लंबी यात्रा के बाद घर में जाते हुए लिफ्ट में मैं सोच रही थी कि इतने समय बाद उत्कर्षनी के हाथ का बना, घर का खाना खाएंगे। उत्कर्षनी दो राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित लेखिका है साथ ही बेहतरीन को कुक है। पर फ्लैट खोलते ही आगे के हिस्से में पॉलिथीन का पूरा केबिन बना हुआ था। इतने हिस्से का फर्श खुदा हुआ था और छत में मोटे-मोटे पाइप नजर आ रहे थे। रिपेयर के हिस्से को पूरे घर से अलग किया हुआ था। अंदर एक मशीन चलने की आवाज आ रही थी और ड्राइंग रूम की लाइट चल रही थी। राजीव जी ने चाबी से ड्राइंग रूम की तरफ का पॉलिथीन काटा और हम घर में घुसे। शनिवार था कोई काम करने वाला नहीं नज़र आया। यह तो हमें पता था कि ऊपर के किसी फ्लैट में कुछ लीकेज है इसलिए कोई काम होना है। हम सोसाइटी में चाबी देकर आए थे और सोचा था कि हमारे लंबी यात्रा से लौटने तक काम हो चुका होगा, पर नहीं। अगले दिन भी कोई काम करने नहीं आया, संडे था। मुझे बहुत हैरानी हुई थी यहां राज मिस्त्री का काम भी फाइव डे वीक है। हमारे घर का कोई भी सामान इधर से उधर नहीं था। अब दिन में एक बार राजीव जी ड्राइंग रूम के प्लेटफार्म से कूद कर, किचन में जाते, फ्रिज लॉन्ड्री सब उस तरफ है। उत्कर्षनी खड़ी होकर बताती जाती, चाय और कुछ जरूरी काम हो जाता। सोमवार को सुबह 9:00 बजे आते ही, सुपरवाइजर ने गुड मॉर्निंग की और जहां से हमने पॉलिथीन काटा था, उसको हरे टेप से चिपकाया और हमें दिखाया कि यहां पर चिप लगी है, चैन खोलकर आप निकल सकते हैं, जाते समय हम बात कर जाया करेंगे कि इधर आ सकते हैं या नहीं। अब हम ड्राइंग रूम से दो फ्लैट्स के आगे से गुजरते हुए, सीड़ी के रास्ते पार्किंग में जाते हैं और बाहर का खाना खाते हैं। जब भी वे उत्कर्षनी के लिए किचन में जाने का रास्ता, अपने दिशा निर्देश में कर देते हैं तो वह खूब कुकिंग कर लेती है और फ्रिज में रख देती। फिर वही राजीव जी के कूद कर जाने का सिस्टम चलता। काम 9 से 5 और सप्ताह में 5 दिन ही होता। एक मशीन लगातार चलती ताकि घर पर नमी न अधिक हो जाये।
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