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Friday, 26 March 2021

किताबें भी उदास हैं!! Books are sad too!! Neelam Bhagi नीलम भागी

उदास फिरता है, अब मौहल्ले में बारिश का पानी।

कश्तियां बनाने वाले बच्चे, मोबाइल से इश्क़ कर बैठे।

सोशल मीडिया पर ये पंक्तियां पढ़ ही रही थी कि शाश्वत का मुझे फोन आया,’’ नीनो चार दिन हो गये मेरे इग्जा़म खत्म हुए।  खुल्ला दिन(इसमें पढ़ने को नहीं कहा जाता, शाश्वत की मर्जी चलती है, मोबाइल सिर्फ एक घण्टा) मिला था। जितनी घर में किताबें हैं वो सब पढ़ चुका हूं। लाइब्रेरी पापा शनिवार से पहले नहीं ले जा सकते। लॉकडाउन से मेरी आठों किताबें भी घर पर रखी हैं।’’मैंने जवाब दिया,’’तैयार हो जा, मैं लेने आ रही हूं और आज तेरी लाइब्रेरी भी देख लूंगी।’’मैं तैयार हो रही थी और दिमाग में याद चल रही थी। मेरी बड़ी बहन डॉ.शोभा सप्रु हाउस लाइब्रेरी पढ़ने जाती थी। वे अर्पणा, उत्त्कर्षिनी, आशुतोष और अभिजात को डॉ. बी. सी.रॉय लाइब्रेरी ले जातीं।


जब लौटते तो सबके हाथों में लाल ज़िल्द की दो दो किताबें होतीं। अभिजात छोटा था पढ़ना नहीं जानता था। अपनी पसंद की वह तस्वीरों वाली किताबें लेता था। बड़े तीनों आपस में बदल  कर 6 किताबें चाट जाते और मिलकर अभिजात को समझाते कि वे उसके लिए बुक पसंद करेंगें और पढ़ कर कहानी भी सुना देंगे। पर वह उनके झांसे में नहीं आता। वह जवाब देता कि आप 8 बुक्स पढ़ना चाहते हो। अब छठी में पढ़ने वाला शाश्वत आठ किताबें लेता है जिसमें 2 किताबें, K G. में पढ़ने वाले अदम्य के लिए होती हैं। शाश्वत के पास पहुंचने तक उसके तीन फोन आ गए थे। डोर बैल बजाने से पहले ही उसने दरवाजा खोल दिया। खाना, पानी, किताबें, मैट्रो कार्ड आदि सब लेकर तैयार वह लाइब्रेरी जाने को तैयार खड़ा था। अंकुर ने मुझे बिठाया, अदम्य ने जो जो उसकी पाककला में लाजवाब, नानी होली के पकवान लाई थी। मेरे खाने के लिए लाता जा रहा था। उस समय मुझे शाश्वत में उत्त्कर्षिनी नज़र आ रही थी। वह भी लाइब्रेरी जाने के लिए शोभा मासी का बेसब्री से इंतजार करती थी। घर से निकलते ही उसकी खुशी देखने लायक थी। मैं पहली बार जा रही थी। मैट्रो स्टेशन से बाहर आते ही अब वह मुझे लेकर जा रहा था। लाइब्रेरी में अंदर जाते ही उसने खुशी से किताबों को निहारा।

एक साल बाद जो यहां आया था। मुझे कहा आप बैठिए। कुछ देर एक्वेरियम के पास बैठा देखता रहा।


आठ किताबें निकालीं। जो मासिक पत्रिका आती है। वह कोरोना काल में घर नही पहुंची। अपना नाम एड्रेस देख देख कर एक साल की निकालीं। आते समय अंकुर ने कहा था कि ये लाइब्रेरी बंद होने पर ही वहां से आता है। आज ये क्या!! किताबें, मैग्ज़ीन सब बैग में रखकर बोला,’’चलिए नीनों।’’मैं हैरान होकर इसके पीछे चल दी। लाइब्रेरी में कोई भी बच्चा नहीं था। इतने समय ना ही कोई आया! बाहर आते ही मैट्रो स्टेशन के गेट न 2 की स्लैब पर बैठ गया, मैं भी बैठ गई।

लंच किया। सब मैग्ज़ीन को कवर से निकाल कर क्रम से लगाया। अब किताब पढ़ने बैठ गया। ट्रैफिक के शोर, लोगों के आने जाने से बेख़बर वह लाल कवर की पुस्तक के काले शब्दों में खोया हुआ था। और मैं सोच रही थी कि लाइब्रेरी से इसे बड़ी मुश्किल से घर लाते थे। आज ये सड़क पर बैठ कर पढ़ रहा है। शायद कोरोनाकाल में घरों में बंद रहने के कारण ये कहीं भी बंद रहना नहीं चाह रहा था। किताबें भी तो उदास हैं। बच्चे उनसे इश्क़ करेंगे तो वे भी उनके साथ बाहर आयेंगी न।