अमेरिका में सुबह उठते ही दित्या ने मुझे दरवाजा खोलने को कहा। मैं कुछ बोलती उससे पहले उत्कर्षनी ने कहा, " देखना, इसको अखबार लेने जाना है। दित्या तो मुझे छोड़ती ही नहीं थी इसलिए मेरा हाथ पकड़ कर मुझे साथ लेकर गई। यहां सोसाइटी में जहां कोरियर, पार्सल, डाक रखने की जगह है। वहीं पर अखबार रखा होता या कभी वह फेंक जाते हैं तो जमीन पर पॉलिथीन में पैक, ऊपर फ्लैट का नंबर लिखा होता है। इसका एक फायदा था। अगर बरसात होती तो अखबार भीगता नहीं है। दित्या बड़े चाव से अखबार उठाकर लाती है। अभी पढ़ना नहीं जानती पर अखबार पर लिखे, अपने फ्लैट के नंबर को पहचान कर, अपनी अखबार ले आती है। संडे को कई अखबार आते हैं। उसे अपने घर की सभी अखबारों की पहचान है। सभी पैकेट उठा लाती है। अखबार लाकर सीधे बाहर उत्कर्षनी द्वारा बनाया कंटेनर गार्डनिंग का बगीचा, वहां मेज़ पर रख देती है। उत्कर्षनी और राजीव जी बड़े-बड़े मग में चाय लेकर अखबार पढ़ते हैं। बीच में उनकी चाय ठंडी भी हो जाती है, उनमें से कोई भी उठकर चाय को फिर से माइक्रोवेव में गर्म कर लाता है और अखबार पढ़ी जाती है। संडे को ज्यादा अखबार होते हैं इसलिए दो-दो मग चाय के पीए जाते हैं और अखबार खत्म हो जाती है। दित्या को अखबार उठा कर लाते देखकर, मुझे छोटी सी उत्कर्षनी याद आती है। मेरी मेज पर पेन रखा होता था। वह अखबार आते ही उसे मेज पर रखकर पेन उठाकर हेडिंग पर पेन फिराती, ओवरराइटिंग करती थी। उसकी इस अनजान हरकत ने उसका हाथ सेट कर दिया इसलिए उसे कभी हाथ पकड़ कर लिखना नहीं सिखाया था। और वह लिखना सीख गई जब पढ़ना सीखी तो अखबार के कार्टून पढ़ने का शौक जगा। फिर ऐसा अखबार से प्रेम से हुआ कि बिना अखबार पढ़े वह रह नहीं सकती। दित्या का अखबार प्रेम सुबह उठते ही बड़े प्यार से अखबार को घर में लाना है, पढ़ना लिखना नहीं जानने पर भी अखबार के पेज पलट कर तस्वीरें देखती है। पता नहीं क्यों मुझे भी अखबार हाथ में लेकर, फैला कर पढ़ने में ही अच्छा लगता है।







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