हैं। कहीं कहीं पर इससे पहले दिन से निर्जला वृत रखती हैं। नई बहू को पहले सावन में मैके भेज दिया जाता है। रिवाज़ है कि पहला सावन सास बहू इक्ट्ठे नहीं रहतीं हैं। तीज पर ससुराल से बहू के लिए सिंधारा जाता है। हमारे लोकगीतों में भी हरियाली, सावन के झूले, रिमझिम वर्षा की फुहारों में झूलती गाती सखियां होती हैं। पहले छोटी आयु में बेटियों की शादी हो जाती थी। हरियाली तीज उत्सव से वह पहला सावन पुरानी सखियों के साथ मना जातीं हैं। उस अवसर पर भीषण गर्मी से राहत मिलने के कारण मन खुश रहता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनन्द मनाती हैं। दक्षिण भारत का स्वर्ण गौरी व्रत  मुख्य रूप से कर्नाटक में विवाहित महिलाओं द्वारा देवी गौरी (पार्वती) की पूजा और सुख-समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाने वाला इस दिन व्रत है।

  नाग को हमारे यहां देवता की तरह पूजा जाता है। नागपंचमी(17 अगस्त) पर इनकी पूजा का विशेष दिन होता है। हमारे पूर्वजों ने इनकी पूजा करके हमें बताया है कि सभी सांप जहरीले नहीं होते हैं। इनको देखते ही मारना नहीं चाहिए। सांपों का मुख्य भोजन चूहे हैं और चूहे अनाज को नष्ट करते हैं। चूहों के मल मूत्र से खतरनाक हन्ता वायरस फैलने का डर रहता है।  

 गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ था। इस वर्ष (19 अगस्त) को उनकी  जयंती है। इनके द्वारा रचित श्री रामचरितमानस और हनुमान चालीसा को घर में रखना शुभ मानते हैं। तुलसी जयंती पर देश भर में संगोष्ठी और सेमिनार आयोजित किए जाते हैं। श्रावण पुत्रदा एकादशी (24 अगस्त) मनाई जाएगी। यह व्रत संतान प्राप्ति, संतान की सुरक्षा और परिवार की सुख-शांति के लिए भगवान विष्णु को समर्पित होता है।

 ओणम (26 अगस्त)  केरल का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध फसल उत्सव, जो दस दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। इसमें नौ प्रकार के पारंपरिक व्यंजन (ओणम साड्या), नौका दौड़ (वल्लम कली) और रंग-बिरंगी रंगोलियाँ (पूकक्लम) शामिल हैं। दक्षिण भारत में ओणम केरल का प्राचीन पारंपरिक, धार्मिक, सांस्कृतिक उत्सव हैं, जिसे दुनियाभर में मलयाली समाज मनाता है। 16 अगस्त से शुरु होकर 26  को इसका समापन होगा। केरल में चार दिन की छुट्टी होती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन प्रत्येक वर्ष राजा महाबलि पाताल लोक से धरती पर अपनी प्रजा को आर्शीवाद देने आते हैं और नई फसल आने की खुशी भी होती है। ओणम उत्सव अपनी सांस्कृतिक प्रथाओं में नाव दौड़, नृत्य रुपों, फूलों, रंगीन कला, भोजन और पारंपरिक कपड़ों से लेकर ओनसद्या यानि भोज है, जिसमें केले के पत्ते पर 29 शाकाहारी व्यंजन परोसे जाते हैं। तिरुवोनम, दसवें दिन अपने घरों के प्रवेश द्वार पर आटे के घोल से अल्पना सजाते हैं। नये कपड़े पहनते हैं। ऐसा मानना है कि इस दिन राजा महाबली हर घर जाते हैं और परिवार को आर्शीवाद देते हैं और परिवार दावत के लिए इक्ट्ठा होता है। 

रक्षाबंधन, वर लक्ष्मी व्रत, नारली पूर्णिमा (28 अगस्त)  

