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Saturday, 26 September 2026

हमारे सेक्टर में गणपति उत्सव गणेश उत्सव सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक विचार है। Ganesh Utsav is not just a festival; it is an idea. Ganpati Utsav in our sector... Neelam Bhagi नीलम भागी

 


गणपति उत्सव का मेरे मन में बड़ा उत्साह रहता है। स्वतत्रंता सेनानी समाज सुधारक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा रोपा पौधा सार्वजनिक गणेश उत्सव, जो आज विशाल वट वृक्ष बन गया है जिसकी शाखाएं पूरे देश में जम गईं हैं। 10 दिनों तक चलने वाला सबसे बड़ा त्यौहार है। हमारे सेक्टर 11 में श्री हनुमान मंदिर एल ब्लॉक में 3 दिन के लिए गणपति विराजे, श्रद्धालु सुबह शाम आरती के लिए और शाम को भजन कीर्तन के लिए जाते। बंसल परिवार (H-48) में एक दिन के लिए गणपति उत्सव का आयोजन किया। 11:00 से 1:00 तक महिलाओं ने भजन कीर्तन किया। वीना बंसल की मम्मी अनुराधा महेशकर, हमेशा गणपति बिठाती थीं, उनके कनाडा जाने पर  बंसल परिवार गणपति का आवाहन करते हैं।   https://www.instagram.com/reel/DdTafjmAwSn/?stkn=d3lpMHc3NnppcXJi

छाया राय परिवार में 10 दिवसीय गणपति उत्सव मनाया गया।  इन दिनों आने वाले विश्वकर्मा पूजा, राधा  अष्टमी भी मनाई गई।

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प्रतिदिन शाम 4:00 बजे से 7:00 तक भजन कीर्तन और आरती की जाती। छाया जी द्वारा आमंत्रित महिलाओं ने बहुत श्रद्धापूर्वक भजन कीर्तन किया। इनमें कोई भी प्रोफेशनल नहीं था। घरेलू महिलाओं द्वारा भावपूर्वक गाए भजन और भक्ति नृत्य से अलग सा समा बंध जाता था। कोई किसी को नाचने को नहीं कहता था। अपने आप उठकर महिलाएं खूब नाचती थीं ।

https://www.instagram.com/reel/DdrRvWzSV6q/?stkn=OHFvY3U1d2UzNDE0

सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि महिलाओं की रचनात्मक बाहर आई कुछ महिलाएं जो नहीं गाती थी उन्होंने भी भजन गाए। 10 दिन तक हमारा सेक्टर गणपतिमय  रहा।  https://www.instagram.com/reel/Ddgn3hoAIAP/?stkn=dGc1czVnMWZqZWdi

दुग्गल परिवार(P-21, Sector 11) ने 10 दिन तक गणपति को अपने यहां बैठाया, पूजा अर्चना की।  गणपति विसर्जन अपने पारिवारिक मित्रों, रिश्तेदारों और सेक्टर वासियों के साथ बहुत हर्षोल्लाह से किया। https://www.instagram.com/reel/Ddt8uC9SMos/?stkn=MXAyZ3BsdjVucnJncQ==

   तिलक ने हमारे अग्रपूज्य, दक्षिण भारत के कला शिरोमणि गणपति को, 1893 में पेशवाओं के पूज्यदेव गजानन को बाहर आंगन में विराजमान किया था। आम आदमी ने भी, छुआछूत का भेद न मानते हुए पूजा अर्चना की, सबने दर्शन किए। उस समय का उनका शुरु किया गणेशोत्सव, राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बना और समाज को संगठित किया। आज यह पारिवारिक उत्सव, समुदायिक त्योहार बन गया है।

