मैंने कई बार देखा है जब भी छबील लगाई जाती है तो कहीं-कहीं स्टील या प्लास्टिक के गिलास होते हैं। पिलाने वालों में बड़ा जोश होता है। वह सड़क पर लोगों को रोक कर शरबत पिलाते हैं और फुर्ती से शरबत से ही गिलास धो देते हैं और अगले व्यक्ति को पिलाते हैं, जिससे सड़क पर कीमती शरबत का अगर गड्ढा हो तो छोटा सा तालाब बन सकता है। पर गर्मी अधिक होने के कारण सड़क गीली ही रहती है। ऐसे में छबील के बाद गिलासों के ढेर तो नहीं नज़र आते पर शरबत बहुत बर्बाद होता है। पंजाबी विकास मंच द्वारा लगाई छबील के बाद कभी एक गिलास भी सड़क पर दिखाई नहीं देता है। कागज के गिलास होते हैं, जिन्हें अलग इकट्ठा किया जाता है। डस्टबिन के होते हुए भी कुछ लोग गिलास सड़क पर फेंकते हैं। जिन्हें बाद में इकट्ठा कर लिया जाता है। जो कूड़े वाले खुशी से रिसायकल के लिए ले जाते हैं। छबील बहुत व्यस्त जगह पर लगती है। किसी का समय खराब न हो इसलिए काउंटर बहुत बड़ा लगाया जाता है और पिलाने वाले भी पंजाबी विकास मंच के बहुत मेंबर होते हैं। जो लोग अपनी सवारी से नहीं उतरते हैं उन्हें वहां जाकर पिलाया जाता है। सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी है कि आजकल ज्यादातर लोगों के पास पानी की बोतल रहती है , उन लोगों ने गिलास इस्तेमाल नहीं किया। अपनी बोतल में पिया और फिर बोतल भरवाली। बोतल भरने के लिए फनल कीप रखी हुई थी, जिससे शरबत गिरा नहीं और सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी 20 लीटर के जार tap despenser रखे थे जिससे लोग लगातार शरबत से बोतल भर रहे थे।
यहां सेवा कम करनी पड़ रही थी, बाल्टी से जार भरना होता था। जो शरबत बरताने की सेवा करते हुए थक जाते थे, वह थोड़ा रेस्ट करते और दूसरे लोग सेवा देते इसलिए लगातार सेवा चल रही थी किसी को इंतजार करना नहीं पड़ रहा था। 👍
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