वरलक्ष्मी व्रतम्   दक्षिण भारत (विशेषकर तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) में देवी लक्ष्मी की कृपा और धन-धान्य की प्राप्ति के लिए विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला अत्यंत शुभ व्रत है।

नारली पूर्णिमा महाराष्ट्र, गोआ, केरल, गुजरात सागर तटीय प्रांतों में इसे नारियल पूर्णिमा भी कहते हैं। इसमें वर्षा के देवता वरूण की पूजा करके समुद्र से शांत रहने की प्रार्थना करते हैं और समुद्र को नारियल भेट करते हैं। फिर बहने भाई को रक्षासूत्र बांधतीं हैं। इस दिन से फिर से मछली पकड़ना शुरू किया जाता है। यह

मछुआरों का त्योहार महाराष्ट्र और कोंकण तट के मछुआरा समुदाय द्वारा समुद्र और जल के देवता वरुण को धन्यवाद देने के लिए मनाया जाता है। Q

समुद्र की पूजा इस दिन समुद्र में नौकायन को सुरक्षित बनाने और मौसम के अनुकूल होने की प्रार्थना के साथ समुद्र में नारियल अर्पित किया जाता है। क्योंकि

नारियल को भगवान शिव के तीन नेत्रों का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे प्रसाद के रूप में पूजा में शामिल किया जाता है और त्योहार के दिन नारियल के पकवान (जैसे नारियल चावल) बनाए जाते है।

बहन की सुरक्षा के लिए भाई की प्रतिबद्धता, भाई बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षा बंधन सावन मास की पूर्णिमा को  को मनाया जाता है। रक्षाबंधन के बारे में कई पौराणिक कथाएँ हैं, मसलन भगवान कृष्ण ने जब शिशुपाल का वध किया था तो सुर्दशन चक्र से उनकी अंगुली पर घाव हो गया था। उनकी अंगुली से रक्त बहता देखकर द्रोपदी ने अपनी साड़ी चीर कर उसका टुकड़ा, उनकी अंगुली पर बांधा था। श्री कृष्ण उनके स्नेह से प्रभावित हुए। जब द्रोपदी का चीरहरण हो रहा था तो श्रीकृष्ण उसकी रक्षा के लिए पहुँचे। तभी से रक्षा बंधन मनाने की परंपरा है। इतिहास में भी कई कहानियां हैं। रक्षा बंधन मनाने के पीछे हमारे पूर्वजों की बहुत प्यारी सोच है। गांव की बेटी, दूसरे गांव में ब्याही जाती है। उसके सुख दुख की खबर भी रखनी है। माता पिता सदा तो रहते नहीं हैं। उनके बाद भाई बहन की सुध लेता रहे। इस त्यौहार पर भाई के घर बहन आती है या भाई, बहन के घर राखी बंधवाने जाता है। बहन भाई का यह उत्सव परिवारिक मिलन है। इसे देश विदेश में रहने वाले समस्त हिन्दू मनाते हैं। पहले राजपुरोहित राजा को रक्षा सूत्र बांधते थे। राजा धर्म और सत्य की रक्षा का संकल्प लेता था। पारिवारिक उत्सव तो है ही, जो चलता आ रहा है। धार्मिक मान्यताओं के कारण समस्त हिन्दू धर्म का प्रत्येक वर्ग, जाति और वर्ण इसे मनाता है। इस पर्व की उत्पत्ति लोक संस्कृति से हुई, जिसमें पारंपरिक रूप से एक जिम्मेदारी का हिस्सा दिया जाता है। जो रक्त से रिश्तेदार नहीं हैं, वे भी आपस में रक्षासूत्र बांधने से स्वैक्षिक संबंधों की परम्परा के सम्मान के प्रतीक के रूप में बंध जाते हैं।  

