धार्मिक कार्यक्रम के भण्डारे हों या किसी कार्यक्रम के समापन पर भोजन सब जगह बुफे ही लगाया जाता है ताकि खाने वाले अपनी मर्जी से उतना लें जितना वे खा सकते हैं और खाने की वेस्टेज़ न हो। जो बैठ कर खाना चाहते हैं उनके लिये वहां कुर्सी मेज़ भी लगी होती है। पर कुछ लोगो के कारण नज़ारा कुछ अलग ही होता है। वे बदग़मनी सी फैला देते हैं। पूड़ियों के पहाड़ अपनी मेज़ पर लगा लेते हैं। फिर जितना खाया जाता है खाते हैं बाकि जूठन से भरी हुई मेज़ छोड़ कर चल देते हैं। और मेरे जैसे लोग ये देख कर दुखी होते हैं।
मैं पहली बार नोएडा के आयप्पा मंदिर गई। कार्यक्रम के समापन पर भोजन प्रसाद की दो हॉल में व्यवस्था थी। श्रद्धालु ज्यादा थे। सब षांति से लाइन में लग गए। जैसे ही हॉल में गई वहां केले के पत्तों पर प्रसाद के सभी व्यंजन परोसे हुए थे। सब कुर्सियों पर बैठ गए। अपने आगे के पत्ते से भोजन करना शुरू कर दिया। परोसने वाले प्रत्येक लाइन में व्यंजन लेकर घूम रहे थे जिसे जो जितना चाहिए वे पत्ते पर परोस रहे थे। और मैं अपनी आदत से मजबूर खा भी रही थी और आस पास देख भी रही थी कि यहां भी लोग प्रषाद को जूठा तो नहीं छोड़ रहें हैं। पर ऐसा नहीं था। मेरे आस पास किसी के भी पत्ते पर जूठन नहीं थी। हर कोई खाने के बाद अपना पत्ता मोड़ देता था। यहां पूरी तरह से प्रसाद का सम्मान था। हॉल खाली होने पर फिर से केले के पत्तों पर व्यंजन परोसे जाने लगे। नीचे वाले हॉल में भी मैं देखने गई, श्रद्धालु प्रसाद का आनन्द उठा रहे थे। यहां देख कर बिल्कुल नहीं लगा की 20 प्रतिषत भोजन फेंका जाता होगा!!