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Sunday, 3 May 2026

किताबें खुद चुनने दो! Let the books choose themselves! Neelam Bhagi नीलम भागी

 


अंकुर, आदम्य को लाइब्रेरी लेकर जा रहा था। मैं भी साथ में चली गई। आदम्य ने अंकुर के साथ लाइब्रेरी में घूम घूम कर, अपनी पसंद की किताबें लेने के बाद, मेरे पास बैठकर, उनमें से एक किताब पढ़ने लगा। अंकुर अब शाश्वत के लिए, किताबें देखने लगा। शाश्वत कल के टेस्ट की तैयारी कर रहा था इसलिए वह नहीं आया। अंकुर वीडियो कॉल पर, उसकी पसंद की किताबें निकालता जा रहा था। मेरे सामने लाइब्रेरी में तीन पापा, एक-एक बच्चे के साथ आए। बच्चों को उन्होंने बिठा दिया और उनके लिए खुद किताबें पसंद कर रहे थे। मैंने देखा बच्चे अपने लिए खुद पसंद की किताब लेकर, बैठे उसके पेज पलटते और पढ़ने लग जाते और पापा की तरफ देखते, लेकिन पापा अपनी पसंद की किताबें, उनके लिए बड़ी लगन से ढूंढ रहे थे। मुझे याद है मेरी बड़ी बहन डॉ.शोभा भारद्वाज लाइब्रेरी में अपने तीनों बच्चों अपर्णा, आशुतोष, अभिजात के साथ मेरी बेटी उत्कर्षनी को लाइब्रेरी में छोड़कर, अपनी लाइब्रेरी में चली जाती थीं। बच्चे अपनी पसंद की किताबें इशु करा कर लाते, फिर घर में भी आपस में एक्सचेंज करके पढ़ते थे। उनके सम्मिलित पसंद की होती थी शायद इसलिए सभी किताबें पढ़ जाते थे। सभी बच्चों को पढ़ने का बेहद शौक़ है। उत्कर्षनी को तो 69वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में दो राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित ( स्क्रिप्ट राइटिंग, डायलॉग राइटिंग फिल्म गंगूबाई काठियावाड़ी ) किया गया। कोरोना के समय मैं शाश्वत को भी लाइब्रेरी लेकर आई और अपना अनुभव लिखा था नीचे लिंक है, क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

https://neelambhagi.blogspot.com/2021/03/blog-post_26.html






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