कई दिन से अस्थाई दुकानों में बरसात से बचाते हुए, हर साइज के गणपति सजे रहते हैं।

  इस वर्ष मैं घुटने की तकलीफ के कारण, अपने घर के आसपास ही गई हूं।  गणेश चतुर्थी से अनंत चतुदर्शी तक होने वाले  सांस्कृतिक कार्यक्रमों  को अपनी कल्पना में, मैं तिलक की आजादी की लड़ाई से इसे जोड़ती जाती हूँ । इनके द्वारा ही समाज संगठित हो रहा था, आम आदमी का ज्ञान वर्धन हो रहा था और छुआछूत का विरोध हो रहा था। आवाहन से लेकर विर्सजन तक श्रद्धालु, आरती, पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगभग सभी उपस्थित रहते थे ।

    घरों में भी गणपति 1,3,5,7 या 9 दिन बिठाते हैं। गौरी पूजन, दो दिन लक्ष्मी पूजन, छप्पन भोग आदि के निमन्त्रणों में सब व्यस्त रहते हैं। गणपति से मिलने बेटियां भी मायके आती हैं और बहुएं भी मायके जाती हैं।

   शाम को आरती के बाद कीर्तन होता। उसमें नाचते गाते हैं। मंगलकारी बप्पा साल में एक बार तो आते हैं। इसलिए उनके सत्कार में कोई कमी न रह जाए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार मोदक, लड्डू के साथ तरह तरह के व्यंजनों का भोग लगाते हैं। जो सब मिल जुल कर, प्रशाद में खाते हैं।  संबंधियों मित्रों के साथ आनंद पूर्वक नाच भी लेते हैं।       

     विर्सजन के दिन  बड़ी श्रद्धा से गणपति गोद में ले रखे हैं। ढोल की ताल पर उनके पैर चल रहें हैं। उनके चेहरे से टपकती श्रद्धा को तो मैं लिखने में असमर्थ हूं। इसमें ढोल से ज्यादा ऊंची आवाज़ में श्रद्धालु जयकारे लगा रहे थे,’’गणपति बप्पा मोरिया, अगले बरस तूं जल्दी आ।’’ और भक्ति भाव से किए उन नृत्यों को जिन्हें मैंने विर्सजन जूलूस में देखा है उसे दुनिया का कोई भी कोरियोग्राफर नहीं करवा सकता। गणपति के आकार में और जूलूसों में श्रद्धालुओं की संख्या में फर्क था पर चेहरे के भाव को दिखाने के माप का अगर यंत्र होता तो सबका एक ही होता।

    पर सब गणपति से विनती कर रहें हैं ’’ अगले बरस तूं जल्दी आ।’’

महाराष्ट्र इसे मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। 

 गणपति उत्सव की शरूवात, सांस्कृतिक राजधानी पुणे से हुई थी। शिवाजी के बचपन में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्रामदेवता कस्बा में गणपति की स्थापना की थी। तिलक ने जब सार्वजनिक गणेश पूजन का आयोजन किया था तो उनका मकसद सभी जातियों धर्मों को एक साझा मंच देना था। पहला मौका था जब सबने देव दर्शन कर चरण छुए थे। उत्सव के बाद प्रतिमा को वापस मंदिर में हमेशा की तरह स्थापित किया जाने लगा तो एक वर्ग ने इसका विरोध किया कि ये मूर्ति सबके द्वारा छुई गई है। उसी समय निर्णय लिया गया कि इसे सागर में विसर्जित किया जाए। दोनों पक्षों की बात रह गई। तब से विर्सजन शुरु हो गया।

दुग्गल परिवार के गणपति का रात आठ बजे विर्सजन हुआ।

प्रथम लेखक गणपति, शक्ति(लाल) समृद्धि(हरा) लाते हैं।   भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि, ज्ञान और नई शुरुआत के देवता माना जाता है। इसलिए कोई भी शुभ काम गणेश वंदना से ही शुरू होता है। मान्यता है कि इन 10 दिनों में गणपति पृथ्वी पर अपने भक्तों के बीच रहते हैं। 





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