   संघ परिवार के साथ परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने समस्त हिन्दू समाज में सामजस्य स्थापित करने के लिए इस दिन परम पवित्र भगवा ध्वज पर रक्षा सूत्र बांधकर उस संकल्प का स्मरण करवाया जिसमें कहा गया है कि धर्मों रक्षित रक्षितः अर्थात हम सब मिलकर धर्म की रक्षा करें। समस्त हिन्दू समाज मिलकर, समस्त हिन्दू समाज की रक्षा का संकल्प ले। स्वयंसेवकों ने समस्त हिन्दू धर्म की रक्षा का संकल्प लिया। इस प्रकार इस सुन्दर स्वरूप के साथ रक्षा बंधन, चौथा संघ उत्सव हो गया। रक्षा बंधन, धर्म का बंधन है जो परिवार को बांधता है और परिवारों से राष्ट्र है।

   सबसे श्रेष्ठ संबंध भातृत्व भाव है। इस भावना से स्वयंसेवक किसी भी प्रांत या भाषा के वंचित गरीब परिवारों में जाकर वहाँ रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते हैं। उनके साथ भोजन करते हैं। जो रक्षाबंधन पर रक्षासूत्र बंध गया तो इन परिवारों के संपर्क में रहते हैं। इस उत्सव के द्वारा समाज के वे वर्ग जो हाशिए पर खड़े थे, वे भी मुख्यधारा में आने लगे हैं। यह व्यक्तिगत  बहन भाई का उत्सव, संघ के प्रयास से धीरे धीरे सभी प्रांतों में सामाजिक स्तर पर मनाया जाने लगा है। अब रक्षाबंधन सामाजिक समरसता का प्रतीक है। स्वयंसेवक रक्षासूत्र बांधते समय और बंधवाते समय कभी गरीबी, अमीरी, जाति, प्रांतीयता का मन में भाव नहीं लाते। उड़ीसा में किसान मवेशियों को भी रक्षा सूत्र बांधते हैं क्योंकि इस दिन खेती के देवता बलभद्र का जन्मदिन है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में कजरी पूर्णिमा है तो पंजाब हरियाणा में इसे सलोनो कह कर मनाया जाता है। झारखंड, उत्तराखंड में तो श्रावणी मेला लगता है। देवघर जाने पर मैंने देखा वहाँ तो भगवा के सिवाय कोई रंग ही नज़्ार नहीं आ रहा था।  अब कुछ और भी परिवर्तन होने लगे हैं। आजकल दो बच्चों का, देश विदेश में नौकरी के कारण एकल परिवार है। कहीं दो बहनें हैं तो कहीं दो भाई हैं। त्यौहार भारतीय संस्कृति की आधारशिला हैं। वो तो मनाया जायेगा ही इसलिए बहन बहन को, और भाई भाई को राखी बांधता है  और मिलकर पकवान बनाते हैं। इसमें हम पर्यावरण को भी नहीं भूलें हैं इसलिए पेड़ों की रक्षा के लिए उन्हें भी राखी बांधने लगे हैं। 

कजरी तीज सोमवार, 31 अगस्त 2026 को मनाई जाएगी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 30 अगस्त की सुबह 09:36 बजे शुरू होकर 31 अगस्त की सुबह 08:50 बजे तक रहेगी। यह व्रत अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और पारिवारिक समृद्धि के लिए रखा जाता है

  हिंदू धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता है, सबके योग्य नियमों की लचीली व्यवस्था भी करता है। महानगरों की कामकाजी महिलाएं अपनी व्यवस्थता के कारण और छुट्टी न होने से परिवार में नहीं जा पातीं लेकिन घर में उत्सव जरुर मनाती हैं। जहां तीज महोत्सव का आयोजन किया जाता है, वहां पहुंच कर सखियों से मिलन भी हो जाता है। हरियाली धरती का सौन्दर्य है। उसी से हम सबका जीवन संभव है। और हमारा कर्त्तव्य है कि इसकी हरियाली को बनाये रखें।

पेड़ लगाए और जल संचयन करें।

नीलम भागी ( पत्रकार, लेखिका, ब्लॉगर, ट्रैवलर )

 प्रेरणा शोध संस्थान नोएडा से प्रकाशित प्रेरणा विचार पत्रिका के अगस्त अंक में यह लेख प्रकाशित हुआ है